अंतरराज्यीय परिषद | antar rajya parishad

अंतरराज्यीय परिषद (Inter-state Council)

केंद्र और राज्यों के मध्य सहयोग सुनिश्चित करने में भूमिका यह केंद्र-राज्य और अंतरराज्यीय संबंधों को मजबूत करने और नीतियों पर चर्चा के लिए सर्वाधिक प्रभावशाली मंच है। यह नीति निर्माण एवं उसके त्वरित कार्यान्वयन हेतु परस्पर सहयोग, समन्वय और विकास के एक उपकरण के रूप में कार्य करता है।
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यह राज्यों के मुख्यमंत्रियों को अवसर प्रदान करता हैं कि वे राज्यों की चिंताओं और मुद्दों को परिषद के समक्ष विचार के लिये रखें। अतः यह केंद्र और राज्यों के बीच अविश्वास को दूर करने में सक्षम है।

अंतरराज्यीय परिषद (ISC)

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 263 के तहत राज्यों एवं केंद्र सरकार के मध्य समन्वय स्थापित करने के लिए अंतरराज्यीय परिषद का प्रावधान किया गया है। यद्यपि यह एक स्थायी संवैधानिक संस्था नहीं है, किंतु यदि राष्ट्रपति को ऐसा प्रतीत होता है कि इस परिषद की स्थापना लोकहित के लिए आवश्यक है, तब इसे किसी भी समय स्थापित किया जा सकता है। सर्वप्रथम इस परिषद को सरकारिया आयोग की अनुशंसा पर स्थापित किया गया था इसे राष्ट्रपति के आदेशानुसार 28 मई,1990 को स्थापित किया गया था। इस परिषद का अध्यक्ष प्रधानमंत्री होता है। इस परिषद में सभी राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों के मुख्यमंत्री तथा प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्र सरकार के 6 कैबिनेट मंत्री सम्मिलित होते हैं।

पुंछी आयोग
भारतीय राजनीति एवं अर्थव्यवस्था में आए परिवर्तनों को ध्यान में रखते हुए केंद्र-राज्य संबंधों से संबंधित नए मुद्दों पर विचार करने के लिये 2005 में भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति मदन मोहन पुंछी की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन किया गया।
रिपोर्ट 7 खंडों में है और अनुशंसाएँ केंद्र-राज्य संबंध, संवैधानिक व केंद्र-राज्य संबंधों का प्रदर्शन, केंद्रराज्य वित्तीय संबंध तथा योजना निर्माण, स्थानीय स्वशासन एवं विकेंद्रीकृत प्रशासन, आंतरिक सुरक्षा, आपराधिक न्याय व केंद्र-राज्य सहयोग, पर्यावरण, प्राकृतिक संसाधन और अवसंरचना तथा सामाजिक आर्थिक विकास, लोक नीति व उत्तम प्रशासन आदि विषयों से संबंधित हैं।

पुंछी आयोग की निम्न सिफारिशें भी विचारणीय है
राज्यों के साथ उचित परामर्श के पश्चात् निर्धारित एजेंडे पर विचार करने के लिये अंतर-राज्यीय परिषद की प्रतिवर्ष कम से कम तीन बैठकों का आयोजन किया जाना चाहिए। इस परिषद की संगठनात्मक संरचना में अखिल भारतीय सेवाओं के अतिरिक्त कानून, प्रबंधन और राजनीति विज्ञान के विशेषज्ञों को भी सम्मिलित किया जाना चाहिए। परिषद के लिए एक स्थाई सचिवालय की स्थापना की जानी चाहिए जिसमें केन्द्रीय और राज्य लोक सेवा के अधिकारियों को प्रतिनियुक्ति के माध्यम से नियुक्त किया जा सकता हैं। इसके अतिरिक्त सचिवालय को प्रासंगिक क्षेत्रों के विषय विशेषज्ञों का सहयोग प्रदान करने के साथ ही कार्यात्मक स्वतंत्रता भी प्रदान की जानी चाहिए। ISC, नीतियों के विकास और मतभेदों के समाधान के लिए विचार-विमर्श का एक जीवंत मंच बन गया है। सरकार द्वारा राष्ट्रीय विकास के कार्यों को भी ISC को स्थानांतरित किया जा सकता है।

