अधिकरण (न्यायाधिकरण) adhikaran

अधिकरण

अधिकरण जिन्हें अंग्रेजी में Tribunal कहा जाता है, का शब्दकोषीय अर्थ है- "प्राधिकार से युक्त लोगों का ऐसा समूह, जो किसी विशिष्ट या निश्चित प्रकार के विवादों का समाधान करता है।" tribunal शब्द की उत्पत्ति लैटिन शब्द Tribunus से हई है, जिसका अर्थ होता है- 'न्याय करने वाला'।
adhikaran
भारत में न्यायपालिका द्वारा अधिकरण की दी गई परिभाषा- “ अधिकारण शब्द के अंतर्गत वे सभी निकाय सम्मिलित है, जिनमें न्यायिक शक्तियाँ निहित हैं और जिनके दिए हए निर्णय नागरिकों के अधिकार को प्रभावित करते हैं।" न्यायालयों से मिलता-जुलता यह निकाय न्यायनिर्णयन में अपनी अहम भूमिका निभाता है। इसलिए इसे न्यायाधिकरण भी कहा जाता है। प्रायः सभी न्यायालय अधिकरण होते हैं, क्योंकि उनके पास अधिकरणों को प्राप्त सभी शक्तियाँ होती हैं. परंतु सभी अधिकरण न्यायालय नहीं होते हैं।

अधिकरण के प्रकार

42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 के द्वारा संविधान में एक नया भाग- 'XIV-क' जोड़ा गया है, जिसमें दो अनुच्छेद 323क एवं 323ख शामिल किये गए। संविधान का यह भाग 'अधिकरण' से संबंधित है। अनुच्छेद 323क जहाँ प्रशासनिक अधिकरण से संबंधित है, वहीं अनुच्छेद 323ख का संबंध अन्य विषयों से संबंधित अधिकरणों से है-

अधिकरण के प्रकार
  • प्रशासनिक अधिकरण
  • राज्य प्रशासनिक अधिकरण
  • राष्ट्रीय हरित अधिकरण
  • अन्य अधिकरण

प्रशासनिक अधिकरण

संसद को अधिकार है कि वह विधि द्वारा केंद्र, राज्य या स्थानीय निकायों, सरकारी निगमों आदि से जुड़ी लोक सेवाओं और पदों की भर्ती, सेवा-शर्तों आदि में उठने वाले विवादों व शिकायतों के न्याय-निर्णय या विचारण के लिये प्रशासनिक अधिकरणों की व्यवस्था कर सकेगी।
अनुच्छेद 323क का अनुकरण करते हुए संसद ने प्रशासनिक अधिकरण अधिनियम, 1985 पारित किया।
जैसे -
'केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण' केंद्रीय कर्मचारियों की भर्ती तथा सेवा शर्तों से जुड़े मामलों के लिये।
'राज्य प्रशासनिक अधिकरण' किसी राज्य की विशेष मांग पर केंद्र सरकार द्वारा गठित अधिकरण।
यदि दो या दो से अधिक राज्य निवेदन करें तो उन सभी के लिये एक ही 'संयुक्त प्रशासनिक अधिकरण बनाया जा सकता है।

केन्द्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट)

