भारतीय संविधान का इतिहास | Bhartiya Samvidhan Ka Itihas

भारतीय संविधान का ऐतिहासिक सफर

26 जनवरी 1950 का दिन भारतीय इतिहास की स्वर्णिम तिथि है। भारत रूपी जिस शरीर में 15 अगस्त 1947 को जहाँ स्वतंत्रता रूपी रक्त का संचार हुआ उसके कुछ समय बाद 26 जनवरी 1950 को उसी रक्त में अधिकारिता की ऑक्सीजन का संचार हुआ। अतः स्वतंत्र भारत इस दिन गणतंत्र बना। भारत अपने स्वतंत्रता अभियान के लबे इतिहास के बाद आधुनिक संस्थागत ढांचे के साथ पूर्णरूप से संसदीय लोकतंत्र बना।
आज हम जिस संवैधानिक व राजव्यवस्था को देख रहे है वह एक तात्कालिक किसी घटना व परिदृश्य का फल ना होकर, विकास की एक लंबी यात्रा का प्रतिफल है वहीं स्वतंत्र और प्रभुसत्ता से सम्पन्न हमारे गणराज्य में जो आज लोकतांत्रिक व्यवस्था सतत् रूप से बनी हुई है। वह औपनिवेशिक शासन के विरूद्ध दीर्घकालिक संघर्षों का परिणाम है, और इस संघर्ष के दौरान औपनिवेशिक शासन प्रणाली का हमारे संविधान और राजनैतिक व्यवस्था पर गहरा प्रभाव है।
Bhartiya-Samvidhan-Ka-Itihas
इस लेख में हम यह देखेंगे कि कैसे अंग्रेजों ने ईस्ट इंडिया कंपनी के माध्यम से व्यापार की शुरूआत की और जो कि 1765 में बंगाल, बिहार और उड़ीसा के दीवानी अधिकार भी प्राप्त कर लिए। कंपनी ने कार्यों को नियमित व नियंत्रित करने की दिशा में पहला कदम 1773 के रेगुलेटिंग अधिनियम द्वारा चालू किया जो कि 1858 तक चला। 1857 के विद्रोह के पश्चात् ईस्ट इंडिया कंपनी को समाप्त कर दिया गया और गवर्नरों, क्षेत्रों और राजस्व संबंधी शक्तियाँ ब्रिटिश राजशाही को हस्तांतरित कर दी गईं। इसके बाद 1861, 1892, 1909, 1919, 1935 में सुधार हुए जिन्हें हम आगे देखेन वाले हैं। इसके साथ ही हम यह भी देखगें कि कैसे संविधान गठन की प्रक्रिया शुरू हुई। शुरूआत उन घटनाओं (अधिनियम) से करेंगे जिनके वजह से ब्रिटिश शासित भारत में सरकार व प्रशासन की विधिक रूपरेखा निर्मित की गई।

इन्हीं घटनाओं का क्रमवार ब्यौरा निम्नानुसार है-

1773 का रेगूलेटिंग एक्ट

इस अधिनियम के द्वारा भारत में कंपनी के शासन हेतु पहली बार एक लिखित संविधान प्रस्तुत किया गया। भारतीय संवैधानिक इतिहास में इसका विशेष महत्व है कि इसके द्वारा भारत में कपनी के प्रशासन पर बिटश संसदीय नियंत्रण की शुरूआत हुई।
ब्रिटिश संसद द्वारा पारित रेगूलेटिंग एक्ट कम्पनी के भारतीय प्रशासन पर संसदीय नियंत्रण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम था। रेगूलेटिंग एक्ट ने कंपनी के संचालन समिति के सदस्यों की अवधि एक वर्ष से बढ़ाकर चार वर्ष कर दी। उनके चुनाव में मतदान का अधिकार स्वामित्व-समिति के केवल उन्हीं सदस्यों को दिया गया जिनका साझा व्यापार कम-से-कम 1000 पौंड का था। यह व्यवस्था की गई कि संचालक समिति के एक-चौथाई सदस्य प्रति वर्ष अलग कर दिये जाएं और उतने ही नये सदस्य निर्वाचित किए जाएं। इस एक्ट के द्वारा भारत में कंपनी के अधिकृत प्रदेशों के लिए केन्द्रीय शासन की व्यवस्था की गई।
  • केन्द्रीय शासन के लिए बंगाल के गवर्नर को गवर्नर-जनरल बना दिया गया और उसकी सहायता के लिए 4 सदस्यों की एक कार्यकारिणी समिति का निर्माण किया गया। गवर्नर-जनरल तथा कार्यकारिणी के सदस्यों की अवधि 5 वर्ष रखी गई। इस एक्ट में प्रथम गवर्नर-जनरल तथा उसकी कार्यकारिणी के सदस्यों का उल्लेख किया गया। वॉरेन हेस्टिंग्ज को गवर्नर-जनरल और क्लेवरिंग, मानसन, वारवेल तथा फ्रांसिस को कार्यकारिणी का सदस्य नियुक्त किया गया। इनकी नियुक्ति इंग्लैंड के राजा ने की। भविष्य के लिए इन पदों पर नियुक्ति करने का अधिकार संचालक समिति को दिया गया। इन पदाधिकारियों को पदच्युत करने का अधिकार इंग्लैंड के राजा को दिया गया, परंतु इसका प्रयोग वह संचालक समिति की प्रार्थना करने पर ही कर सकता था। गवर्नर-जनरल तथा उसकी कार्यकारिणी के सभी निर्णय बहुमत से पारित करने की व्यवस्था की गई और गवर्नर-जनरल को निर्णयात्मक मत देने का अधिकार दिया गया।
  • मद्रास तथा बम्बई की सरकारों को संधि-विग्रह के विषय में बंगाल में स्थित केन्द्रीय सरकार के नियंत्रण में कर दिया गया परंतु तात्कालिक आवश्यकता पड़ने पर अथवा संचालक समिति की सीधी आज्ञा प्राप्त कर लेने पर वे गवर्नर-जनरल तथा उसकी कार्यकारिणी की अनुमति के बिना कार्य कर सकती थी।
  • इस एक्ट के द्वारा कलकत्ता में एक उच्चतम न्यायालय स्थापित किया गया। इसमें एक प्रधान न्यायाधीश तथा तीन सहायक न्यायाधीशों को नियुक्त करने की व्यवस्था की गई।
i. सर एलिजा इम्पे प्रथम प्रधान न्यायाधीश
ii. हाइड, चैम्बर्स, तथा लेमैस्टर-सहायक न्यायाधीश नियुक्त किये गए।
  • इस एक्ट के द्वारा कंपनी के कर्मचारियों के भ्रष्टाचार का अंत करने का भी प्रयास किया गया, इसलिए गवर्नर-जनरल तथा उसकी कार्यकारिणी के सदस्यों और उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों को इतना अधिक वेतन देने की व्यवस्था की गई। इनको तथा अन्य सभी कर्मचारियों को उपहार, भेंट आदि लेने और गवर्नर-जनरल, काउंसिल के सदस्यों तथा उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों को निजी व्यापार करने का निषेध कर दिया गया।
इस अधिनियम के प्रमुख प्रावधान निम्न है-
  • बंबई तथा मद्रास प्रेसीडेंसी को कलकत्ता के अधीन कर दिया गया
  • कलकत्ता प्रेसीडेंस में गवर्नर जनरल व चार सदस्यों वाले परिषद् के नियंत्रण में सरकार की स्थापना की गई।
  • कलकत्ता में एक सुप्रीम कोर्ट की स्थापना की गई, जिसके अंतर्गत बंगाल,बिहार, उड़ीसा शामिल थे।
  • भारत के सचिव की पूर्व अनुमति पर गर्वनर जनरल तथा उसकी परिषद (4सदस्य) को कानून बनाने का अधिकार प्रदान किया गया।
  • अब बंगाल के गर्वनर को तीनों प्रेसीडेंसियों का 'गर्वनर जनरल' कहा जाने लगा।
  • इस एक्ट के तहत बनने वाले बंगाल के प्रथम गर्वनर जनरल 'लॉर्ड वारेन हेस्टिंग्स' थे।
  • इस एक्ट के तहत कंपनी के कर्मचारियों को निजी व्यापार व भारतीय लोगों से उपहार/रिश्वत लेने को प्रतिबंधित कर दिया गया।

एक्ट ऑफ सेटलमेंट - 1781

रेग्युलेटिंग एक्ट की कमियों को दूर करने के उद्देश्य से यह एक्ट लाया गया था। - इस अधिनियम का प्रमुख प्रावधान गवर्नर जनरल की परिषद तथा सर्वोच्च न्यायालय के बीच के संबंधों का सीमांकन करना था। - न्यायालय की अपनी आज्ञाएं तथा आदेश लागू करते समय सरकार के कानून बनाने तथा उसका क्रियान्वयन समय भारत के
सामाजिक, धार्मिक रीति-रिवाजों का सम्मान करने का निर्देश दिया गया।
1781 ‘एक्ट ऑफ सेटलमेंट' या संशोधनात्मक विधेयक या बंगाल जूडीकेचर एक्ट
इस अधिनियम का मुख्य उद्देश्य रेगूलेटिंग एक्ट में व्याप्त गंभीर व्यावहारिक दोषों को दूर करना था। इस अधिनियम के द्वारा कम्पनी के पदाधिकारी अपने शासकीय रूप में किए गए कार्यों के लिए उच्चतम न्यायालय के अधिकार क्षेत्र से बाहर हो गए।

1784 पिट्स का अधिनियम

इस अधिनियम की मुख्य विशेषता यह थी कि ' निदेशक मडल' ( कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स) को कंपनी के व्यापारिक मामलों के अधीक्षण की अनुमति तो दे दी गई, लेकिन राजनीतिक मामलो के प्रबधन के लिये 'नियंत्रण बोर्ड' नाम से एक नए निकाय का गठन किया गया। इस प्रकार, भारत में द्वैध शासन व्यवस्था की शुरूआत हुई।
यह अधिनियम दो प्रमुख कारणों से महत्वपूर्ण था- पहला, भारत में कंपनी के अधीन क्षेत्रों को सर्वप्रथम 'ब्रिटिश आधिपत्य क्षेत्र' कहा गया, दूसरा, ब्रिटिश सरकार को भारत में कंपनी तथा प्रशासन संबंधी कार्यों पर पूर्ण नियंत्रण प्रदान किया गया।
गर्वनर जनरल की परिषद् की सदस्य संख्या 4 से घटाकर 3 कर दी गई। साथ ही, मद्रास तथा बंबई की सरकारों को पूरी तरह से बंगाल सरकार के अधीन कर दिया गया।
  • इस एक्ट ने कंपनी के मामलों और भारत में उसके प्रशासन पर ब्रिटिश सरकार को सर्वोपरि नियंत्रण का अधिकार दिया।
  • भारत के मामलों के लिए छः कमिश्नर नियुक्त किये गए, जिन्हें 'बोर्ड ऑफ कन्ट्रोल' कहा जाता था। इनमें मंत्रिमंडलीय स्तर के दो मंत्री थे।
  • बोर्ड ऑफ कन्ट्रोल का कार्य निदेशक मंडल तथा भारत सरकार का पथ प्रदर्शन करना तथा उन पर नियंत्रण रखना था।
  • भारत सरकार का संचालन गवर्नर - जनरल तथा तीन सदस्यों वाली एक काउंसिल को दे दिया गया, जिससे अगर गवर्नरजनरल को एक भी सदस्य का समर्थन मिल जाए तो वह जो करना चाहे कर सके।
  • गवर्नर - जनरल तथा उसकी परिषद् का बम्बई तथा मद्रास की प्रेसिडेंसियों पर नियंत्रण बढ़ा दिया गया और उसे अधिक प्रभावशाली बनाया गया।
  • गवर्नर-जनरल तथा उसकी परिषद् को ये आदेश दिये गये कि वह निदेशकों के प्राधिकरण की सुनिश्चित अनुमति के बिना कोई युद्ध अथवा संधि नहीं करे।
  • भारत तथा इंग्लैण्ड की अंग्रेजी प्रजा द्वारा भारत में किए गए अपराधों के लिए मुकदमा चलाने का प्रावधान किया गया।

1793 का चार्टर एक्ट
चार्टर एक्ट, 1793 के अंतर्गत कंपनी के चार्टर का आने वाले 20 वर्ष के लिए नवीनीकरण किया गया। नियंत्रण अधिकरण के सदस्यों को वेतन भारतीय कोष से मिलने लगा।