सरकारिया आयोग
केंद्र सरकार ने केंद्र और राज्यों के बीच वर्तमान व्यवस्थाओं के कार्यकरण की समीक्षा करने के लिये न्यायमूर्ति आर.एस. सरकारिया की अध्यक्षता में 1988 में एक आयोग गठित किया था। सरकारिया आयोग ने भारत के संविधान के अनुच्छेद 263 के अनुसार परिभाषित अधिदेश के अनुसरण में परामर्श करने के लिये एक स्वतंत्र राष्ट्रीय फोरम के रूप में अंतर्राज्यीय परिषद स्थापित किये जाने की महत्त्वपूर्ण सिफारिश की थी।

अन्तर्राज्यीय परिषद के प्रमुख कार्य

संविधान के अनुच्छेद 263 के अन्तर्गत राष्ट्रपति द्वारा लोक हित में अन्तर्राज्यीय परिषद का गठन किया जा सकता है।
  • राज्य एवं केंद्र के बीच विवाद होने पर उचित सलाह देना।
  • राज्यों तथा केंद्र के पारस्परिक हित से सम्बंधित विषयों पर अनुसंधान करना।
  • उपर्युक्त विषयों के बारे में बेहतर समन्वय हेतु कार्यवाही की सिफारिश करना।
  • राज्यों के मध्य उत्पन्न विवादों की जाँच करना तथा उस सम्बन्ध में आवयश्क सुझाव देना।
  • अन्तर्राज्यीय विषयों से सम्बन्धित नीतियों एवं कार्यवाहियों में सुसमन्वय हेतु संस्तुति करना।
  • केन्द्र एवं एक या एक से अधिक राज्यों के सामान्य हितों से सम्बन्धित मामलों की जाँच करना तथा विचार-विमर्श करना।
  • वर्ष 1990 में राष्ट्रपति द्वारा 'अन्तर्राज्यीय परिषद्' का गठन किया गया।

अन्तर्राज्यीय परिषद् का संघटन

  • प्रधानमन्त्री - अध्यक्ष
  • राज्यों एवं केन्द्रशासित प्रदेशों के मुख्यमन्त्री केन्द्रीय कैबिनेट के छ: मन्त्री

अंतरराज्यीय परिषद के कामकाज से सम्बंधित मुद्दे

इसे केवल एक वार्ता मंच के रूप में देखा जाता है। इस छवि को बदलने की आवश्यकता है। परिषद को अपने कार्यकरण से यह दर्शाने की आवश्यकता हैं कि इस मंच पर उठाये गए मुद्दे अपने अभिनिर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करने में सक्षम है। इसकी सिफारिशें सरकार पर बाध्यकारी नहीं होती हैं। इसकी बैठक नियमित रूप से नहीं होती है। हाल ही में, 12 वर्ष के अंतराल के बाद अंतरराज्यीय परिषद की बैठक आयोजित की गयी थी।

अंतरराज्यीय परिषद को और मजबूत बनाने की आवश्यकता

FC और ISC को साथ मिलकर संविधान के भाग XI और XII के प्रावधानों को क्रियान्वित करना चाहिए ताकि समुचित वित्तीय हस्तांतरण और राजनीतिक विकेंद्रीकरण सुनिश्चित किया जा सके। इसे अंतरराज्यीय विवादों की जांच करने की शक्ति दी जानी चाहिए जिसका उल्लेख संविधान में भी किया गया है किन्तु, 1990 में राष्ट्रपति के आदेश के द्वारा ISC के गठन के समय इसे यह शक्ति प्रदान नहीं की गयी थी (सरकारिया आयोग की सिफारिशों के आधार पर)। इसे केंद्र और राज्यों के बीच केवल प्रशासनिक ही नहीं अपितु राजनीतिक और विधायी आदान-प्रदान के एक सशक्त मंच के रूप
में विकसित किया जाना चाहिए।