प्रशासनिक अधिकरण अधिनियम-1985 के तहत् केन्द्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) की स्थापना की गई है। केन्द्रीय प्रशासनिक अधिकरण की प्रधान खंडपीठ दिल्ली में व विभिन्न राज्यों में पूरक खण्डपीठ हैं। वर्तमान में इसकी 17 खण्डपीठे है। इनमें से 15 मुख्य न्यायालयों की प्रधान पीठों में और दो अन्य जयपुर व लखनऊ से संचालित हैं।
केन्द्रीय प्रशासनिक अधिकरण, अपने अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले लोक सेवकों की भर्ती व सेवा संबंधी मामलों को देखता है। इसके अधिकार क्षेत्र में अखिल भारतीय सेवाओं, केन्द्रीय लोक सेवाओं, केन्द्र के अधीन नागरिक पदों और सैन्य सेवाओं के सिविल कर्मचारियों को सम्मिलित किया गया है। हालांकि सैन्य सेवाओं के सदस्य व अधिकारी, उच्चतम न्यायालय के कर्मचारी और संसद के सचिवालय कर्मचारियों को इसमें सम्मिलित नहीं किया गया है।
केन्द्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट) एक बहुसदस्यीय निकाय है, जिसमें एक अध्यक्ष तथा 65 सदस्य होते हैं। पहले कैट के एक अध्यक्ष, एक उपाध्यक्ष तथा कई सदस्य होते थे। केन्द्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण अधिनियम, 1985 में 2006 में संशोधन कर के कैट के सदस्यों की हैसियत उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के बराबर कर दी गई है। वर्तमान में, कैट में अध्यक्ष का एक पद तथा सदस्यों के 65 पद स्वीकृत हैं। वे न्यायिक व प्रशासनिक दोनों संस्थानों से लिए जाते हैं और राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त होते हैं। इनका कार्यकाल पाँच वर्ष अथवा 65 वर्ष की उम्र तक (अध्यक्ष के मामले में) तथा 62 वर्ष (सदस्यों के मामले में) जो भी पहले हो होता है।
कैट (CAT) के सदस्यों की नियुक्ति सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश द्वारा नामित सर्वोच्च न्यायालय के कार्यरत न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक विशेष अधिकार प्राप्त चयन समिति की अनुशंसाओं पर होती है। भारत के मुख्य न्यायाधीश की सहमति पाने के बाद कैबिनेट की नियुक्ति समिति के अनुमोदन के पश्चात् नियुक्ति की जाती है।
मूल रूप से किसी अधिकरण के आदेश के विरुद्ध कोई याचिका केवल उच्चतम न्यायालय में ही दी जा सकता है, उच्च न्यायालय में नहीं। हालांकि उच्चतम न्यायालय ने चन्द्रकुमार मामले (1997) में निर्णय दिया कि उच्च न्यायालय के न्यायक्षेत्र पर यह प्रतिबंध असंवैधानिक है और न्यायिक समीक्षा संविधान की मूल संरचना है। केन्द्रीय प्रशासनिक अधिकरण के आदेशों के विरुद्ध, संबंधित उच्च न्यायालय की खंडपीठ में भी याचिका दायर की सकती है। इसके फलस्वरूप अब यह संभव नहीं है कि कोई पीड़ित लोक सेवक संबंधित उच्च न्यायालय में बिना सीधे उच्चतम न्यायालय में याचिका दे सके।
केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण की पीठों के नाम एवं उनका न्याय
न्यायपीठ पीठ का न्यायिक क्षेत्र
प्रधान न्यायपीठ, दिल्ली दिल्ली
इलाहाबाद पीठ उत्तर प्रदेश (लखनऊ पीठ के अंतर्गत आने वाले जिलों को छोड़कर)
लखनऊ पीठ उत्तर प्रदेश (इलाहाबाद पीठ के अंतर्गत आने वाले जिलों को छोड़कर)
कटक पीठ ओडीशा
हैदराबाद पीठ आंध्र प्रदेश
बैंगलोर पीठ कर्नाटक
मद्रास पीठ तमिलनाडु व पुडुचेरी
एर्नाकुलम पीठ केरल और लक्षद्वीप
बंबई पीठ महाराष्ट्र, गोवा, दादरा और नगर हवेली, दमन व दीव
अहमदाबाद पीठ गुजरात
जोधपुर पीठ राजस्थान (जयपुर पीठ के अंतर्गत आने वाले जिलों को छोड़कर)
जयपुर पीठ राजस्थान (जोधपुर, पीठ के अंतर्गत आने वाले जिलों को छोड़कर)
चंडीगढ़ पीठ जम्मू व कश्मीर, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, चंडीगढ़
जबलपुर पीठ मध्य प्रदेश
पटना पीठ बिहार
कलकत्ता पीठ पश्चिम बंगाल, सिक्किम, अंडमान व निकोबार द्वीप समूह
गुवाहाटी पीठ असम, मेघालय, मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मिजोरम और त्रिपुरा

कैट की पीठों की सर्किट सिटिंग्स
पीठ सर्किट सिटिंग्स
इलाहाबाद पीठ नैनीताल
कलकत्ता पीठ पोर्ट ब्लेयर, गंगटोक
चंडीगढ़ पीठ शिमला, जम्मू
मद्रास पीठ पुडुचेरी
गुवाहाटी पीठ शिलांग, ईटानगर, कोहिमा, अगरतला, इम्फाल
नवलपुर पीठ इंदौर, ग्वालियर, बिलासपुर
बम्बई पीठ नागपुर, औरंगाबाद, पणजी
एर्नाकुलम पीठ लक्षद्वीप
पटना पीठ राँची

न्यायाधिकरणों से सम्बन्धित अनुच्छेद, एक नजर में
अनुच्छेद विषय-वस्तु
323ए प्रशासनिक न्यायाधिकरण
323बी अन्य मामलों के लिए न्यायाधिकरण