1813 का चार्टर एक्ट
  • इस अधिनियम के तहत, पहली बार भारत में ब्रिटिश क्षेत्र की संवैधानिक स्थिति को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया।
  • कुछ सीमाओं के तहत भारत के साथ व्यापार करने हेतु सभी ब्रिटिशवासियों के लिए मुक्त व्यापार की अनुमति दी गई।
  • कंपनी के चार्टर को पुनः 20 वर्षों के लिए बढ़ा दिया गया।
  • कंपनी के भारत में व्यापारिक एकाधिकार को समाप्त कर दिया गया।
  • चाय तथा चीन के साथ व्यापार का एकाधिकार कंपनी के लिए सुरक्षित रहने दिया गया।
  • कंपनी को एक लाख रुपये वार्षिक भारतीय साहित्य तथा शिक्षा पर व्यय करने का अधिकार दिया गया।
  • ईसाई मिशनरियों को लाइसेंस लेकर धर्म प्रचार की अनुमति दी गई।

1833 का चार्टर एक्ट
1833 के चार्टर एक्ट द्वारा विधायिका एवं कार्यपालिका के बीच शक्ति विभाजन का धुंधले संस्थागत स्वरूप के तत्व को समावेश किया गया। गवर्नर जनरल के विधि निर्माण अधिवेशन (भारत परिषद्) तथा उसके कार्यपालक अधिवेशन (भारत सरकार) के बीच अंतर किया गया। गवर्नर जनरल के विधि निर्माण परिषद् में एक विधिवेत्ता होता था।
  • कंपनी का व्यापारिक एकाधिकार पूर्णतः समाप्त कर दिया गया। अब कंपनी क्राउन के अधीन रहकर मूलतः एक प्रशासकीय इकाई बन गई।
  • सभी प्रशासकीय एवं वित्तीय अधिकार 'गवर्नर- जनरलइन- काउंसिल' के पास केन्द्रित हो गए। इनका अधिकार-क्षेत्र सम्पूर्ण भारत पर हो गया। कानून बनाने संबंधी अधिकार भी अन्य प्रेसीडेंसियों से लेकर इन्हें ही सौंप दिया गया।
  • बंगाल का गवर्नर-जनरल अब समस्त भारत का गवर्नर-जनरल बना।
  • गवर्नर-जनरल की काउंसिल में चौथा सदस्य (विधि-सदस्य) जुड़ा।
  • एक्ट के प्रावधानों के तहत समरूप कानून निर्माण हेतु एक विधि आयोग स्थापित हुआ।
  • एक्ट का खण्ड 87 महत्वपूर्ण था जिसमें कहा गया था कि कोई भी भारतीय धर्म, रंग, जन्म स्थान, वंश आदि के आधार पर कंपनी के अन्तर्गत किसी भी पद हेतु अयोग्य नहीं माना जाएगा।

1853 का चार्टर अधिनियम
1853 के चार्टर एक्ट द्वारा विधायिका एवं प्रशासनिक कार्यो को स्पष्ट रूप से अलग कर दिया गया। विधायी कार्यो के लिए परिषद् में 6 विशेष विधि सदस्य को जोड़ा गया। इन सदस्यों को विधि एवं विनियम के लिए बुलाई गई बैठकों के अलावा परिषद् में बैठने तथा मतदान करने का अधिकार नहीं था। केन्द्रीय विधान परिषद् में पहली बार स्थानीय प्रतिनिधित्व का समावेश किया गया।
  • भारतीय प्रशासन कंपनी के अधीन रहने दिया। उसके अधिकारों का नवीनीकरण-निश्चित अवधि के लिए नहीं बल्कि तब तक के लिए किया गया जब तक ब्रिटिश संसद अन्यथा निर्देश न दे।
  • कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स की सदस्य संख्या 24 से घटाकर 18 कर दी गई। इनमें से छः सदस्य क्राउन द्वारा मनोनीत किए जाने थे।
  • विधि-सदस्य को कार्यपालिका का पूर्ण सदस्य बना दिया गया और जब यह परिषद् कानून बनाने के लिए बैठे तो इसमें छः अन्य सदस्य भी शामिल किये जाने थे। ये सदस्य थे-प्रधान न्यायाधीश, एक अन्य न्यायाधीश तथा एक-एक प्रतिनिधि बंगाल, मद्रास, बम्बई एवं उत्तर प्रदेश के।
  • सरकारी नीतियों पर अब सवाल पूछे जा सकते थे, बहस हो सकती थी। कार्यवाहियाँ अब गुप्त नहीं बल्कि प्रकट और मौखिक होनी थीं।
  • नियुक्तियों के मामले में डायरेक्टरों का विशेषाधिकार अब समाप्त हुआ। सिविल सेवाएँ अब खुली प्रतियोगिता द्वारा आरंभ हुईं।

1858 का भारत सरकार अधिनियम
प्रमुख प्रावधान थे
शासन ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथ से निकलकर ब्रिटिश सम्राट के जिम्मे चला गया। कम्पनी की सेना ब्रिटिश सम्राट के अधीन हो गई। गवर्नर-जनरल वायसराय कहलाने लगा और वह सीधा सम्राट का प्रतिनिधि बन गया।
बोर्ड ऑफ कन्ट्रोल और कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स नामक संस्थाओं को समाप्त कर दिया गया और उनकी शक्तियाँ सेक्रेट्री ऑफ स्टेट फॉर इन्डिया और उसकी सभा इन्डिया काउंसिल (भारत परिषद्) को सौंप दी गई।
भारत राज्य सचिव ब्रिटिश मंत्रिमंडल का सदस्य था और ब्रिटिश संसद में बैठता था। वह भारत परिषद् का सभापतित्व करता था, और उसे निर्णायक मत देने का अधिकार था। भारत परिषद् 15 सदस्यों की एक समिति थी जिसके आठ सदस्य सम्राट द्वारा मनोनीत और सात सदस्य कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स द्वारा निर्वाचित होते थे। यह भारत परिषद् मात्र एक सलाहकार संस्था के रूप में काम करती थी।
प्रत्येक वर्ष भारत राज्य-सचिव (सेक्रेटरी ऑफ स्टेट) को एक रिपोर्ट भारत में राजस्व, रेलवे, कानून-निर्माण आदि के बारे में हाउस ऑफ कॉमन्स के समक्ष प्रस्तुत करनी थी।
भारत राज्य-सचिव, भारत-परिषद् की सलाह मानने के लिए भारतीय राजस्व के खर्च के विषय में निर्णय लेते समय ही बाध्य था।

1858 के अधिनियम द्वारा शुरू की गयी प्रणाली के मुख्य लक्षण निम्नलिखित थे:-
  • देश का प्रशासन न केवल ऐकिक था, बल्कि कठोरतापूर्वक केंद्रीकृत भी था।
  • राज्यक्षेत्र को प्रांतों में बांटा गया था और प्रत्येक के शीर्ष पर एक गवर्नर या लेफ्टिनेंट गवर्नर था तथा उसकी सहायता के लिए कार्यकारी परिषद् थी। प्रांतीय सरकारें भारत सरकार की अभिकरण मात्र थी। उन्हें प्रांतीय शासन से संबंधित सभी मामलों में गर्वनर जनरल के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण के अधीन काम करना पड़ता था।
  • कार्यों का कोई पृथक्करण नहीं था। भारत के शासन के लिए सभी प्राधिकार सिविल और सैनिक, कार्यपालक और विधायी परिषद गवर्नर जनरल में निहित थे जो सेक्रेटरी ऑफ स्टेट के प्रति उत्तरदायी था।
  • भारतीय प्रशासन पर सेक्रेटरी ऑफ स्टेट का अत्यधिक नियंत्रण था। इस अधिनियम द्वारा भारत के शासन या राजस्व के किसी भी प्रकार से संबंधित कार्यों, संक्रियाओं और बातों का अधीक्षण, निर्देशन और नियत्रण सेक्रेटरी ऑफ स्टेट में निहित किया गया था। ब्रिटिश संसद के प्रति अंतिम रूप से उत्तरदायी रहते हुए वह अपने अभिकर्ता गवर्नर जनरल के माध्यम से भारत का प्रशासन चलाता था। उसी का वाक्य अतिम होता था। चाहे वह नीति के विषय में हो या अन्य ब्यौरों के विषय में।
  • प्रशासन का संपूर्ण तंत्र अधिकार तंत्र था, जिसका भारत की जनता की राय से कोई लेना-देना नहीं था।
उपलब्धियाँ
भारत में क्राउन के प्रत्यक्ष शासन का आरंभ हुआ। इसके द्वारा जटिल और असुविधाजनक द्वैध शासन को समाप्त कर दिया गया। भारत मंत्री के रूप में एक विशेष पद की भी व्याख्या की गई। अब भारत के देशी राजाओं का क्राउन से सीधा सम्बन्ध स्थापित कर दिया गया। इससे डलहौजी द्वारा प्रारम्भ की गई 'हड़प की नीति' का अन्त हो गया।

1861 का भारतीय परिषद् अधिनियम
1861 के अधिनियम की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि इसमें लोक प्रतिनिधित्व के तत्व का नाममात्र के लिए समावेश किया गया था। वैसे इस अधिनियम की अन्य विशेषताएं निम्नलिखित थी-
  • ब्रिटिश सरकार ने वायसराय तथा प्रांतों के गवर्नर के अधिकार बढ़ा दिये।
  • व्यवस्थापन के कार्यों में गवर्नर जनरल को भारतीयों के साथ मिलकर कार्य करने का अधिकार दिया गया।
  • बंगाल तथा मद्रास की सरकारों को व्यवस्थापन का अधिकार दिया गया तथा अन्य प्रांतों में भी इसके समान व्यवस्थापिका परिषद् के लिए प्रावधान किया गया।
  • 'पोर्टफोलियो' व्यवस्था का प्रारंभ हुआ।
  • भारत के वायसराय को विपत्ति में अध्यादेश जारी करने का अधिकार दिया गया।
  • गैर-सरकारी सदस्यों के साथ व्यवस्थापन व्यवस्था को आरंभ किया गया।
कारण
  • 1857 के विद्रोह से परिवर्तन आवश्यक।
  • विधान परिषद् में प्रतिनिधित्व के लिए भारतीय माँग।
  • वायसराय की काउंसिल की शक्तियों को निश्चित करने की आवश्यकता।
  • भारतीय प्रशासन की कमजोरियाँ।
  • शासक एवं शासित के बीच की दूरी को कम करना।
  • 1858 के अधिनियम से केवल गृह सरकार में परिवर्तन हुए, भारतीय प्रशासन में कोई परिवर्तन नहीं हुआ।
अधिनियम की मुख्य बातें
  • वायसराय की कार्यकारिणी परिषद् का विस्तार किया गया। काउंसिल के सदस्यों की संख्या 4 से बढ़ाकर 5 कर दी गई। 5वाँ सदस्य कानूनी विशेषज्ञ को बनाया गया। अब इसे इम्पीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल कहा जाने लगा। वायसराय की कार्यकारिणी परिषद् में अतिरिक्त सदस्यों की संख्या 6 से 12 तक रखने की व्यवस्था की गई। इन सदस्यों की नियुक्ति 2 वर्षों के लिए होती थी।
  • असाधारण स्थिति से निपटने के लिए वायसराय को किसी भी विषय पर अध्यादेश जारी करने का अधिकार दिया गया।
  • वायसराय को बंगाल, पंजाब और उत्तर प्रदेश प्रांत में भी विधान परिषदें स्थापित करने का अधिकार दिया गया।
  • बम्बई तथा मद्रास की सरकारों से जो कानून बनाने का अधिकार छीन लिया गया था, कुछ प्रतिबन्धों के साथ उन्हें लौटा दिया गया।
  • वायसराय की कार्यकारी परिषद् में विभागीय व्यवस्था लागू हुई। अतः भारत सरकार की मंत्रिमंडलीय व्यवस्था की नींव पड़ी।
  • गवर्नर-जनरल को संकटकालीन अवस्था में विधान परिषद् की अनुमति के बिना ही अध्यादेश जारी करने की शक्ति दे दी गई। ये अध्यादेश अधिकाधिक 6 माह तक लागू रह सकते थे।
  • विधान परिषद् की शक्तियों को सीमित किया गया।