निष्कर्ष
हालांकि अन्य कई संस्थाएं जैसे नीति आयोग जो केंद्र-राज्य के मुद्दों को संबोधित करती है ; की गवर्निंग काउंसिल की सांगठनिक संरचना ISC के समान ही प्रधानमंत्री सहित कैबिनेट मंत्री और मुख्यमंत्रियों से मिलकर निर्मित होती है। किन्तु, ISC की विशिष्टता इसका संविधान के प्रावधानों के अनुरूप स्थापित होना हैं, जबकि नीति आयोग के संबंध में संविधान में ऐसे किसी प्रावधान का उल्लेख नहीं है। इसे केवल एक कार्यकारी आदेश द्वारा स्थापित किया गया है।
अत: ISC का संवैधानिक आधार राज्यों को अधिक सशक्त भूमिका प्रदान करता है। अत: यह स्पष्ट है कि राज्यों को नीति निर्माण और क्रियान्वयन में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त होने से केंद्र-राज्य संबंधों के सहज संचालन के लिए सहयोगी और समन्वययुक्त वातावरण का निर्माण होगा।

अंतरराज्यीय परिषद से सम्बंधित महत्वपूर्ण तथ्य

  • 1 नवंबर, 2017 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में अंतरराज्यीय परिषद का पुनर्गठन किया गया।
  • ज्ञातव्य है कि प्रधानमंत्री इस परिषद का पदेन अध्यक्ष होता है।
  • इस परिषद में छः केंद्रीय मंत्रियों और सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को सदस्य के तौर पर शामिल किया गया है।
  • वर्ष 1988 में न्यायमूर्ति आर.एस. सरकारिया की अध्यक्षता में गठित आयोग (सरकारिया आयोग) की सिफारिश पर वर्ष 1990 में अंतरराज्यीय परिषद का गठन किया गया था।
  • इसका उद्देश्य दो या उससे अधिक राज्यों/केंद्र प्रशासित क्षेत्रों या केंद्र और दो या दो से अधिक राज्यों/केंद्र प्रशासित क्षेत्रों के बीच किसी भी मुद्दे पर उत्पन्न विवाद को सुलझाने का प्रयास करना है।
  • यह परिषद साझा हितों से जुड़े मसलों की जांच पड़ताल कर उचित समाधान के तौर-तरीके सुझाती है।
  • इसके अलावा बेहतर सहयोग हेतु नीति और उचित कार्रवाई की सिफारिश भी करती है।
  • इस परिषद में सदस्य के तौर पर शामिल छः केंद्रीय मंत्री निम्नलिखित हैं- राजनाथ सिंह (गृहमंत्री), सुषमा स्वराज (विदेशमंत्री), अरुण जेटली (वित्तमंत्री), नितिन गडकरी (सड़क परिवहन मंत्री), थावर चंद गहलोत (सामाजिक न्याय और आधिकारिता) और निर्मला सीतारमण (रक्षा मंत्री)।
  • सभी राज्यों के मुख्यमंत्री और सभी विधान सभा वाले संघ राज्य क्षेत्रों के मुख्यमंत्री इस परिषद के सदस्य होंगे।
  • इसके अलावा 8 केंद्रीय मंत्रियों को भी स्थायी आमंत्रित सदस्य नियुक्त किया गया है।
  • संविधान के अनुच्छेद 263 में अंतरराज्यीय परिषद के गठन का प्रावधान है।
  • इसी दिन गृहमंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में अंतरराज्यीय परिषद की स्थायी समिति का पुनर्गठन भी किया गया।
  • ज्ञातव्य है कि भारत का गृहमंत्री इस समिति का पदेन अध्यक्ष होता है।
  • इस पुनर्गठित स्थायी समिति में चार केंद्रीय मंत्रियों और सात मुख्यमंत्रियों को सदस्य नामित किया गया है।
  • इस समिति में केंद्रीय मंत्री सुषमा स्वराज, अरुण जेटली, नितिन गडकरी और थावर चंद गहलोत शामिल हैं।
  • इस समिति में शामिल मुख्यमंत्री हैं-एन. चद्रबाबू नायडू (आंध्र प्रदेश), अमरिंदर सिंह (पंजाब), रमन सिंह (छत्तीसगढ़), मानिक सरकार (त्रिपुरा), नवीन पटनायक (ओडिशा), वसुंधरा राजे (राजस्थान) और योगी आदित्यनाथ (उत्तर प्रदेश)।
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