राज्य प्रशासनिक अधिकरण

संबंधित राज्य सरकार की विशेष मांग पर प्रशासनिक अधिकरण अधिनियम, 1985 केन्द्र को राज्य प्रशासनिक अधिकरण गठित करने की शक्ति प्रदान करता है। अब तक 9 राज्यों-आंध्र प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, ओडिशा, कर्नाटक, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल तथा केरल में राज्य प्रशासनिक अधिकरणों (सैट) की स्थापना की जा चुकी है। हालांकि मध्य प्रदेश, तमिलनाडु तथा हिमाचल प्रदेश में अधिकरणों को समाप्त कर दिया गया था। किन्तु हिमाचल प्रदेश ने SAT का पुनर्गठन किया। वही अब तमिलनाडु ने भी इसके पुनर्गठन करने का अनुरोध किया है।
केन्द्रीय प्रशासनिक अधिकरण के ही समान राज्य प्रशासनिक अधिकरण भी अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाले, राज्य सरकार के कर्मचारियों की भर्ती व सेवा मामलों को देखता है। राज्य प्रशासनिक अधिकरण के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति संबंधित राज्यपाल की सलाह पर राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
इस अधिनियम में दो या दो से अधिक राज्यों के लिए संयुक्त प्रशासनिक अधिकरण की स्थापना का भी उपबंध है। संयुक्त अधिकरण उन राज्यों के प्रशासनिक अधिकरण के समान ही अधिकार क्षेत्र तथा शक्तियों का उपयोग करता है। संयुक्त राज्य अधिकरण के अध्यक्ष व सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा संबंधित राज्यों के राज्यपालों की सिफारिश पर होती है।

प्रशासनिक अधिकरणों के विकास के कारण
प्रशासनिक अधिकरणों के विकास के निम्नलिखित कारण है-

सामान्य न्यायालयों की खर्चीली एवं विलम्बकारी प्रक्रिया- सामान्य न्यायालयों में न्याय प्राप्त करना अत्यन्त खर्चीला कार्य हो गया है। इनके साथ ही न्यायिक प्रक्रिया अत्यंत लम्बी हो गई है। एक विवाद के समाधान में दशकों लग जाते हैं। इसकी तुलना में प्रशासनिक न्यायाधिकरण से न्याय प्राप्त करना सरल भी है तथा कम खर्चीला भी है।

विशेषज्ञों द्वारा निर्णय- वर्तमान में लोक प्रशासन का कार्य अत्यंत तकनीकी मुक्त हो गया है। इन तकनीकी कार्यों से उत्पन्न विवादों का समाधान करने के लिए केवल कानूनी ज्ञान ही नहीं, वरन तकनीकी ज्ञान की भी आवश्यकता होती है। उदाहरण के लिए जिस संपत्ति को सरकार अधिग्रहित करती है। उसके उचित मूल्य (मुआवजा) का निर्धारण न्यायाधीश की अपेक्षा विशेषज्ञ अधिक दक्षता से कर सकते हैं।

सामाजिक नीति को लागू करना- वर्तमान समय में अनेक सामाजिक, आर्थिक तथा तकनीकी विधायन समाजवादी कल्याणकारी राज्य की कल्पना की पूर्ति के लिए हो रहे हैं। इनके परिणामस्वरूप नये विवाद उत्पन्न होते हैं। अत: इनका निपटारा सामान्य न्यायालयों की अपेक्षा न्यायाधिकरण प्रभावी रूप से कर सकते हैं।

सामान्य न्यायालय पहल नहीं करते हैं- सामान्य न्यायालय अपनी ओर से किसी कार्यवाही का सूत्रपात नहीं करते हैं। वे व्यक्ति के आवेदन पर ही न्याय कार्य करते हैं। जबकि अनेक मामलों में पहल करने की आवश्यकता होती है। यह कार्य प्रशासनिक न्यायाधिकरण करते हैं।

परम्परागत निर्णय- सामान्यत: न्यायालयों के न्यायाधीश पारम्परिक होते हैं। वे बदलते हुए सामाजिक परिवेश के अनुसार नहीं बल्कि कानून की शब्दावली के अनुसार चलते हैं। जबकि आज आवश्यकता यह है, कि प्रगतिशील सामाजिक-आर्थिक नीतियों के अनुरूप निर्णय दिये जाये। यह कार्य प्रशासनिक न्यायाधिकरणों के द्वारा अधिक अच्छे प्रकार से किया जा सकता है।