1892 का भारतीय परिषद् अधिनियम
इस अधिनियम द्वारा भारतीय और प्रांतीय विधान परिषदों के बारे में उल्लिखित स्थिति में दो सुधार किये गये जो निम्नलिखित है:-
भारतीय विधान परिषद् में शासकीय सदस्यों का बहुमत रखा गया, किंतु गैर-सरकारी सदस्य बंगाल चैम्बर ऑफ कॉमर्स और प्रांतीय विधान परिषद् द्वारा नाम निर्देशित होने लगे। प्रांतीय परिषदों के गैर-सरकारी सदस्य कुछ स्थानीय निकायों द्वारा नाम निर्दिष्ट किये जाने लगे। ये स्थानीय निकाय थे। विश्वविद्यालय, जिला बोर्ड, नगरपालिका आदि।
परिषदों को राजस्व और व्यय के वार्षिक कथन अर्थात् बजट पर विचार विमर्श करने और कार्यपालिका से प्रश्न पूछने की शक्ति दी गयी। इस अधिनियम की विशेषता इसका उद्देश्य था। जिसे भारत के लिए 'अंडर सेक्रेटरी ऑफ स्टेट' ने इस प्रकार स्पष्ट किया था, 'यह भारत के शासन का आधार विस्तृत करने और उसके कृत्यों को बढ़ाने के लिए और गैर-सरकारी तथा भारत के समाज के स्थानीय तत्वों को शासन के काम में भाग लेने का अवसर देने के लिए अधिनियम है।
  • वैधानिक कार्य के लिए गवर्नर की कार्यकारी परिषद् में अतिरिक्त सदस्यों की संख्या 10 और 16 के बीच कर दी गई।
  • अराजकीय सदस्यों की संख्या कुल का 2/5 भाग निश्चित की गयी।
  • अतिरिक्त सदस्यों की नियुक्ति के लिए एक अप्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली अपनायी गयी परंतु निर्वाचन शब्द से परहेज किया गया।
  • प्रान्तीय विधान परिषदों के अराजकीय सदस्यों को केन्द्रीय विधान परिषद् के लिए एक-एक सदस्य चुनने की अनुमति दी गयी।
  • विधान परिषद् की शक्तियाँ बढ़ा दी गईं। अब वह वार्षिक बजट पर बहस कर सकती थी।

भारत परिषद् अधिनियम (मॉर्ले-मिंटो सुधार) 1909
इस अधिनिमय का उद्देश्य उदारवादियों तथा उग्रवादियों की फूट का लाभ उठाना और 1906 में स्थापित मुस्लिम लीग के सहयोग से मुसलमानों का तुष्टीकरण करना था।
इसमें निम्न प्रावधान थे:-
  • केन्द्रीय परिषद् में विधि से संबंधित कार्यों के लिए अतिरिक्त सदस्यों की संख्या बढ़ाकर 60 कर दी गई।
  • अब 69 सदस्य होंगे जिसमें गवर्नर जनरल की कार्यकारी परिषद् के 8 एवं 1 असाधारण सदस्य शामिल थे।
  • अतिरिक्त 60 सदस्यों में से 33 मनोनीत और 27 निर्वाचित होने थे और इस निर्वाचन में विशेष निर्वाचन पद्धति से अधिक चयन होता था।
  • परिषद् के सदस्यों के अधिकारों में वृद्धि की गई और बजट पर बहस करने के साथ ही सामान्य सार्वजनिक हितों से संबंधित प्रस्तावों पर चर्चा करने तथा पूरक प्रश्न पूछने का भी अधिकार मिल गया।
  • प्रान्तीय विधान परिषदों में भी सदस्यों की संख्या बढ़ाई गई।
  • केन्द्रीय तथा प्रान्तीय गवर्नर की कार्यकारणी परिषद् में एक-एक भारतीय सदस्य शामिल किया गया। गवर्नर जनरल की कार्यकारणी में पहले भारतीय एस०पी० सिन्हा थे।
इस एक्ट का सबसे विवादित प्रावधान था मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन प्रणाली की व्यवस्था जिसमें न केवल सांप्रदायिक नेतृत्व दिया गया बल्कि तुष्टीकरण के लिए उनकी जनसंख्या से अधिक प्रतिनिधित्व दिया गया जो पहले ही मुस्लिम लीग के नेताओं एवं सरकार के बीच शिमला में मान्यता प्राप्त कर चुकी थी। तत्कालीन राज्य सचिव मार्ले ने मिण्टो को लिखा “हम भारत में ऐसा विषैला बीज बो रहे हैं जिसका फल अवश्य ही विषैला होगा" इस एक्ट को “हितैषी निरंकुश वाद" कहा जाता है तथा के० एम० मुंशी के अनुसार इस एक्ट ने भारत में उभरते प्रजातंत्र का गला घोंट दिया।
अधिनियम के निर्माण के मुख्य कारण
  1. 1892 के भारतीय परिषद् अधिनियम से भारतीय असंतुष्ट थे। सदस्यों को पूरक प्रश्न पूछने का अधिकार नहीं था। बजट पर कोई नियंत्रण नहीं था। कार्यकारिणी पूर्णतः अनुत्तरदायी थी।
  2. कांग्रेस के उग्रवादी गुट यह चाहते थे कि राजनीतिक अधिकारों को प्राप्त करने के लिए सरकार पर दबाव डाला जाए।
  3. कर्जन के कार्यों से उत्पन्न असंतोष को दूर करने के लिए।
  4. हिन्दू तथा मुस्लिम जनता में मतभेद पैदा करने के लिए साम्प्रदायिक जनमत प्रणाली अपनाई गई।
  5. इंग्लैंड में उदारवादी सरकार बनी जो कुछ हद तक भारतीयों के असंतोष को दूर करना चाहती थी।
  6. मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन मण्डल। इसका तात्पर्य है चुनाव क्षेत्रों को आरक्षित किए जाना जहाँ केवल मुस्लिम उम्मीदवार ही चुनाव दे सकते हैं और केवल मुस्लिम मतदाता ही वोट दे सकते हैं (जिसे Separate electrote कहते हैं।
अधिनियम के प्रमुख उपबन्ध
केन्द्रीय विधान सभा-केन्द्रीय विधान परिषद् में सदस्यों की संख्या बढ़ाकर 69 कर दी गई।
  • इनमें 37 सरकारी व 32 गैर-सरकारी सदस्य थे। सरकारी सदस्यों में 9 पदेन तथा 28 वायसराय द्वारा मनोनीत सदस्य थे। गैर-सरकारी सदस्यों में 5 का मनोनयन वायसराय स्वयं करता था। अतिरिक्त 27 निर्वाचित सदस्यों के कार्यकाल की अवधि तीन वर्ष निश्चित की गई।
  • 6 सदस्य मुस्लिम चुनाव क्षेत्र से चुने जाने थे। इसे ही पृथक निर्वाचन व्यवस्था कहा गया। इस एक्ट के द्वारा मुस्लिमों को पहली बार पृथक निर्वाचन दिया गया।

प्रांतीय विधानसभाएँ
विभिन्न प्रांतों की विधायिका में सदस्यों की संख्या भिन्न-भिन्न रखी गई यथा बंगाल (52), बंबई (47), मद्रास (47), यू. पी. (47), पंजाब (25), असम (41), बर्मा (16)।
प्रान्तीय विधायी काउंसिल के निर्वाचित सदस्य विश्वविद्यालयों की सीनेटों, जिला बोर्डों, नगरपालिकाओं, व्यापार-मण्डलों द्वारा चुने जाने थे।
चुनाव के लिए प्रत्याशियों तथा मतदाताओं की योग्यताएँ निश्चित करने के लिए अधिनियम बनाए गए।
'पृथक-निर्वाचन क्षेत्र' के लिए मुस्लिमों की माँग मान ली गई।
पहली बार भारतीयों को भारत सचिव की इण्डिया काउन्सिल और वायसराय की कार्यकारिणी परिषद् में स्थान दिया गया।
विधानसभाओं के कार्यों में वृद्धि-इस अधिनियम में विधानसभाओं के कार्यक्षेत्र का भी विस्तार किया गया। बजट पर बहस करने के लिए विस्तृत नियम बनाए गए। सदस्यों को सुझाव देने, प्रस्ताव प्रस्तुत करने तथा एक पूरक प्रश्न पूछने का भी अधिकार मिला किन्तु बजट पर मतदान का अधिकार नहीं था। अब सार्वजनिक हित के मामलों पर भी बहस हो सकती थी।
इस अधिनियम के द्वारा पहली बार भारतीय सदस्यों को भारत सचिव की परिषद् एवं वायसराय की कार्यकारिणी परिषद में शामिल किया गया। दो भारतीय-के.सी. गुप्ता एवं सैयद हुसैन बिलग्रामी को इंग्लैंड स्थित भारत परिषद् में नियुक्त किया गया।

मॉण्टेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार 1919
20 अगस्त, 1917 को 'अगस्त प्रस्ताव' के तहत तत्कालीन भारत सचिव मॉण्टेग्यू ने ब्रिटिश सरकार द्वारा लागू किये जाने वाले सुधारों की घोषणा की जिनमें मुख्यतः चार बातों का उल्लेख थाः
  • ब्रिटिश शासन का लक्ष्य भारत में स्वशासन को विकसित करना था। स्वशासन एकदम न देकर विभिन्न चरणों में दिया जाना था। विभिन्न चरणों का निर्धारण भारतीयों द्वारा स्वशासन की दिशा में की गई प्रगति पर निर्भर था। प्रगति के विषय में निर्धारण ब्रिटिश संसद तथा भारत सरकार द्वारा किया जाना था।
  • 1917 का अगस्त प्रस्ताव प्रथम शासकीय घोषणा थी जिसके द्वारा भारत को ब्रिटिश राष्ट्रमंडल के अन्य डोमिनियंस की तरह स्वतंत्र डोमिनियंस की स्थिति प्रदान करना प्रस्तावित था। 1917 के प्रस्ताव के बाद मॉण्टेग्यू भारत आये और चेम्सफोर्ड तथा अन्य नेताओं से शिमला में विचार किया। रिपोर्ट के सिद्धांतों को कार्य रूप देने के लिये 3 समितियां भी नियुक्त की गईं। इनमें पहली समिति चुनाव संबंधी समस्याओं को हल करने के लिये, दूसरी प्रांतों और केन्द्र सरकार के कार्यों का विभाजन करने के लिये बनाई गई थी।
  • इन दोनों समितियों की अध्यक्षता लॉर्ड साउथ बरो ने की। तीसरी समिति का उद्देश्य भारत मंत्री और इंडिया काउंसिल का भारत के शासन पर नियंत्रण कम करने की प्रक्रिया को निश्चित करना था। इसे पूर्व भारत मंत्री लॉर्ड किउ की अधीनता में बनाया गया था। इन सभी समितियों की संस्तुतियों पर ब्रिटिश संसद की प्रवर समिति ने अपनी रिपोर्ट दी। संसद में पारित होने के बाद 23 दिसंबर 1919 को भारत अधिनियम लागू हो गया।
  • भारत सचिव पर संसद का नियंत्रण बढ़ा दिया गया। अब तक भारत सचिव तथा उसके विभाग पर होने वाला खर्च भारत के राजस्व में से वसूल किया जाता था लेकिन अब यह सार खर्च ब्रिटिश संसद द्वारा स्वीकृत धनराशि में से किया जाने लगा। भारत परिषद् के सदस्यों की संख्या 15 से घटाकर कम-से-कम 8 और अधिकतम 12 कर दी गई। इसमें से आधे सदस्य वे होंगे जो दीर्घकाल से भारत में रहते आये हों। इन सदस्यों का कार्यकाल 5 वर्ष रखा गया। इंडिया काउंसिल में 3 भारतीयों की नियुक्ति का प्रावधान किया गया।
  • भारत सचिव के कार्यभार को कम करने के लिये एक भारतीय उच्चायुक्त की नियुक्ति इंग्लैंड में की गई तथा उसके वेतन, अधिकार, पेंशन का व्यय भारत के साधनों से होना था। उसका कार्य भारत सरकार के लिये अस्त्र-शस्त्र और अन्य सामान खरीदना, ठेके देना, व्यापारिक हितों को देखना, इंग्लैंड में पढ़ने वाले भारतीयों विद्यार्थियों की देखभाल करना आदि थे। भारत सरकार के परामर्श पर सम्राट इस हाई कमिश्नर की नियुक्ति करता था।

भारत सरकार
केन्द्रीय स्तर पर भारतीय विधान परिषद् के स्थान पर अब पहली बार एक द्विसदनात्मक विधानमंडल की स्थापना की गई। केन्द्रीय विधानमंडल के दो सदन थे-राज्य परिषद् तथा निम्न सदन केन्द्रीय विधान परिषद् कहलाती थी। राज्य परिषद् में 60 सदस्य होंगे जिसमें 27 मनोनीत और 33 निर्वाचित होने थे जबकि केन्द्रीय विधान परिषद् में 145 सदस्य होंगे जिसमें 104 निर्वाचित और 41 मनोनीत होने थे।

केन्द्रीय विधायिका
केन्द्रीय विधायिका के 3 अंग थे-गवर्नर-जनरल, काउंसिल ऑफ स्टेट तथा विधान परिषद्। काउंसिल ऑफ स्टेट के 60 सदस्य थे जिनमें 33 निर्वाचित सदस्य और 27 मनोनीत सदस्य थे। 27 मनोनीत सदस्यों में 20 सरकारी और 7 गैर-सरकारी थे। 33 निर्वाचित सदस्यों में 18 गैर-सरकारी निर्वाचित सदस्य (गैर मुस्लिम) तथा 11 मुस्लिम निर्वाचित सदस्य, 1 सिख निर्वाचित सदस्य और 3 यूरोपीयन वर्ग के प्रतिनिधि थे। काउंसिल ऑफ स्टेट के लिये मत का अधिकार बहुत ही ऊँची सम्पत्ति पर आधारित था। चुनाव का माध्यम प्रत्यक्ष मत प्रणाली था तथा सदन का जीवन काल 5 वर्षों का था। मतदाताओं की आयु लेजिस्लेटिव असेम्बली और काउंसिल ऑफ स्टेट दोनों के लिए ही 21 वर्ष थी। केन्द्रीय विधानमंडल के सदस्य केन्द्रीय सरकार से प्रश्न एवं पूरक प्रश्न भी पूछ सकते थे।

प्रांतीय सरकार
प्रांतीय क्षेत्र में द्वैध शासन प्रणाली की स्थापना इस अधिनियम की मुख्य विशेषता थी। सर्वप्रथम सभी प्रांतों को एक समान स्तर प्रदान किया गया। अब तक ब्रिटिश भारत में तीन प्रकार के प्रांत थे-गवर्नर के प्रांत, चीफ कमिश्नर के प्रांत तथा लेफ्टिनेंट गवर्नर के प्रांत। प्रत्येक गवर्नर के प्रांत में विधान परिषद् नाम का एक सदनात्मक विधानमंडल होता था। प्रांतीय विधान मंडलों में सदस्यों की संख्या भिन्न-भिन्न प्रांतों में भिन्न-भिन्न थी। इसमें प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली अपनाई गई और प्रांतों को अनेक चुनाव क्षेत्रों में बांट दिया गया। मत देने का अधिकार संपत्ति पर आधारित योग्यता थी
और सांप्रदायिक आधार पर आरक्षण की व्यवस्था थी। प्रारंभ में महिलाओं को मताधिकार नहीं दिया गया था लेकिन बाद में उन्हें अधिकार दिया गया। प्रांतीय विधानमंडल की अवधि 3 वर्ष की थी परन्तु प्रांत का गवर्नर इस अवधि के पूर्व भी इसे भंग कर सकता था।
1919 के अधिनियम की मुख्य विशेषता यह थी कि प्रांत और केन्द्र के अधिकार क्षेत्रों का परिसीमन किया गया। अब प्रशासन के समस्त विषयों को केन्द्रीय तथा प्रांतीय दो वर्गों में विभक्त किया गया। केन्द्रीय वर्ग में प्रतिरक्षा, विदेश नीति, सार्वजनिक ऋण, रेलवे, जनगणना आदि विषय निर्धारित किये गये जबकि प्रांतों को स्थानीय स्वशासन, स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, पुलिस, जेलखाने आदि विषय दिये गये।
प्रांतीय विषयों को 2 उपवर्गों में विभाजित किया गया-आरक्षित एवं हस्तांतरित। आरक्षित विषयों का शासन प्रांतीय गवर्नर अपनी कार्यकारिणी के परामर्श के अनुसार करता था। इसके शासन में उत्तरदायित्व के सिद्धांत को नहीं लागू किया गया था। मुख्य आरक्षित विषय थे-पुलिस, जेल, शांति व्यवस्था, न्याय, भूमि और राजस्व का प्रबंध आदि। ये विषय कार्यकारिणी के सदस्यों द्वारा शासित होते थे। जो विधानपालिका के प्रति उत्तरदायी न होकर गवर्नर के प्रति उत्तरदायी होते थे। हस्तांतरित विषयों का शासन उन मंत्रियों के हाथों में था जिनकी नियुक्ति गवर्नर द्वारा विधानसभा के निर्वाचित सदस्यों में से की जाती थी। मुख्य हस्तांतरित विषय - थे-स्वशासन संस्थाएं, सार्वजनिक स्वास्थ्य, चिकित्सा, शिक्षा, खेती, सिंचाई, सहकारी समितियां आदि। इस तरह विषयों के विभाजन के कारण इसे द्वैध शासन कहा गया।

मॉण्टेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार के प्रमुख तथ्य
  • भारत राज्य सचिव का वेतन भारतीय राजस्व से दिया जाने लगा।
  • वायसराय के कुछ अधिकारों को लेकर एक नये पदाधिकारी (भारतीय उच्चायुक्त) की नियुक्ति की गई जिसका वेतन भारत से दिया जाना था। इस एक्ट ने केन्द्रीय शासन व्यवस्था में उत्तरदायित्व लाने का कोई प्रयास नहीं किया किन्तु प्रान्तों में इसका आरंभ अवश्य किया।
  • अब वायसराय की कार्यकारणी में आठ सदस्यों में से 3 सदस्य भारतीय होने लगे।
  • प्रान्तों में द्वैध शासन लागू किया, जिसके तहत शासन के विषयों को आरक्षित एवं हस्तान्तरित विषयों में बाँटा गया। आरक्षित विषयों पर गवर्नर जनरल व उसकी परिषद् का और हस्तान्तरित विषयों पर विधान परिषद् को कानून बनाने का अधिकार था।
  • प्रांतीय विषयों का बंटवारा किया गया-
1. आरक्षित- पुलिस, राजस्व, वित्त, न्याय, सिंचाई आदि,
2. हस्तान्तरित- स्वास्थ्य, शिक्षा, धार्मिक प्रबंधन, कृषि विभाग मापतौल व सार्वजनिक निर्माण विभाग आदि।
  • इस तरह विषयों का बंटवारा अस्पष्ट और विरोधाभासी बना रहा और मंत्रिपरिषद की गवर्नर पर निर्भरता बनाए रखी गई।
  • केन्द्र में 'द्विसदनीय व्यवस्था लागू की गई जिसमें राज्य परिषद् उच्च सदन थी तो केन्द्रीय विधान सभा निम्न सदन थी।
  • केन्द्रीय विधान सभा का कार्यकाल 3 वर्ष का था जिसे वायसराय बढ़ा भी सकता था।
  • राज्य परिषद् में 60 सदस्य थे जिसमें 26 मनोनीत व 34 निर्वाचित होने थे। इसका कार्यकाल 5 वर्षों का होता था।
  • महिलाओं को अभी सदस्यता का अधिकार नहीं प्राप्त था।
  • केन्द्रीय विधान सभा में 145 सदस्य होने थे जिसमें 104 निर्वाचित तथा 41 मनोनीत होने थे।
  • किन्तु मताधिकार केवल उन्हें दिया गया जिनकी वार्षिक आय 10,000 रु० थी।
  • सांप्रदायिक निर्वाचन प्रणाली का विस्तार कर इसे एग्लों इण्डियन तथा सिक्खों तक पहुँचा दिया गया।
  • विशेष यह था कि अब विधान परिषद् के सदस्यों को महत्त्वपूर्ण विषयों पर मताधिकार भी दे दिया गया।
  • कांग्रेस ने इसे असंतोषजनक अधिनियम कहा।

भारत सरकार अधिनियम, 1935
भारत सरकार अधिनियम, 1935 एक बहुत ही विस्तृत व महत्वपूर्ण अधिनियम था। इसमें 321 खण्ड, 451 धाराएँ और 10 अनुसूचियाँ थीं। इस अधिनियम की एक प्रमुख विशेषता यह थी कि इसकी कोई प्रस्तावना नहीं थी। भारत शासन अधिनियम के 1919 की प्रस्तावना को ही इसकी प्रस्तावना के रूप में स्वीकार किया गया था।
इस एक्ट में 321 धाराएं व 10 अनुसूचियाँ थी। 1919 के एक्ट से आगे बढ़ते हुए प्रांतों में पूर्ण उत्तरदायी सरकार की स्थापना की गई किन्तु केन्द्र में द्वैध शासन लगा दिया गया।
  • संघीय ढांचा - ब्रिटिश प्रांतों तथा मुख्य आयुक्त के प्रांतों को अनिवार्यतः शामिल कर तथा देशी रियासतों को ऐच्छिक सहभागिता के आधार पर भारत संघ के निर्माण की योजना बनाई गई। यह संघ तभी अस्तित्व में आ सकेगा, जब रियासतों के न्यूनतम आधे प्रतिनिधि चुनने वाली रियासतें शामिल हों। रियासतों की कुल जनसंख्या की आधी जनसंख्या वाली रियासतें भी इसमें शामिल हो।
  • द्विसदनीय ढांचा - प्रथम राज्य परिषद जो स्थाई सभा, जिसके 1/3 सदस्य प्रत्येक तीन वर्ष बाद अवकाश प्राप्त करते है तथा कुल सदस्य 260 (156 प्रान्तों से चुने गये+104 रियासतों से मनोनीत सदस्य) (156+104) होंगे।
  • द्वितीय संघीय सभा - इसके सदस्य 5 वर्ष के लिए तथा कुल सदस्य 375 (250 सदस्य प्रांतों से और 125 सदस्य रियासतों से) होंगे।
  1. बर्मा को भारत से और सिंध को मुम्बई प्रांत से अलग कर दिया गया।
  2. सांप्रदायिक निर्वाचन प्रणाली का और विस्तार किया गया। भारत में संघीय न्यायालय और संघीय बैंक की स्थापना की गई।
  3. नेहरू ने इसे 'दासता का चार्टर' कहा है और इसे “अनेक ब्रेको वाली इंजन रहित गाड़ी" की संज्ञा दी।
  4. जिन्ना ने पूर्णतया सड़ा हुआ मूल रूप से बुरा और बिल्कुल अस्वीकृत करार दिया।
भारत सरकार अधिनियम की विषय-वस्तु के निम्न स्रोत
  • साइमन कमीशन की रिपोर्ट
  • नेहरू समिति की रिपोर्ट
  • तीनों गोलमेज सम्मेलनों में हुए वाद-विवाद
  • संवैधानिक प्रस्तावों का श्वेत-पत्र
  • संयुक्त प्रवर समिति की रिपोर्ट
  • लॉर्ड लोथियन रिपोर्ट
1935 के अधिनियम की विशेषताएँ
  1. ब्रिटिश भारतीय प्रान्तों और इच्छुक भारतीय रियासतों के मिले-जुले एक अखिल भारतीय संघ का प्रस्ताव।
  2. द्वैध शासन के स्थान पर प्रान्तों में उत्तरदायी सरकार तथा प्रान्तीय स्वशासन का सुझाव।
  3. अंग्रेजी संसद की सर्वोच्चता की पुनरावृत्ति।
  4. गवर्नर-जनरल और गवर्नरों के पास अंग्रेजी हितों की सुरक्षा के लिए बहत-सी शक्तियाँ दी गईं।
  5. साम्प्रदायिक और पृथक मतदाता प्रणाली का और अधिक विस्तार किया गया।
  6. संविधान संशोधन की शक्ति केवल अंग्रेजी संसद के पास रही।
  7. संघीय न्यायालय, संघीय बैंक, संघीय लोक सेवा आयोग तथा संघीय रेलवे अधिकरण के लिए प्रावधान।
  8. केन्द्र में द्वैध शासन की स्थापना की गयी।
  9. केन्द्रीय विधानमंडल में दो सदनों की व्यवस्था की गयी-संघीय सभा तथा राज्य परिषद् जिनके सदस्य क्रमश: 375 व 260 निर्धारित किए गए।
  10. भारत परिषद् को समाप्त कर दिया गया।
  11. विषयों के विभाजन के लिए तीन सूचियाँ बनाई गईं-संघीय सूची, प्रान्तीय सूची तथा समवर्ती सूची। संघीय सूची में 59 विषय, प्रान्तीय सूची में 54 विषय और समवर्ती सूची में 36 विषय रखे गए।
भारत सरकार अधिनियम 1935 से संबंधित विशेष तथ्य
  • संघीय न्यायालय, जिसमें मुख्य न्यायाधीश तथा छः अतिरिक्त न्यायाधीश हो सकते थे, अक्टूबर 1937 में स्थापित किया गया।
  • बर्मा को भारत से अलग कर दिया गया।
  • प्रान्तीय स्वशासन ग्यारह गवर्नरों के प्रान्तों में लागू हुआ।
  • बंगाल, बम्बई, मद्रास, बिहार, उत्तर प्रदेश और असम में द्विसदनीय विधानमंडल, शेष में एकसदनीय।