लचीलापन- आधुनिक विधायनों के सदंर्भ में ऐसे मामले हो सकते हैं, जिनका निवारण कठोर रूप से कानूनी प्रावधानों के अनुसरण द्वारा न होकर राष्ट्रीय नीति व स्थिति विशेष के परिप्रेक्ष्य में करना पड़ता है। उदाहरण के लिए श्रम विधानों के अधीन श्रमिकों तथा पूँजीपतियों के बीच उत्पन्न विवादों का निर्णय अथवा करदाता एवं कर निर्धारक प्रशासनिक अधिकारियों के बीच विवाद जो कर कानूनों के अधीन उत्पन्न होते हैं। इनका निराकरण प्रशासनिक न्यायाधिकरण अधिक अच्छे ढंग से कर सकते हैं।
  • सामाजिक हित के लिए यह आवश्यक है, कि सामाजिक नीति और कानूनों को बल देकर लागू करने हेतु सामान्य न्यायालय कोई कार्यवाही नहीं करते हैं, लेकिन प्रशासनिक न्यायाधिकरण यह पहल करते हैं।
  • विशिष्ट, अल्पकालिक और लोक महत्त्व के विषय पर शीघ्र विचार हेतु प्रशासनिक अभिकरणों को स्थापित किया गया है।
  • सामान्यतः न्यायाधीश रूढ़िवादी होते हैं, वे परिवर्तित होती परिस्थितियों में फिट नहीं होते है। यह प्रशासनिक न्यायाधिकरण द्वारा अधिक कुशलता से किया जाता है।
  • इसके अलावा सामाजिक-आर्थिक नीतियों को लोकहित मे लागू करने, व्यक्ति और लोकहित के मध्य सामन्जस्य बनाने आदि कारणों से भी प्रशासनिक न्यायाधिकरणों की आवश्यकता महसूस की गई।

विशेषताएँ
  • यह कार्यकारिणी द्वारा परिनियमित उपबंधों के अनुरूप नियुक्त किये जाते हैं।
  • यह न्यायिक ढंग से कार्य करने के लिये बाध्य है तथा न्यायपूर्वक कार्य करते हैं।
  • यह एक स्वतंत्र संस्था है तथा बिना किसी पक्षपात के कार्य करती है।
  • इसे नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप मामलों का निर्णय करना पड़ता है।
  • इनके समक्ष की गई कार्यवाहियाँ न्यायिक कार्यवाहियाँ मानी जाती हैं और कुछ मामलों में इन्हें सिविल न्यायालयों की शक्तियाँ प्राप्त हैं।
  • यह प्रक्रिया संबंधी नियमों के तकनीकीपन का अनुसरण नहीं करता और न ही साक्ष्य विधि के नियमों का अनुसरण करता है।
  • शब्दों के सही अर्थ में यह न्यायालय नहीं है।

प्रशासकीय न्यायाधिकरण के लाभ
प्रशासनिक न्यायाधिकरणों से ऐसे कई लाभ हैं, जो साधारण विधि न्यायालयों से प्राप्त नहीं हैं। प्रमुख लाभ निम्नलिखित हैं-
  • प्रशासनिक न्याय अधिक सस्ता है। क्योंकि बहुत से प्रशासनिक मामलों में वकील नहीं किये जाते और न फीस देना ही जरूरी होता है। इसी प्रकार बहुत से प्रशासनिक न्यायाधिकरणों में किसी प्रकार का कोई व्यय नहीं होता। सामान्य विधि न्यायालयों में न्याय बहुत खर्चीला होता है।
  • प्रशासकीय न्यायाधिकरण अपने कार्य अधिक लचीलेपन से सम्पन्न करते हैं। ये अपने पिछले निर्णयों या अन्य प्राधिकरणों के निर्णयों से बन्धे नहीं होते हैं। और न ही इनके कार्यों में न्यायिक दृष्टान्त तथा विधि के शासन की धारणा बाधक होती है।
  • प्रक्रियाओं की मुख्य विशेषताओं में एक बात यह भी है, कि इनमें अनौपचारिकता तथा सादगी बरती जाती है।
  • प्रशासकीय न्यायाधिकरण सामान्य न्यायालयों की अपेक्षा जल्दी कार्य करते हैं, क्योंकि जिस प्रक्रिया का वे अनुगमन करते हैं। वह कम जटिल तथा कम कष्ट कारक होती है।
  • न्यायाधिकरणों के समक्ष बहुधा कानून द्वारा निर्धारित न्यूनतम स्तर पर मुख्य समस्या होती है। ऐसे मामलों को सामान्य न्यायालयों की अपेक्षा किसी न्यायाधिकरण द्वारा अधिक अच्छी तरह से निपटाया जा सकता है, क्योंकि इसमें विशेष अनुभव तथा प्रशिक्षण प्राप्त व्यक्ति होते हैं।
  • तेजी से बदलती हुई सामाजिक व्यवस्था की दृष्टि एवं अनुरूपता से प्रशासकीय न्यायाधिकरण लाभदायक सिद्ध हो रहे हैं।
  • प्रशासकीय न्यायाधिकरण का अन्य लाभ इसकी संक्षिप्त प्रक्रिया है। यह प्रक्रिया संबंधी द्वन्द्व का शिकार नहीं है, जो अन्य अदालतों में सर्वत्र दिखायी पड़ती है।
  • इसे हर क्षेत्र में प्रयोग करना सम्भव है, जबकि न्यायिक मुकदमों में ऐसे प्रयोग की गुंजाइश नहीं है।
  • कभी-कभी आपातकालीन अधिकार (Emergency Powers) प्रशासकीय प्राधिकारियों को किसी अधिसूचना या कार्यपालिका आदेश द्वारा दिये जा सकते हैं, या उसके द्वारा वापस भी लिये जा सकते हैं।
  • न्यायाधिकरणों का अन्य गुण यह है कि वे साधारण न्यायालय के कार्यभार को कम करते हैं।