अगस्त 1940 के प्रस्ताव
द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान राष्ट्रवादियों के गैर-समझौतावादी रुख को देखते हुए, समर्थन पाने हेतु वायसराय ने अगस्त 1940 में एक प्रस्ताव रखा जिसमें निम्न बातें शामिल थीं-
  • भारत को औपनिवेशिक स्वशासन मिलेगा।
  • वायसराय की कार्यकारिणी परिषद् का विस्तार होगा।
  • परामर्शदात्री परिषद् की स्थापना की जाएगी।
  • अल्पसंख्यकों को विश्वास दिलाया गया कि जब भी भारतीय संविधान में संशोधन होंगे उनकी सुरक्षा की जाएगी।
  • युद्ध के अन्त में भारतीयों की एक संविधान सभा बुलाई जायेगी जो भारत का संविधान बनाएगी।
इस प्रस्ताव के तहत कांग्रेस की विधान सभा की मांग स्वीकार की गयी। कांग्रेस ने अगस्त-प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया। मुस्लिम लीग ने इन प्रस्ताव के कुछ भागों का स्वागत किया क्योंकि इन भागों में भारतीय संविधान के अन्तर्गत मुस्लिम वर्ग के हितों को सुरक्षित रखने का आश्वासन था।

क्रिप्स प्रस्ताव, 22 मार्च, 1942
कारण
  1. द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान सिंगापुर, मलाया व रंगून में अंग्रेजी सेनाओं की हार के बाद भारत पर जापानी आक्रमण का भय बढ़ा।
  2. अंग्रेजी सरकार ने अमेरिकी राष्ट्रपति रूजवेल्ट की सलाह मानकर रक्षात्मक नीति अपनायी।
  3. कांग्रेस को केवल उदारवादी संवैधानिक प्रस्तावों द्वारा ही मनाया जा सकता था। क्रिप्स शिष्टमंडल 22 मार्च, 1942 को भारत पहुंचा और अपनी योजना प्रस्तुत की, जो इस प्रकार थी-
  • युद्ध समाप्त होने के बाद भारत को पृथक होने के अधिकार सहित डोमिनियन स्टेटस दे दिया जाएगा।
  • युद्ध समाप्ति के बाद एक संविधान निर्मात्री सभा का गठन किया जाएगा। इसमें ब्रिटिश भारत व देशी रियासतों के प्रतिनिधि होंगे।
  • संविधान निर्माण करने वाली सभा का चुनाव प्रांतीय विधान सभाओं के निम्न सदन द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के अनुसार किया जाएगा।
अंग्रेजी सरकार इस नये संविधान को स्वीकार कर लेगी
  • जो एक अथवा अधिक प्रान्त इस नए संविधान को स्वीकार न करे, उन्हें एक अलग संघ तथा संविधान बनाने की अनुमति होगी।
  • अंग्रेजी सरकार इस नए संविधान बनाने वाली संस्था से एक संधि करेगी।
नोट- कांग्रेस व मुस्लिम लीग दोनों ने ही इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया।

राजगोपालाचारी फार्मूला
भारत में स्वतंत्रता प्राप्ति हेतु कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग के बीच समझौते की आवश्यकता को महसूस करते हुए राजगोपालाचारी ने एक फार्मूला तैयार किया जो 'राजगोपालाचारी फार्मूला' के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इसे वर्ष 1944 में तैयार किया गया।
उद्देश्य
  1. लीग कांग्रेस की स्वतंत्रता की माँग का समर्थन करेगी।
  2. लीग कांग्रेस के साथ केन्द्र में अस्थायी सरकार बनाने में सहयोग करेगी।
  3. युद्ध के पश्चात् भारत के पूर्व तथा उत्तर-पश्चिम मुस्लिम बाहुल्य जिलों की सीमाओं को रेखांकित करने हेतु एक समिति की स्थापना की जायेगी।
  4. ये शर्ते तभी स्वीकार की जाएंगी जब इंग्लैंड शक्ति का स्थानांतरण करे।

वैवेल योजना तथा शिमला समझौता
  • क्रिप्स मिशन की असफलता के बाद, युद्ध में भारतीयों का लॉर्ड वैवेल ने एक योजना बनाई जिस पर विचार करने के लिए 21 भारतीय नेताओं को शिमला कॉन्फ्रेंस (24 जून - 14 जुलाई, 1945) में आमंत्रित किया गया।
  • इस शिमला वार्ता का एक अन्य उद्देश्य था-क्रिप्स प्रस्तावों में प्रस्तावित 'वायसराय की कार्यकारिणी परिषद्' के लिए एक सर्वसम्मत योजना बनाना।
वैवेल योजना के प्रस्ताव
  1. गवर्नर-जनरल और प्रधान सेनापति के अतिरिक्त सभी कार्यकारी पार्षद भारतीय होंगे।
  2. हिन्दुओं व मुसलमानों को समान प्रतिनिधित्व मिलेगा।
  3. गवर्नर-जनरल को अपनी कार्यकारी परिषद् के निर्णयों को बदलने का अधिकार होगा, परन्तु वह इस शक्ति का प्रयोग अकारण नहीं करेगा।
  4. नई कार्यकारी परिषद् वर्तमान भारतीय संविधान के अधीन कार्य करेगी।

कैबिनेट मिशन 1946
मार्च 1946 में तीन सदस्यीय पैथिक लॉरेंस की अध्यक्षता वाला कैबिनेट मिशन भारत आया। मिशन के प्रस्तावों में भारत को संघ बनाने और उसका विभाजन करने के बीच समझौता लाने का प्रयत्न किया गया। लेकिन इसके प्रस्तावों पर आमसहमति नहीं बन पाई। मुस्लिम लीग ने इसलिए अस्वीकार किया क्योंकि इसमें पृथक संविधान सभा और मुसलमानों के लिए पृथक राज्य के दावे को स्पष्टतः नामंजूर कर दिया गया। दूसरी ओर कांग्रेस ने इसलिए अस्वीकार किया, क्योंकि इस मिशन के तहत् प्रांतीय विधानमंडलों को तीन समूहों में बाँटने एवं उनके अनिवार्य सामूहीकरण करने तथा देशी रियासतों के प्रतिनिधियों के मनोनयन जैसे प्रावधान से कांग्रेस संतुष्ट नहीं थी। परन्तु फिर भी संविधान सभा के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका रही।
कैबिनेट मिशन ने संविधान के लिए बुनियादी ढाँचे का प्रारूप पेश किया और संविधान निर्माण-निकाय द्वारा अपनायी जाने वाली प्रक्रिया का विस्तार से वर्णन किया गया। साथ ही इसने संविधान सभा के गठन के लिए स्पष्ट एवं ठोस प्रारूप प्रस्तुत किया जो निम्न प्रकार था। कैबिनेट मिशन के अनुसार संविधान सभा के गठन की सर्वाधिक न्यायोजित एवं व्यवहार्य योजना यह थी कि हाल ही में निर्वाचित प्रांतीय विधानसभा का उपयोग निर्वाचक निकायों के रूप में किया जायें। प्रत्येक प्रांत, देशी रियासत या रियासतों के समूह को उनकी जनसंख्या के अनुपात में सीटें दी जायें। मोटे तौर पर यह अनुपात 10 लाख की जनसंख्या पर एक सीट का रखा गया, जिससे ब्रिटिश शासक के प्रत्यक्ष शासन वाले प्रांतों को 292 और देशी रियासतों को 93 सीटें आबंटित की गई। प्रत्येक प्रांत में इन सीटों को तीन प्रमुख समुदायों मुस्लिम, सिख एवं सामान्य के बीच उनके जनसंख्या के अनुपात में बाँटा गया।
प्रांतीय विधानसभाओं में प्रत्येक समुदाय के सदस्यों ने अपने प्रतिनिधियों को अनुपातिक प्रतिनिधित्व एवं एकल संक्रमणीय मत पद्धति द्वारा चुना। देशी रियासतों के प्रतिनिधियों के चुनाव की प्रक्रिया उनके परामर्श से तय की गयी थी।

कैबिनेट मिशन प्लान
परिस्थितियाँ
  • एक जुलाई 1945 को चर्चिल की रूढ़िवादी सरकार के स्थान पर एटली की श्रमिक दल की सरकार ने इंग्लैण्ड में शासन संभाला।
  • भारत को स्वतंत्रता प्रदान करने हेतु इंग्लैंड पर बढ़ता हुआ अंतर्राष्ट्रीय दबाव।
  • फरवरी, 1946 में भारतीय नौसेना विद्रोह से जन-आंदोलन की जनक्रांति की ओर उन्मुखता।
  • भारत में इंग्लैंड के सैनिक तथा असैनिक साधनों में कमी।
  • 1945-46 के आम चुनाव से यह स्पष्ट हो गया कि मुस्लिमों पर मुस्लिम लीग का उतना ही प्रभाव है जितना कि हिन्दुओं पर कांग्रेस का।
कैबिनेट मिशन 24 मार्च, 1946 को दिल्ली पहुंचा और 16 मई, 1946 को अपने प्रस्ताव प्रकाशित कर दिए। इस मिशन के सदस्य-स्टैफर्ड क्रिप्स, पैथिक लॉरेंस, ए.वी. अलेक्जेण्डर थे।

शिष्टमंडल की सिफारिशें
  1. पाकिस्तान की माँग अस्वीकृत कर दी गई।
  2. अंग्रेजी भारत और भारतीय रियासतों के लिए एक संघ होना चाहिए, जो प्रतिरक्षा, विदेशी मामले तथा संचार व्यवस्था पर नियंत्रण रखे।
  3. अन्य सभी विभाग विद्यमान प्रादेशिक विधानसभाओं के पास रहने थे।
  4. अवशिष्ट शक्तियाँ प्रान्तों के पास रहनी थी।
  5. प्रान्तों के लिए अलग-अलग कार्यपालिका तथा विधानमंडल होंगे।
  6. संविधान सभा के गठन के लिए प्रावधान-
  • इसमें प्रत्येक प्रान्त को उसकी जनसंख्या के अनुपात में स्थान दिए जाएंगे।
  • सदस्यों की कुल संख्या 289 होगी जिसमें 93 भारतीय राज्यों के प्रतिनिधि होंगे।
  • प्रत्येक वर्ग अपने लिए उपसंविधान बना सकेगा।
  • दस वर्ष पश्चात् संविधान को पुनः संशोधित करने का अवसर होगा।
7. भारतीय रियासतों से अंग्रेजी सर्वश्रेष्ठता समाप्त हो जाएगी।
मिशन ने कांग्रेस तथा लीग दोनों दृष्टिकोण के मध्य एक मार्ग निकालने का प्रयत्न किया। संविधान सभा का जनसंख्या के अनुपात में गठन किया गया। भारत विभाजन की माँग अस्वीकार कर दी गई। अंतरिम सरकार में समस्त उत्तरदायित्व भारतीयों को - सौंप दिये गए।
2 सितंबर, 1946 को अन्तरिम सरकार बनी। 15 अक्टूबर, 1946 को मुस्लिम लीग भारतीय राष्ट्रीय सरकार में सम्मिलित हो गयी।

भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947
  • भारत स्वतंत्रता अधिनियम 1947 के द्वारा ब्रिटिश सरकार के नियंत्रण से हट कर भारत को पूर्ण स्वाधीनता मिली।
  • इसी अधिनियम के तहत 1935 के अधिनियम को संशोधित कर भारत एवं पाकिस्तान दोनों को अलग-अलग अंतरिम संविधान प्राप्त हुआ। इसके अनुसार तय हुआ कि 15 अगस्त 1947 से भारत तथा पाकिस्तान नामक दो अधिराज्य होंगे। तथा जो ब्रिटिश राज से मुक्त होंगे।
  • दोनों राज्य अपनी-अपनी संविधान सभा में अपने देश के लिए संविधान का निर्माण कर सकते है तथा उन्हें ब्रिटिश कॉमनवेल्थ से पृथक् होने का अधिकार होगा। जब तक नया संविधान बनता है, तब तक 1935 के अधिनियम के अनुसार शासन चलेगा। दोनों राज्यों की व्यवस्थापिकाओं द्वारा बनाये गये कानूनों को इस आधार पर निरस्त नहीं किया जायेगा कि ये ब्रिटिश कानून या भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम से मेल नहीं रखते। भारत की संविधान सभा की प्रथम बैठक 9 दिसम्बर 1946 को हुई थी। 14 अगस्त 1947 को पुनः इसके बैठक बुलाई गई और इसने भारत के लिए नया संविधान बनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी गयी।
माउन्टबेटन योजना या बाल्कन प्लान या स्वतंत्रता अधिनियम, 1947
24 मार्च, 1947 ई. को नियुक्त माउन्टबेटन ने भारत के बँटवारे को अवश्यम्भावी देखते हुए जून, 1947 ई. में भारत विभाजन की योजना प्रस्तुत कर दी। 20 फरवरी, 1947 ई. को एटली ने घोषणा की कि जून 1948 के पूर्व शक्ति का हस्तांतरण भारत को कर दिया जाएगा। भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम द्वारा 3 जून की योजना को वैधानिक रूप दिया गया। ब्रिटिश संसद ने 4 जुलाई, 1947 को भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम पारित कर दिया।