प्रशासकीय न्यायाधिकरण के दोष
  • प्रशासकीय न्यायाधिकरण की व्यवस्था, विधि के शासन की अवधारणा का उल्लंघन करती है।
  • प्रशासकीय न्यायाधिकरण की व्यवस्था प्राकृतिक न्याय के सिद्धातों का भी उल्लंघन करती है।
  • इसमें प्रचार (Publicity) का पर्याप्त अभाव रहता है। प्रचार के बिना भावी निर्णयों की प्रवत्ति के संबंध में पटले से बताना असम्भव होता है और उन्हें गोपनीय रखा जाता है, जो साधारणतः अनावश्यक है। अत: नौकरशाही की स्वेच्छाचारिता के लिए वातावरण उत्पन्न हो जाता है।
  • प्रशासकीय न्यायाधिकरणों में न्यायिक प्रशिक्षण तथा अनुभव प्राप्त व्यक्ति न्यायाधीश नहीं होते। अतः वे न्यायपूर्वक कार्य नहीं कर पाते। अतः न्यायाधिकरणों का दृष्टिकोण अलगाव युक्त तथा निष्पक्ष नहीं होता।
  • प्रशासकीय न्यायाधिकरणों के निर्णयों के विरुद्ध सामान्य न्यायालयों में अपील की अनुज्ञा नहीं दी जाती। न्यायालयों के अधिकार-क्षेत्र का इस प्रकार हनन अनुचित है।
  • प्रशासकीय न्यायाधिकरण एक-सी प्रक्रिया का पालन नहीं करते, फलस्वरूप निरंकुश तथा असंगत निर्णयों के लिए मार्ग प्रशस्त हो जाता है।
  • आचरण के निश्चित मापदण्ड न होने के कारण न्याय में अस्थिरता आ जाती है। जो वास्तव में न्याय का निषेध ही है।

सामान्य न्यायालय तथा प्रशासनिक न्यायाधिकरण में अन्तर
सामान्य न्याय एवं कानून के उल्लघंन में दण्ड देने का अधिकार सामान्य न्यायालयों का होता है। किन्तु न्यायिक कार्य की अधिकता के कारण तथा तकनीकी प्रकृति के मामलों को निपटाने में असफलता के कारण प्रशासनिक न्यायाधिकरण की स्थापना की जाती है। दोनों में अन्तर निम्न है-
  • सामान्य न्याय, न्यायालयों द्वारा दिया जाता है, जबकि प्रशासनिक अधिनिर्णय कार्यपालिका द्वारा की जाने वाली प्रक्रिया या न्याय है।
  • सामान्य न्याय, कानून तथा न्यायपालिका के सिद्धांतों पर आधारित होता है जबकि प्रशासनिक अधिनिर्णय, सिद्धातों पर आधारित न होकर लोकहित तथा समाजहित को ध्यान में रखकर किया जाता है।
  • सामान्य न्याय का प्रबंध पूर्ण स्वतंत्र न्यायाधीशों द्वारा किया जाता है जबकि प्रशासनिक अधिनिर्णय, प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा किया जाता है, जो स्वतंत्र न होकर पद संबंधी कार्यो हेतु उत्तरदायी होते हैं।
  • न्यायिक प्रक्रिया में निर्णय न्यायाधीशों का व्यक्तिगत निर्णय होता है, जबकि प्रशासनिक अधिनिर्णय में निर्णयकर्ता को जो दिखता है वो कई बार नहीं होता है अर्थात् मंत्री द्वारा लिया गया निर्णय वास्तव में नौकरशाही का निर्णय होता है।
  • न्यायाधीश अपने कार्यों का प्रत्यायोजन नहीं कर सकता है, जबकि प्रशासनिक न्यायाधिकरण में प्रशासनिक अधिकारी प्रायः अपने निर्णय शक्ति को प्रत्यारोपित करते हैं।
  • न्यायालय/न्यायाधीश तर्कों के आधार पर निर्णय देते हैं, जबकि प्रशासनिक न्यायाधिकरण प्रायः अपने फैसले की घोषणा ही करते हैं, तर्क नहीं देते।
  • न्यायिक प्रक्रिया में वाद या मुकदमें में दो पक्ष होते हैं, जबकि प्रशासनिक अधिनिर्णय में दो पक्षों का झगड़ा भी हो सकता है अथवा न्याय कर्ता अधिकारी स्वयं जाँच-पड़ताल व नियंत्रण का कार्य कर सकता हैं।
  • न्यायपालिका तभी कार्यवाही शुरू करती है, जब कोई न्याय माँगने आये जबकि प्रशासनिक अधिनिर्णय में वादी तथा न्यायाधीश दोनों अधिकरण में सम्मिलित हो जाते हैं। अर्थात् प्रशासन स्वयं ही वाद प्रस्तुत कर सकता है व स्वयं ही निर्णय ले सकता है।
  • न्यायिक प्रक्रिया बहुत जटिल तथा सुस्थापित परम्परागत नियमों पर आधारित होती है, जबकि प्रशासनिक अधिनिर्णय में नियम प्रायः शिथिल तथा लचीले होते हैं।
  • न्यायिक प्रक्रिया सामान्य कानून तथा सामान्य न्यायालयों से संबंधित होती है, जबकि प्रशासनिक अधिनिर्णय सरकार की विशेष गतिविधि या कार्य के संबंध में होते हैं।
  • सामान्य न्याय की प्रकृति पूर्ण न्यायिक है, जबकि प्रशासनिक अधिनिर्णय की प्रकृति अर्द्ध न्यायिक है।