इस अधिनियम में कुछ प्रमुख बातें-
  • दो अधिराज्यों की स्थापना।
  • संविधान सभाओं को सत्ता सौंपना।
  • भारत और पाकिस्तान के लिए अलग-अलग गवर्नर-जनरल।
  • संविधान सभा का विधानमंडल के रूप में कार्य करना।
  • 1935 के अधिनियम द्वारा शासन, जब तक नया संविधान नहीं बनाया जाता है।
  • राष्ट्रमण्डल को छोड़ने का अधिकार।

सी. आर. फार्मूला
सरकार को यह बात स्पष्ट हो गई थी कि बिना मुस्लिम लीग की सहमति के भारत की समस्या का समाधान नहीं किया जा सकता। राजगोपालाचारी, जो कि कांग्रेस एवं मुस्लिम लीग के समझौते के पूर्ण पक्षधर थे, ने इन दोनों के बीच समझौते के लिए एक योजना प्रस्तुत की। सी. आर. फार्मूले के अनुसार गांधीजी ने पाकिस्तान की मांग को स्वीकार कर लिया। इस फार्मूले के अनुसार, मुस्लिम लीग भारतीय स्वतंत्रता की मांग का समर्थन करे और अस्थायी सरकार के गठन में कांग्रेस के साथ सहयोग करे।
द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति पर भारत के उत्तर-पश्चिम व पूर्वी भागों में स्थित मुस्लिम बहुसंख्यक क्षेत्रों की सीमा का निर्धारण करने के लिए एक कमीशन नियुक्त किया जाए। मतगणना से पूर्व सभी राजनीतिक दलों को अपने दृष्टिकोण के प्रचार की पूर्ण स्वतंत्रता हो। देश विभाजन की स्थिति में रक्षा, यातायात या अन्य अनिवार्य विषयों पर आपसी समझौते की व्यवस्था की जाए। जिन्ना ने इस फार्मले को अस्वीकार कर दिया तथा बिना किसी समझौते के पाकिस्तान की मांग पर अटल रहे।

गाँधी-जिन्ना वार्ता
हिंदू सम्प्रदायवादियों के कड़े विरोध के बावजूद गाँधीजी ने जिन्ना को राजगोपालाचारी फॉर्मूले पर वार्ता करने के लिए बुलाया। दो सप्ताहों से अधिक समय तक चलने के पश्चात् भी यह वार्ता विफल रही। गाँधीजी ने सी. आर. फार्मूले के तहत पंजाब तथा असम के विभाजन की बात कही जिसे जिन्ना ने ठुकरा दिया। गाँधीजी ने भी जिन्ना द्वारा मुसलमानों के पृथक देश होने की बात नहीं मानी।

देसाई-लियाकत वार्ता
गांधी-जिन्ना वार्ता के उपरांत जिन भारतीय नेताओं ने भारत की सांप्रदायिक समस्या का हल निकालने का प्रयास किया उनमें भूलाभाई देसाई एवं लियाकत अली प्रमुख थे। इसे इतिहास में देसाई-लियाकत वार्ता के नाम से जाना जाता है। देसाई-लियाकत वार्ता के तहत कांग्रेस तथा लीग इस बात पर सहमत हो गये कि वे केंद्र में मिलकर एक अंतरिम सरकार बनायें। यह सरकार निम्नलिखित नियमों के अनुसार काम करेगी-
  1. अल्पसंख्यकों और विशेष रूप से अनुसूचित जातियों और सिखों के प्रतिनिधियों को अंतरिम सरकार में सम्मिलित किया जायेगा।
  2. प्रधान सेनापति को इस सरकार में सम्मिलित किया जायेगा। इस सरकार का निर्माण एवं क्रियान्वयन भारत सरकार अधिनियम के तहत होगा।
  3. केंद्रीय सरकार के लिए कांग्रेस एवं लीग बराबर व्यक्तियों को नामांकित करेंगे। इन नामांकित सदस्यों के लिए यह आवश्यक नहीं होगा कि वे केन्द्रीय विधानसभा के सदस्य हों।
लियाकत-देसाई वार्ता को कांग्रेस और लीग ने व्यावहारिक रूप से मान्यता नहीं प्रदान की परन्तु वायसराय लॉर्ड वैवेल ने इस समझौते का स्वागत किया।

वैवेल योजना एवं शिमला सम्मेलन (1945 ई.)
लॉर्ड वैवेल जो कि भारत को विभाजित करने का विरोधी था, ने भी कांग्रेस और लीग के मध्य समझौता कराने की कोशिश की। वैवेल मार्च 1945 में ब्रिटिश सरकार से सलाह करने इंग्लैंड गय तथा जून में वापस लौट आया। इसी समय भारत के मंत्री एमरी ने हाउस ऑफ कॉमंस में कहा कि 1942 ई. का जो प्रस्ताव था वह अब भी ज्यों का त्यों है। अपने प्रस्ताव को कार्यरूप में परिवर्तित करने के लिए उसने शिमला में भारत के नेताओं का सम्मेलन बुलाया। इसमें जो सुझाव रखे गए थे उसका नाम वैवेल योजना है। वैवेल योजना के अनुसार-
  1. केंद्र में ऐसी कार्यपालिका बनाना जिसमें अधिकांश व्यक्ति भारतीय रुचि के हों और हिन्दु-मुसलमान बराबर की संख्या में हों।
  2. वायसराय और प्रधान सेनापति को छोड़ कर उसके शेष सदस्य भारतीय हों।
  3. एक भारतीय सदस्य ही विदेशी मामलों की अध्यक्षता करे।
  4. ब्रिटिश कमिश्नर भारत आकर रहे जो ब्रिटेन के व्यापारिक लाभों का ध्यान रख सके।
22 जून 1945 को शिमला में हुए सर्वदलीय सम्मेलन में कुल 22 प्रतिनिधियों ने भाग लिया, जिनमें प्रमुख नेता थे-जवाहरलाल नेहरू, इस्माइल खान, जिन्ना, सरदार पटेल, अबुल कलाम आजाद, खान अब्दुल गफ्फार खान और तारा सिंह। इस सम्मेलन के अंत में धर्म के मुद्दे पर कांग्रेस और लीग के मध्य गतिरोध उत्पन्न हो गया।
कांग्रेस ने कार्यकारिणी में दो मुसलमान सदस्यों को नामांकित किया। लीग ने इस बात पर आपत्ति व्यक्त करते हुए कहा कि भारत में मुसलमानों का एकमात्र प्रतिनिधि दल मुस्लिम लीग है, अतः केवल वही मुसलमानों को कार्यकारिणी में नामांकित कर सकती है कांग्रेस नहीं। कांग्रेस का कहना था कि वह ऐसी राजनीतिक संस्था है जो भारत के सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व करती है। अतः वह किसी भी धर्म के लोगों को कार्यपालिका में भेजने को स्वतंत्र है। इसी विवाद के पश्चात् वायसराय ने कोई समझौता नहीं होते देख शिमला सम्मेलन को असफल घोषित कर दिया।

भारत में आम चुनाव : दिसंबर 1945
द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के पश्चात ब्रिटेन में हुए चुनावों में क्लीमेंट एटली की अध्यक्षता वाली 'लेबर पार्टी' सत्ता में आई। एटली ब्रिटिश प्रधानमंत्री बने तथा उन्होंने सर पैथिक लॉरेंस को भारत सचिव नियुक्त किया। एटली ने भारत में प्रथम कार्यवाही के तहत आम चुनाव करवाया, जिसमें केन्द्रीय विधानमण्डल की 102 सीटों में से 57 सीटों पर कांग्रेस को सफलता मिली। कांग्रेस को प्रांतीय चुनावों में भी बंगाल, सिंध एवं पंजाब के अतिरिक्त अन्य संस्थानों पर बहुमत मिला। कांग्रेस ने बंबई, मद्रास, संयुक्त प्रांत, उड़ीसा, असम, बिहार तथा मध्य प्रांत में अपनी सरकारों की स्थापना की। मुस्लिम लीग को बंगाल एवं सिंध में बहुमत प्राप्त हुआ। पंजाब में कांग्रेस, अकालियों तथा यूनियनिस्ट पार्टी ने मिलकर सरकार का गठन किया।

शाही नौसेना विद्रोह
18 फरवरी 1946 को बम्बई बंदरगाह में नौसैनिक प्रशिक्षण पोत तलवार पर नाविक, खराब भोजन एवं नस्लवादी बर्ताव के विरोध में भूख हड़ताल पर बैठ गए। विद्रोहियों ने बेड़े के मस्तूलों पर तिरंगे, चांद तथा हसिया हथौड़ों के निशान वाले झंडे जो क्रमशः कांग्रेस, लीग एवं कम्युनिस्ट झंडे के प्रतीक थे, को एक साथ लहराया। हड़ताली नाविकों ने एक नौसेना केन्द्रीय हड़ताल समिति का चुनाव किया जिसके प्रमुख एम. एस. खान थे।
उनकी मांगों में बेहतर खाना तथा गोरे एवं भारतीय नाविकों के लिए समान वेतन की मांग की गई। साथ ही उन्होंने आजाद हिंद फौज के एवं अन्य राजनीतिक कैदियों की रिहाई और इंडोनेशिया से सैनिकों के वापस बुलाए जाने की मांगें रखी। लेकिन ये लोग शांतिपूर्ण हड़ताल और पूर्ण विद्रोह के मध्य पशोपेश में पड़े रहे जो घातक सिद्ध हुआ। 20 फरवरी को इन्होंने अपने-अपने जहाजों में लौट जाने के आदेश का पालन किया जहां सेना के गार्डों ने इन्हें घेर लिया।
सरदार पटेल ने जिन्ना के साथ मिलकर नाविकों को आत्मसमर्पण करने के लिये 23 फरवरी को तैयार कर लिया क्योंकि पटेल को आशंका थी कि ब्रिटिश कहीं ज्यादा कठोर कदम उठा सकते हैं। उनके इस आकलन की पुष्टि बाद में वी. सी. दत्त ने भी की जो नाविकों के एक महत्वपूर्ण नेता थे। पटेल ने 22 फरवरी 1946 को नेहरू को लिखा कि नौसेना और सेना की ताकतें इतने जबरदस्त ढंग से जुटी हैं कि विद्रोहियों को पूरी तरह नष्ट किया जा सकता है। कम्युनिस्टों को भी शांति स्थापित करने की जरूरत महसूस हो रही थी।
कराची के नाविक विद्रोह के दौरान कम्युनिस्ट पार्टी तथा कांग्रेस दोनों की गाड़ियां शांति स्थापित करने के लिए शहरों में घम रही थीं। नौसेना केन्द्रीय हडताल समिति ने अपने अंतिम संदेश में कहा कि हमारी हड़ताल हमारे राष्ट्र के जीवन की एक ऐतिहासिक घटना रही है। पहली बार सेना को जवानों और आम आदमी का रक्त एक साथ तथा एक लक्ष्य के लिए सड़कों पर बहा है। हम फौजी इसे कभी नहीं भूलेंगे। हमारी महान जनता जिंदाबाद-जय हिंद।

कैबिनेट मिशन
मार्च 1946 को भारत सचिव लॉर्ड पैथिक लॉरेंस, व्यापार बोर्ड के अध्यक्ष स्टैफर्ड क्रिप्स और नौसेना प्रमुख ए. वी. एलेक्जेण्डर को भारतीयों से समझौता के लिए भेजा गया। इसे हम कैबिनेट मिशन के नाम से जानते हैं। कैबिनेट मिशन के द्वारा दूसरा शिमला सम्मेलन बुलाने के बाद भी कोई समझौता नहीं हो सका। अंत में मई 1946 में कैबिनेट मिशन ने अपना प्रस्ताव जारी कर दिया।
इसके निम्नलिखित उपबंध थे-
  • इसने भारत के विभाजन के प्रस्ताव को रद्द कर दिया। उसका मानना था कि इस विभाजन से पंजाब और बंगाल में नए प्रकार की समस्याएं जन्म लेंगी और हिन्दू-मुस्लिम जनसंख्या के बीच समझौता मुश्किल हो जाएगा।
  • इसके बदले उसने प्रांत और केंद्र के बीच मध्यवर्ती ढांचे का सुझाव दिया। इसके अनुसार सम्पूर्ण भारतीय प्रांतों को तीन संघों-उत्तरी-पूर्वी, उत्तरी-पश्चिमी और शेष भारत में विभाजित कर दिया जाए। प्रांतों को यह अधिकार दिया जाए कि वे अपना पृथक संविधान बना सकें और अपना संविधान लागू कर सकें। इस तरह हम देखते हैं कि कैबिनेट मिशन ने भी विभाजन को प्रोत्साहित किया क्योंकि लीग उसमें पाकिस्तान की छवि पा सकती थी।
  • कैबिनेट मिशन ने एक संविधान सभा के गठन की अनुशंसा की। संविधान सभा के सदस्य प्रांतीय परिषद् से चुने जाने थे।
  • इसके अनुसार एक अंतरिम सरकार की स्थापना की बात की गई।