राष्ट्रीय हरित अधिकरण

राष्ट्रीय हरित अधिकरण (National Green Tribunal - NGT) की स्थापना 18 अक्तूबर, 2010 को राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम (National Green Tribunal Act), 2010 के तहत की गई थी। NGT की स्थापना के साथ भारत एक विशेष पर्यावरण न्यायाधिकरण (Specialised Environmental Tribunal) स्थापित करने वाला दुनिया का तीसरा (और पहला विकासशील) देश बन गया। इससे पहले केवल ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में ही ऐसे किसी निकाय की स्थापना की गई थी। NGT की स्थापना का मुख्य उद्देश्य पर्यावरण संबंधी मुद्दों का तेज़ी से निपटारा करना है, जिससे देश की अदालतों में लगे मुकदमों के बोझ को कुछ कम किया जा सके। NGT का मुख्यालय दिल्ली में है, जबकि अन्य चार क्षेत्रीय कार्यालय भोपाल, पुणे, कोलकाता एवं चेन्नई में स्थित हैं। राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम के अनुसार, NGT के लिये यह अनिवार्य है कि उसके पास आने वाले पर्यावरण
संबंधी मुद्दों का निपटारा 6 महीनों के भीतर हो जाए।

राष्ट्रीय हरित अधिकरण की संरचना
NGT में अध्यक्ष, न्यायिक सदस्य और विशेषज्ञ सदस्य शामिल होते हैं, जिनका कार्यकाल 5 वर्षों का होता है और किसी भी सदस्य को पुनः पद पर नियुक्त नहीं किया जा सकता। अध्यक्ष की नियुक्ति भारत के मुख्य न्यायाधीश के परामर्श से केंद्र सरकार द्वारा की जाती है। न्यायिक और विशेषज्ञ सदस्यों की नियुक्ति के लिये केंद्र सरकार द्वारा एक चयन समिति बनाई जाती है। यह आवश्यक है कि अधिकरण में कम-से-कम 10 और अधिकतम 20 पूर्णकालिक न्यायिक सदस्य एवं विशेषज्ञ सदस्य हों।

शक्तियाँ और अधिकार क्षेत्र
अधिकरण का न्याय क्षेत्र बेहद विस्तृत है और यह उन सभी मामलों की सुनवाई कर सकता है जिनमें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पर्यावरण शामिल हो। इसमें पर्यावरण से संबंधित कानूनी अधिकारों को लागू करना भी शामिल है।
  • एक वैधानिक निकाय होने के कारण NGT के पास अपीलीय क्षेत्राधिकार है और जिसके तहत वह सुनवाई कर सकता है।
  • नागरिक प्रक्रिया संहिता, 1908 (Code of civil Procedure 1908) में उल्लिखित न्यायिक प्रक्रिया का पालन करने के लिये NGT बाध्य नहीं है।
  • किसी भी आदेश/निर्णय/अधिनिर्णय को देते समय यह यह आवश्यक है कि NGT उस पर सतत् विकास (Sustainable Development), निवारक (Precautionary) और प्रदूषक भुगतान (Polluter Pays), आदि सिद्धांत लागू करे।
  • अधिकरण अपने आदेशानुसार-
पर्यावरण प्रदूषण या किसी अन्य पर्यावरणीय क्षति के पीड़ितों को क्षतिपूर्ति प्रदान कर सकता है।
क्षतिग्रस्त संपत्तियों की बहाली अथवा उसका पुनर्निर्माण करवा सकता है।
  • NGT द्वारा दिए गए को आदेश/निर्णय/अधिनिर्णय का निष्पादन न्यायालय के आदेश के रूप में करना होता है।
  • NGT अधिनियम में नियमों का पालन न करने पर दंड का प्रावधान भी किया गया है :-
० एक निश्चित समय के लिये कारावास जिसे अधिकतम 3 वर्षों के लिये बढ़ाया जा सकता है।
०निश्चित आर्थिक दंड जिसे 10 करोड़ रुपए तक बढ़ाया जा सकता है।
० कारावास और आर्थिक दंड दोनों।
  • NGT द्वारा दिये गए आदेश/निर्णय/अधिनिर्णय के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में 90 दिनों के भीतर अपील की जा सकती है।
  • NGT पर्यावरण से संबंधित 7 कानूनों के तहत नागरिक मामलों की सुनवाई कर सकता है:
  1. जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1974
  2. जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) उपकर अधिनियम, 1977
  3. वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980
  4. वायु (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1981
  5. पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986
  6. पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986
  7. जैव-विविधता अधिनियम, 2002
उपरोक्त कानूनों के तहत सरकार द्वारा लिये गए किसी भी निर्णय को NGT के समक्ष चुनौती दी जा सकती है।

राष्ट्रीय हरित अधिकरण का महत्त्व
  • विगत वर्षों में NGT ने पर्यावरण के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है और जंगलों में वनों की कटाई से लेकर अपशिष्ट प्रबंधन आदि के लिये सख्त आदेश पारित किये हैं।
  • NGT ने पर्यावरण के क्षेत्र में न्याय के लिये एक वैकल्पिक विवाद समाधान तंत्र (Alternative Dispute Resolution Mechanism) स्थापित करके नई दिशा प्रदान की है।
  • इससे उच्च न्यायालयों में पर्यावरण संबंधी मामलों का भार कम हुआ है।
  • पर्यावरण संबंधी मुद्दों को सुलझाने के लिये NGT एक अनौपचारिक, मितव्ययी एवं तेज़ी से काम करने वाला तंत्र है।
  • यह पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियों को रोकने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
  • चूँकि अधिकरण का कोई भी सदस्य पुनः नियुक्ति के योग्य नहीं होता है और इसीलिये वह बिना किसी भय के स्वतंत्रता पूर्वक निर्णय सुना सकता है।

चुनौतियाँ
दो महत्त्वपूर्ण अधिनियमों [वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 (Wildlife Protection Act, 1972) तथा अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वन निवासी अधिनियम, 2006 (Scheduled Tribes and other Traditional Forest Dwellers Act, 2006)] को NGT के अधिकार-क्षेत्र से बाहर रखा गया है, लेकिन इससे कई बार NGT के कामकाज प्रभावित होता है, क्योंकि पर्यावरण से जुड़े कई मुद्दे इन अधिनियमों के अधीन आते हैं।
  • NGT के कई निर्णयों को उच्च न्यायालय में धारा 226 के तहत यह कहकर चुनौती दी जाती रही है कि उच्च न्यायालय एक संवैधानिक संस्था है, जबकि अधिकरण एक वैधानिक संस्था है। यह इस अधिनियम की सबसे बड़ी खामी है कि इसमें यह स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया गया है कि किन मुकदमों को न्यायालय के समक्ष चुनौती दी जा सकती है और किन को नहीं।
  • आर्थिक वृद्धि और विकास पर प्रभाव डालने के कारण NGT के निर्णयों की समय-समय पर आलोचना होती रहती है।
  • मुआवजे के निर्धारण की कोई स्पष्ट विधि न होने के कारण भी अधिकरण आलोचना का शिकार हो जाता है।
  • NGT के लिये यह अनिवार्य है कि उसके अधीन जो भी मुकदमा आए उसका निपटारा 6 महीनों के भीतर हो जाना चाहिये, परंतु मानव और वित्तीय संसाधनों के अभाव में NGT ऐसा नहीं कर पाता है।
  • NGT का न्यायिक तंत्र भी सीमित संख्या में क्षेत्रीय पीठों (Regional Benches) के कारण बहुत अधिक प्रभावित होता है।