संविधान सभा का चुनाव : जुलाई, 1946
कैबिनेट मिशन योजना के अनुसार जुलाई, 1946 में चुनाव हुए। इन चुनावों में कांग्रेस ने ब्रिटिश भारतीय प्रांतों के 296 स्थानों में से 205 पर जीत दर्ज की। मुस्लिम लीग ने केवल 73 सीटें जीतीं, जिससे लीग के नेता बौखला गए। अंतरिम सरकार की स्थापना से संबंधित एक नया प्रस्ताव वायसराय द्वारा कांग्रेस एवं लीग के समक्ष प्रस्तुत किया गया। इस प्रस्ताव के अनुसार अंतरिम सरकार के कुल 14 सदस्यों में से 6 कांग्रेस मनोनीत करेगी, 5 सदस्य मुस्लिम लीग के तथा 3 अल्पसंख्यक वर्ग के प्रतिनिधि होंगे। मुस्लिम लीग ने यह प्रस्ताव नामंजूर कर दिया तथा 'स्वतंत्र' एवं पूर्ण प्रभुतासम्पन्न पाकिस्तान' राज्य की स्थापना के लिए एक प्रस्ताव पारित कर 'सीधी कार्रवाई' की घोषणा कर दी।

सीधी कार्यवाही दिवस : 16 अगस्त, 1946
12 अगस्त, 1946 को वायसराय ने पंडित जवाहरलाल नेहरू को अंतरिम सरकार बनाने का निमंत्रण भेजा। मुस्लिम लीग ने इसका विरोध करते हुए प्रत्यक्ष कार्यवाही की धमकी दी। 16 अगस्त, 1946 का दिन मुस्लिम लीग ने 'प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस' के रूप में मनाने की घोषणा कर दी।
16 अगस्त एवं उसके बाद के दिनों में भयानक साम्प्रदायिक दंगे हुए। दंगाइयों ने मारकाट, आगजनी तथा लूटपाट सहित अनेक अनैतिक घटनाओं को अंजाम दिया। सांप्रदायिक दंगों का सर्वाधिक वीभत्स रूप बंगाल के नोआखली एवं बिहार में देखने को मिला वहाँ व्यापक पैमाने पर सामूहिक नरसंहार की कई घटनाओं घटीं। बंगाल में मुस्लिम लीग की सरकार के मुख्यमंत्री सुहरावर्दी ने भी दंगों को प्रोत्साहित किया। महात्मा गाँधी ने दंगों के दौरान नोआखली का दौरा शांति की पुन:स्थापना के लिए किया।

संविधान सभा और अंतरिम सरकार
7 जून, 1946 को कांग्रेस कमेटी को नेहरू ने संबोधित करते हुए कहा कि कांग्रेस संविधान सभा में सम्मिलित होगी। एक संप्रभु निकाय होने के कारण विधान सभा कार्यप्रणाली के नियमों को सूत्रबद्ध करेगी। नेहरू के भाषण का तात्कालिक लाभ उठाकर 29 जुलाई, 1946 को लीग ने कैबिनेट मिशन प्लान को अस्वीकृत कर दिया। 1946 में संविधान सभा का गठन हो गया किंतु लीग अपना पृथक संविधान चाहती रही। 2 सितंबर, 1946 को जवाहरलाल नेहरू के अधीन 14 सदस्यीय अंतरिम सरकार गठित हुई। लीग उससे बाहर रही। 26 अक्टूबर, 1946 को लीग अंतरिम सरकार में शामिल हुई। पं. नेहरू इस सरकार के उपाध्यक्ष थे। सरदार बलदेव सिंह रक्षा मंत्री, लियाकत अली वित्त विभाग के प्रमुख थे।
मुस्लिम लीग ने 16 अगस्त, 1946 को पाकिस्तान को प्राप्त करने के लिये प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस मनाने की घोषणा की तथा नारा दिया कि “लड़कर लेंगे पाकिस्तान'। लीग के इस कदम ने देश को साम्प्रदायिक आग के दलदल में झोंक दिया। दंगों का प्रारंभ 16-19 अगस्त को कलकत्ता से हुआ जो 1 सितंबर को बंबई को प्रभावित करते हुए पूर्वी बंगाल के नोआखाली, गढ़मुक्तेश्वर तक फैल गया।
मार्च 1947 तक इसने सारे पंजाब को लपेट लिया। सबसे अधिक हिंसा पंजाब में हुई। मार्च 1947 में लीग के जत्थे ने पंजाब में सविनय अवज्ञा आंदोलन छेड़ दिया। उस समय खिज्र हयात खान की सरकार कम्युनिस्ट, अकाली तथा अन्य पार्टियों के सहयोग से खड़ी थी। मार्च 1947 में खिज्र हयात खान की सरकार गिर गई। कलकत्ता में लीग सरकार थी और उसने सीधी कार्यवाही के दिन छुट्टी घोषित कर दी थी। वहां मैदान में होने वाली सभा में मुख्यमंत्री सुहरावर्दी के यह आश्वासन देने के बाद कि पुलिस और सेना हस्तक्षेप नहीं करेगी, मुसलमानों ने हमले प्रारंभ कर दिये। प्रत्युत्तर में हिंदुओं ने भी हमले किये। 19 अगस्त तक कम-से-कम 4000 लोग मारे गए।
25 अक्टबर को नोआखाली दिवस मनाये जाने के दौरान बिहार में अति भयंकर दंगे हुए। यहां मुसलमानों के खिलाफ हिंदू किसानों ने सामूहिक रूप से विद्रोह किया। इसमें कम-से-कम 7000 लोग मारे गए। क्षुब्ध और बदहवास नेहरू ने रिपोर्ट दी कि बिहार जो राष्ट्रवादी कांग्रेस का तथा किसान सभा का गढ़ रहा है, के लोगों पर पागलपन सवार है। उन्होंने यह भी कहा कि कांग्रेसी प्रशासन एवं दल के अनेक सदस्यों ने भी हिंदू सम्प्रदायवाद के सामने घुटने टेक दिए हैं।
नेहरू द्वारा बिहार की भर्त्सना से हिंदुओं में जो वैमनष्यपूर्ण प्रतिक्रिया हुई उसके प्रति पटेल में सहानुभूति थी। उन्होंने 11 नवंबर 1946 को राजेन्द्र प्रसाद को लिखा कि “यदि हमने बिहार के लोगों एवं वहां की सरकार को लीगी नेताओं के हिंसक एवं अशोभनीय आक्रमणों का शिकार होने दिया तो यह हमारी भूल होगी।"

संविधान सभा की रचना

कैबिनेट मिशन योजना में ब्रिटिश भारत के लिए जो 296 स्थान निर्धारित किए गए थे, उनके लिए निर्वाचन जुलाई-अगस्त में सम्पन्न हुए। इनमें से 208 स्थान कांग्रेस ने प्राप्त किए। इनमें 4 मुख्य आयुक्त के स्थान, 3 मुस्लिम सीट तथा 3 सिख सीट थे।
मुस्लिम लीग ने 78 मुस्लिम स्थानों में से 73 सीटों पर विजय प्राप्त की। इनमें अकेले बंगाल की 32 सीटें शामिल थीं। इस चुनाव में विभिन्न दलों की दलीय स्थिति निम्नांकित रही-
  • कांग्रेस - 208
  • मुस्लिम लीग - 73
  • यूनियनिस्ट पार्टी - 01
  • यूनियनिस्ट मुस्लिम - 01
  • साम्यवादी - 01
  • स्वतंत्र - 08
  • अनुसूचित जाति परिसंघ - 01
  • कृषक प्रजा पार्टी - 01
  • सिख (कांग्रेस से पृथक) - 01
कांग्रेस द्वारा प्राप्त कुल 208 स्थानों में 29 अनुसूचित जाति के सदस्य, 6 भारतीय ईसाई, 3 आंग्ल भारतीय, 3 पारसी तथा 4 कबाइली जातियों के सदस्य थे।
आगे विभाजन की योजना स्पष्ट होने पर संविधान सभा की सदस्यता को पुनः व्यवस्थित किया गया। अब संविधान सभा में 296 के स्थान पर 235 सदस्य ब्रिटिश भारत से रह गए तथा देशी रियासतों की संख्या भी 93 के स्थान पर 89 रह गई। इस प्रकार कुल सदस्यों की संख्या 359 से घटकर 324 रह गई।

स्वतंत्रता के पथ पर भारत

20 फरवरी 1947 को एटली की सरकार ने दो महत्वपूर्ण घोषणाएं की। प्रथम घोषणा यह कि हर हालत में 30 जून, 1948 तक भारत को स्वतंत्र कर दिया जायेगा। दूसरे लॉर्ड माउण्टबेटन को वायसराय बनाकर भेजा जाएगा। वैसे अब तक भारत की परिस्थितियाँ ब्रिटिश सरकार के शासन के अनुरूप नहीं रह गई थीं तथा ब्रिटिशों के मन में यह धारणा बैठ गई थी कि जितनी जल्दी हो सके भारत को छोड़ दिया जाये। वैवेल ने 1946 में ही 'ब्रेक डाउन प्लान' प्रस्तुत करके 31 मार्च 1948 तक अंग्रेजों को पूर्णरूपेण भारत छोड़ने का सुझाव दिया था।
भारत आगमन के पश्चात् माउण्टबेटन ने तीव्र गति से स्वतंत्रता को लागू करने की दिशा में प्रयास प्रारंभ किया। 24 मार्च और 6 मई के बीच भारतीय नेताओं के साथ 133 साक्षात्कारों की तीव्र श्रृंखला के बाद माउण्टबेटन ने तय किया कि कैबिनेट मिशन की रूपरेखा अव्यावहारिक हो चुकी है। तब उन्होंने एक वैकल्पिक योजना बनाई जिसे 'प्लान बाल्कन' का गुप्त नाम दिया गया। 'प्लान बाल्कन' में विभिन्न प्रांतों अथवा यदि हस्तांतरण से पूर्व संघ बन जाये तो संघों को, सत्ता का हस्तांतरण करने की बात निर्धारित की गई थी जिसमें पंजाब तथा बंगाल की विधायिकाओं को यह निर्णय करने का अधिकार होता कि वे चाहें तो अपने प्रांतों का विभाजन कर लें।
इस प्रकार बनने वाली विभिन्न इकाइयां और रजवाड़े सर्वोच्चता समाप्त होने से स्वतंत्र हो जायेंगे और उनको यह स्वतंत्रता होगी कि वे चाहें तो भारत या पाकिस्तान में मिलें या स्वतंत्र रहें। जब यह योजना 10 मई को शिमला में नेहरू को व्यक्तिगत रूप से बताई गई तो उन्होंने इस पर अत्यंत तीखी प्रतिक्रिया प्रकट की। अतः यह योजना त्याग दी गई। दरअसल नेहरू ने विखंडन के इस प्रस्ताव में भारत को छोटे-छोटे राज्यों में बांटकर उसे उत्तरी आयरलैंड जैसी समस्या बनाने की साम्राज्यवादी चाल को पहचान लिया था।
ब्रिटिश शासन के बढ़ते विरोध को देखते हुए माउण्टबेटन ने स्वतंत्रता की समय सीमा को और भी कम करना चाहा। ब्रिटिश कैबिनेट ने माउण्टबेटन को निर्णय लेने की स्वतंत्रता दी। माउण्टबेटन ने स्वतंत्रता की समय सीमा कम करके 15 अगस्त 1947 कर दी।

माउण्टबेटन योजना
माउण्टबेटन 3 जून, 1947 को एक योजना लाया। यही योजना इंडिया इंडिपेंडेंस एक्ट का आधार बनी। माउण्टबेटन प्लान के निम्नलिखित उपबंध थे-
सिंध और बलूचिस्तान की विधान परिषदों को निर्णय लेना था कि वे भारत के साथ रहेंगे या पाकिस्तान के साथ।
पंजाब और बंगाल की विधान परिषदों को दोहरे निर्णय लेने थे। प्रथम क्या ये राज्य पाकिस्तान के साथ जाना पसंद करेंगे और अगर हां तो क्या राज्य का विभाजन भी होना है।
उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत और असम के सिलहट जिले में प्रत्यक्ष जनमत संग्रह होना था।
चूंकि देश का विभाजन होना था इसलिए सीमा विभाजन के लिए सीमा आयोग गठित करने का प्रावधान था। साथ ही भारतीय खजाने का बंटवारा होना था। (55 करोड़ रुपये पाकिस्तान को दिया जाना था।)
बंगाल में अनेक लीग नेता दूरस्थ पंजाब द्वारा शासित होने की बात से प्रसन्न नहीं थे और वहां सुहरावर्दी और अबुल हासिम ने संयुक्त एवं स्वतंत्र बंगाल की योजना प्रस्तुत भी की थी। पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत में अब्दुल गफ्फार खां के नेतृत्व में एक स्वतंत्र पठान राज्य की मांग की जा रही थी।
3 जून की योजना ने ऐसी सभी सम्भावनाओं पर रोक लगा दी क्योंकि अब प्रांतीय विधायिकाएँ भारत अथवा पाकिस्तान इन दोनों में से किसी एक को चुनने के लिये बाध्य हो गईं। 4 जुलाई, 1947 को ब्रिटिश संसद ने माउण्टबेटन प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया और 18 जुलाई को इसे ब्रिटिश क्राउन की स्वीकृति मिल गई तथा 15 अगस्त को इसे लागू कर दिया गया और इसी के साथ देश आजाद हो गया।

माउण्टबेटन योजना की मुख्य बातें
3 जून, 1947 को माउण्टबेटन ने अपनी योजना दोनों दलों के सामने रखी, जिसमें निम्नलिखित बातें थीं-
  • ब्रिटिश सरकार शीघ्रातिशीघ्र भारत का शासन जनता द्वारा निर्मित सरकार को सौंपना चाहती है।
  • ब्रिटिश सरकार वर्तमान संविधान सभा के कार्यों में कोई बाधा डालना नहीं चाहती है।
  • वर्तमान संविधान सभा द्वारा निर्मित संविधान भारत के उस भाग पर लागू नहीं होगा जो उसे स्वीकार नहीं करेगा।
  • सिंध प्रांत की विधानसभा को भी अपनी इच्छा प्रकट करने का अवसर दिया जाएगा।
  • मुस्लिम बहुल सिलहट जिला, जो असम में है, वनों तथा सीमा प्रांत में जनमत द्वारा निर्णय होगा।
  • देशी रियासतों का मामला कैबिनेट मिशन की योजना के अनुसार हल किया जाएगा।
  • यदि पाकिस्तान का निर्माण हुआ तो दोनों की सीमा का निर्धारण एक आयोग करेगा।

भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम जुलाई 1947
ब्रिटिश संसद ने माउंटबेटन योजना के आधार पर भारतीय स्वतंत्रता विधेयक का प्रारूप तैयार किया। इस विधेयक जुलाई, 1947 को स्वीकृति मिल गई तथा यह अधिनियम 'भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947' कहलाया। इस अधिनियम के प्रमुख बातें निम्नलिखित हैं-
  • 15 अगस्त, 1947 को भारत और पाकिस्तान नामक दो डोमीनियम स्थापित किए जाएंगे।
  • पाकिस्तान के अंतर्गत पूर्वी बंगाल, पश्चिमी पंजाब, सिन्ध और पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत सम्मिलित होंगे। असम का सिलहट जिला पूर्वी बंगाल के अन्तर्गत रहेगा।
  • देशी रजवाड़े भारत या पाकिस्तान किसी में भी सम्मिलित हो सकते हैं।
  • भारत तथा पाकिस्तान के विधानमण्डल को अपने-अपने क्षेत्र के लिए कानून बनाने का अधिकार होगा तथा 15 अगस्त, 1947 के बाद ब्रिटिश संसद द्वारा पारित कोई भी कानून इन डोमिनियनों में वैध नहीं होगा।
  • भारत शासन अधिनियम, 1935 के प्रावधानों के अनुसार इन दोनों डोमिनियनों का शासन तब तक चलेगा, जब तक कि संबंधित विधानसभा इसके लिए कोई संविधान तैयार नहीं कर लेती।

स्वतंत्रता प्राप्ति : 15 अगस्त, 1947
14-15 अगस्त, 1947 की मध्यरात्रि को भारत स्वतंत्र हो गया। पं. जवाहरलाल नेहरू ने उस रात्रि को दिल्ली में संविधान निर्मात्री सभा को संबोधित करते हए अपने ऐतिहासिक भाषण में कहा – “वर्षों पहले हमने किस्मत के साथ बाजी लगाई थी, अब समय आ गया है कि हम अपनी प्रतिज्ञा को पूरी तरह न ही सही लेकिन काफी हद तक पूरा करें। मध्यरात्रि में जब सारी दुनिया सो रही होगी, भारत नई जीवन की स्वतंत्रता लेकर जागेगा। यह क्षण जो इतिहास में विरले ही आता है, ऐसा होता है जब हम पुरातन से नूतन की ओर जाते हैं, जब एक युग समाप्त होता है, जब राष्ट्र की बहुत दिनों से दबी-आत्मा को वाणी मिल जाती है। यह उपयुक्त है कि हम इस पवित्र-क्षण में भारत तथा उसकी जनता की सेवा और उससे भी अधिक मानवता के उद्देश्य की पूर्ति के लिए अपने आपको अर्पित करें। आज हम एक दुर्भाग्यपूर्ण अवधि को समाप्त कर रहे हैं और भारत को अपने महत्व का फिर एक बार अहसास हो रहा है। आज हम जिस उपलब्धि को मना रहे हैं, वह निरंतर प्रयास की उपलब्धि है, जिसके परिणामस्वरूप हमने उन प्रतिज्ञाओं को पूरा कर लिया है।

संविधान सभा की समितियां

2 साल, 11 माह और 18 दिनों में संविधान सभा की कुल 11 बैठकें हुई। संविधान निर्माताओं ने लगभग 60 देशों के संविधानों का अवलोकन किया और इसके प्रारूप पर 114 दिनों तक विचार हुआ। संविधान के निर्माण पर कुल 64 रुपये लाख का खर्च आया।
24 जनवरी, 1950 को संविधान सभा की अंतिम बैठक हुई। इसके बाद सभा ने 26 जनवरी, 1950 से 1951-52 में हुए आम चुनावों के बाद बनने वाली नई संसद के निर्माण तक भारत की अंतरिम संसद के रूप में काम किया।
संविधान सभा ने संविधान के निर्माण से संबंधित विभिन्न कार्यों को करने के लिए कई समितियों का गठन किया। इनमें से 8 बड़ी समितियां थीं तथा अन्य छोटी। इन समितियों तथा इनके अध्यक्षों के नाम इस प्रकार हैं:-

बड़ी समितियां
  • 1. संघ शक्ति समिति-जवाहरलाल नेहरू
  • 2. संघीय संविधान समिति-जवाहरलाल नेहरू
  • 3. प्रांतीय संविधान समिति-सरदार पटेल
  • 4. प्रारूप समिति-डॉ.बी.आर.अंबेडकर
  • 5. मौलिक अधिकारों एवं अल्पसंख्यकों संबंधी परामर्श समिति-सरदार पटेल
इस समिति की दो उप-समितियां थीं:
(क) मौलिक अधिकार उप-समिति-जे.बी.कृपलानी
(ख) अल्पसंख्यक उप-समिति-एच.सी.मुखर्जी
  • 6. प्रक्रिया नियम समिति-डॉ.राजेंद्र प्रसाद
  • 7. राज्यों के लिये समिति (राज्यों से समझौता करने वाली)-जवाहरलाल नेहरू
  • 8. संचालन समिति-डॉ. राजेंद्र प्रसाद

छोटी समितियां
  • 1. संविधान सभा के कार्यों संबंधी समिति-जी.वी. मावलंकर
  • 2. कार्य संचालन समिति-डॉ.के.एम.मुंशी
  • 3. सदन समिति-बी.पट्टाभिसीतारमैय्या
  • 4. राष्ट्र ध्वज संबंधी तथर्द समिति-डॉ. राजेंद्र प्रसाद
  • 5. मौलिक अधिकारों, अल्पसंख्यकों एवं जनजातियों तथा बहिष्कृत क्षेत्रों के लिए सलाहकार समिति (परामर्शदाता समिति)-सरदार पटेल। इस समिति के अंतर्गत निम्नलिखित उप-समितियां थीं:
(क)उत्तर-पूर्व सीमांत जनजातिय क्षेत्र असम को छोड़कर तथा आंशिक रूप से छोड़े गए क्षेत्र के लिए उप-समिति-गोपीनाथ बरदोई।
(ख)छोड़े गए एवं आंशिक रूप से छोड़े गए क्षेत्रों (असम में स्थित क्षेत्रों के अलावा) के लिए उप-समिति ए.वी. ठक्कर)
  • 6. क्रीडेंस्यिल समिति-सर अल्लादी कृष्णस्वामी अय्यर
  • 7. वित्त एवं कर्मचारी (स्टॉफ) समिति-डॉ. राजेन्द्र प्रसाद
  • 8. हिंदी अनुवाद समिति
  • 9. उर्दू अनुवाद समिति
  • 10. प्रेस दीर्घा समिति
  • 11. भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 के प्रभाव का आकलन करने वाली समिति
  • 12. मुख्य आयुक्तों के प्रांतों के लिए समिति-बी. पट्टाभिसीतारमैय्या
  • 13. भाषायी प्रांतों संबंधी आयोग
  • 14. वित्तीय प्रावधानों संबंधी विशेषज्ञ समिति
  • 15. सर्वोच्च न्यायालय के लिए तदर्थ समितियां-एस. वरदाचरियार

प्रारूप समिति
संविधान सभा की सभी समितियों में सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण थी प्रारूप समिति। इसका गठन 29 अगस्त, 1947 को हुआ था। जिन्हें संविधान प्रारूप की जिम्मेदारी मिली थी जिनके नाम निम्न हैं-
  1. डॉक्अर बी.आर. अंबेडकर (अध्यक्ष)
  2. एन.गोपालस्वामी आयंगार
  3. अल्लादी कृष्णस्वामी अय्ययर
  4. डॉक्टर के.एम. मुंशी
  5. सैय्यद मोहम्मद सादुल्ला
  6. एन.माधव राव (इन्होंने बी.एल. मित्र की जगह ली, जिन्होंने स्वास्थ्य कारणों से त्याग-पत्र दे दिया था)
  7. टी.टी. कृष्णामाचारी (इन्होंने सन् 1948 में डी.पी. खैतान की मृत्यु के बाद उनकी जगह ली)

संविधान का प्रभाव में आना

डॉ.बी.आर. अंबेडकर ने सभा में 4 नवंबर, 1948 को संविधान का अंतिम प्रारूप पेश किया। इस बाद संविधान पहली बार पढ़ा गया। सभा में इस पर पांच दिन (9 नवंबर, 1949 तक) आम चर्चा हुई।
संविधान पर दूसरी बार 15 नवंबर, 1948 से विचार होना शुरू हुआ। यह कार्य 17 अक्टूबर, 1949 तक चला। इस अवधि में कम से कम 7653 संशोधन प्रस्ताव आये, जिनमें से वास्तव में 2473 पर ही सभा में चर्चा हुयी।
संविधान पर तीसरी बार 14 नवंबर, 1949 से विचार होना शुरू हुआ। डॉ.बी.आर. अम्बेडकर ने 'द कॉन्सटिटयूशन ऐज सैटल्ड वाई द असेंबली बी पास्ड' प्रस्ताव पेश किया। संविधान के प्रारूप पर पेश इस प्रस्ताव को 26 नवंबर, 1949 को पारित घोषित कर दिया गया और इस पर अध्यक्ष व सदस्यों के हस्ताक्षर लिए गए। सभा में कुल 299 सदस्यों में से उस दिन केवल 284 सदस्य उपस्थित थे, जिन्होंने संविधान पर हस्ताक्षर किए।
26 नवंबर, 1949 को अपनाए गए संविधान में प्रस्तावना, 395 अनुच्छेद और 8 अनुसूचियां थीं।

संविधान सभा की आलोचना

आलोचकों ने विभिन्न आधारों पर संविधान सभा की आलोचना
की है। ये आधार हैं:-
  • प्रतिनिधि निकाय नहीं : आलोचकों ने दलीलें दी हैं कि संविधान सभा प्रतिनिधि सभा नहीं थी क्योंकि इसके सदस्यों का चुनाव भारत के लोगों द्वारा वयस्क मताधिकार के आधार पर नहीं हुआ था।
  • संप्रभुता का अभाव : आलोचकों का कहना है कि संविधान सभा एक संप्रभु निकाय नहीं थी क्योंकि इसका निर्माण ब्रिटिश सरकार के प्रस्तावों के आधार पर हुआ। यह भी कहा जाता है कि संविधान सभा अपनी बैठकों से पहले ब्रिटिश सरकार से इजाजत लेती थी।
  • अधिक समय की बर्बादी : आलाचकों के अनुसार संविधान सभा ने इसके निर्माण में जरूरत से कहीं ज्यादा समय ले लिया।
  • वकीलों और राजनीतिज्ञों का प्रभुत्व : यह भी कहा जाता है कि संविधान सभा में वकीलों और नेताओं का बोलबाला था। उन्होंने कहा कि समाज के अन्य वर्गों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिला। जिसके फलस्वरूप संविधान का आकार बड़ा हुआ और उसकी भाषा जटिल हो गयी।
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