NGT के महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक निर्णय
  • वर्ष 2012 में स्टील निर्माता कंपनी Posco ने इस्पात संयंत्र लगाने के लिये ओडिशा सरकार के साथ एक समझौता किया था, परंतु NGT ने इसे निरस्त कर दिया, क्योंकि यह समझौता आस-पास के ग्रामीण लोगों के हितों को प्रभावित करने वाला था। NGT के इस आदेश को स्थानीय समुदायों और जंगलों के लिये एक साहसी कदम माना गया।
  • वर्ष 2012 में ही एक अन्य मामले में NGT ने खुले में कचरा जलाने पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया था। इस निर्णय को भारत में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन से निपटने के लिये सबसे महत्त्वपूर्ण एवं ऐतिहासिक माना जाता है।
  • वर्ष 2013 में उत्तराखंड के मामले में NGT ने अलकनंदा हाइड्रो पावर लिमिटेड को यह आदेश दिया कि वह सभी याचिकाकर्ताओं को क्षतिपूर्ति दे। इस निर्णय में NGT ने प्रदूषक भुगतान (Polluter Pays) के सिद्धांत का पालन किया था।
  • वर्ष 2015 में NGT ने यह आदेश दिया था कि 10 वर्षों से अधिक पुराने सभी डीज़ल वाहनों को दिल्ली-NCR में चलने की अनुमति नहीं दी जाएगी।
  • वर्ष 2017 में दिल्ली में यमुना के खादर में आयोजित आर्ट ऑफ लिविंग फेस्टिवल को पर्यावरण के नियमों का उल्लंघन करते हुए पाया गया था, जिसके बाद NGT ने उस पर 5 करोड़ रुपए का जुर्माना लगाया था।
  • वर्ष 2017 में NGT ने दिल्ली में 50 माइक्रोन से कम मोटाई वाले प्लास्टिक बैग पर यह कहते हुए अंतरिम प्रतिबंध लगा दिया था कि इस प्रकार के प्लास्टिक बैग से जानवरों की मृत्यु हो रही है और पर्यावरण भी प्रभावित हो रहा है।
  • इसमें कोई दो राय नहीं हैं कि बहुत कम समय में NGT ने पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय काम किया है और पर्यावरण प्रहरी के रूप में अपनी एक अलग छवि निर्मित की है। इसके बावजूद देश में हो रही विकास गतिविधियों के साथ तालमेल स्थापित करके पर्यावरण संरक्षण हेतु NGT के दायरे को और अधिक विस्तृत करने की आवश्यकता है ताकि देश के विकास के साथ पर्यावरण को भी सुरक्षित रखा जा किया जा सके।

अन्य अधिकरण

संसद तथा राज्य विधानमंडलों को अधिकार है कि वह अपनी-अपनी शक्तियों के अनुसार उन विषयों से संबंधित अधिकरण गठित कर सकते हैं. जिन पर उन्हें विधि बनाने की शक्ति प्राप्त है। (अनच्छेद 323ख)
ऐसे कुछ विषयों की सूची निम्नलिखित है-
  • कर लगाने, अनुमान करने तथा राजस्व एकत्रित करने से जुड़े मामले।
  • विदेशी मुद्रा, आयात तथा निर्यात से संबंधित मामले।
  • औद्योगिक तथा श्रम संबंधी विवाद
  • भूमि सुधार से जुड़े कुछ विषय
  • नगर संपत्ति की अधिकतम सीमा से जुड़े विवाद इत्यादि।
  • संसद तथा राज्य विधानमंडल के निर्वाचन से जुडे विचार।
  • खाद्य सामग्री
  • किराया और किराएदारी अधिकार
अनुच्छेद 323क तथा 323ख में तीन विभेद हैं:-
  1. जहां अनुच्छेद 323क के अंतर्गत केवल लोकसेवाओं से संबंधित मामलों के लिए अधिकरण गठित किया जाता है, अनुच्छेद 323ख में अन्य मामलों (उपरोक्त वर्णित) के लिए अधिकरण गठित किया जाता है।
  2. अनुच्छेद 323क के अनुसार, केवल संसद ही अधिकरण का गठन करती है, परंतु 323ख के अंतर्गत संसद व राज्य विधायिका अपने अधिकार क्षेत्र से संबंधित अधिकरण का गठन कर सकते हैं।
  3. अनुच्छेद 323क के अंतर्गत, केंद्र अथवा प्रत्येक राज्य अथवा दो या दो से अधिक राज्यों के लिए केवल एक ही अधिकरण का गठन किया जा सकता है। इसमें शासन क्रम का कोई प्रश्न नहीं है, जबकि अनुच्छेद 323ख के अंतर्गत अधिकरण का गठन एक पदानुक्रम में किया जा सकता है।
चन्द्रकुमार मामले (1997) में उच्चतम न्यायालय ने इन दो अनुच्छेदों के उपरोक्त उपबंधों को, जिन्हें असंवैधानिक करार दिया गया. उन्हें उच्च न्यायालय एवं उच्चतम न्यायालय के न्यायक्षेत्र से बाहर कर दिया गया है। हालांकि अब इन अधिकरणों के आदेशों के खिलाफ न्यायिक उपचार की व्यवस्था उपलब्ध है।
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