पंचायती राज | panchayati raj

पंचायती राज

ग्रामीण पंचायतों का स्वप्न गाँधी जी के सर्वोदय के आदर्श का व्यावहारिक रूप है, क्योंकि पंचायतों के अभाव में न तो लोगों का विकास हो सकता है और न ही ग्रामीण विकास संभव है। केंद्र तथा राज्य सरकारों द्वारा उठाए गए संवैधानिक प्रयासों के परिणामस्वरूप भारत में बहुस्तरीय संघवाद का विकास हुआ। वर्तमान में इन्हीं संवैधानिक प्रयासों के कारण प्रत्येक 5 साल में होने वाले चुनाव में लगभग 40 लाख स्थानीय प्रतिनिधियों का निर्वाचन होता है, जिसमें लगभग 10 लाख महिलाएं होती है।
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भारत में पंचायती राज' शब्द का अभिप्राय ग्रामीण स्थानीय स्वशासन पद्धति से है। यह भारत के सभी राज्यों में, जमीनी स्तर पर लोकतंत्र निर्माण हेतु राज्य विधानसभाओं द्वारा स्थापित किया गया है।' इसे ग्रामीण विकास का दायित्व सौंपा गया है। 1992 के 73वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा इसे संविधान में शामिल किया गया।

पंचायती राज का ऐतिहासिक विकास

परंपरागत पंचायतें
पंचायत शब्द की व्युत्पति संस्कृत भाषा के 'पंचायतन्' से हुई है, जिसका अर्थ है पांच व्यक्तियों का समूह। महात्मा गांधी ने भी पंचायत का शाब्दिक अर्थ गांव के लोगों द्वारा चुने हुए पांच व्यक्तियों की सभा से लिया है।
मनुस्मृति के अनुसार गांव के अधिकारी को 'ग्रामिक' कहते थे। उसका अर्थ कर आदि की वसूली करना था। दस गांव के ऊपर एक और कर्मचारी होता था। जिसे दशिक के नाम से जाना जाता था।
20 गांव के ऊपर के कर्मचारी को 'विशाधिप' कहते थे। सौ गांवों के ऊपर के कर्मचारी का नाम 'शतपाल' था तथा एक हजार गांवों के ऊपर के कर्मचारी का नाम 'सहस्रपति' था।

ब्रिटिश शासन-काल में पंचायतें
ब्रिटिश सरकार शुरू से ही भारतीयों को कोई शक्ति व उत्तरदायित्व देने के पक्ष में नहीं थी। अंग्रेज शासक मानते थे कि भारतीय प्रजातांत्रिक संस्थाएं चलाने के आयोग्य हैं। ब्रिटिश शासन काल में ग्राम समुदाय की ग्रामीण अर्थव्यवस्था तथा प्रशासनिक कार्यों पर पकड़ कम होती गई, भूमि व उसके उत्पाद पर नियंत्रण घटता गया। परंपरागत स्थानीय स्वशासन के जो कुछ अवशेष मुगलकाल में बचे थे, वे भी ब्रिटिश काल में समाप्त हो गए। पर यह भी सच है कि ब्रिटिश शासन-काल में ही कुछ समय के उपरांत पंचायतों का नया रूप उभरकर सामने आया जिसे पंचायतों का पुनरुदय कहा जा सकता है और आधुनिक पंचायत व्यवस्था का आरंभ भी।
ब्रिटिश शासन-काल में पंचायतों के पुनरुदय का अध्ययन करने के लिए इस अवधि को तीन भागों में बांटा जा सकता है:
  • 1687 से 1882 तक का काल;
  • 1883 से 1919 तक का काल;
  • 1919 से स्वतंत्रता-प्राप्ति तक का काल।
28 सितम्बर, 1687 को क्राउन की अनुमति से ईस्ट इंडिया कंपनी के निदेशक ने मद्रास कोंसिल को मद्रास में म्युनिसिपल कॉरपोरेशन गठित करने की सलाह देते हुए लिखा था कि लोग कंपनी द्वारा लगाए गए कर के रूप में एक पैसा भी देना पसंद नहीं करेंगे, लेकिन स्वेच्छा से 5 शिलिंग भी दे देंगे बशर्ते कि इसे उन्हीं के द्वारा उन्हीं के लिए खर्च किया जाए।
बाद में यहां कारपोरेशन बनाने के पीछे अंग्रेजों का लक्ष्य लोगों को जन-सुविधाएं उपलब्ध कराना, उन्हें शासित करना और अपराध तथा न्याय के बारे में एक व्यवस्था कायम करना था। इस प्रकार 1688 में कारपोरेशन अस्तित्व में आई। लेकिन वह स्वायत्त शासन की संस्था नहीं बन सकी, क्योंकि लोगों ने कारपोरेशन द्वारा कर लगाने का विरोध किया।
1726 में कलकत्ता व बंबई में तथा पुनः मद्रास में नगरपालिका के गठन के लिए दसरा म्युनिसिपल चार्टर जारी किया गया। इसमें प्रावधान किया गया था कि नगरपालिका का एक मेयर तथा 9 सदस्य होंगे जिनमें से 7 अंग्रेज होंगे। इन नगरपालिकाओं के गठन का लक्ष्य मुख्यतः न्यायिक कार्यों का संपादन था।
इसके बाद 1793 में संवैधानिक रूप से चार्टर अधिनियम के द्वारा मद्रास, कलकत्ता व बंबई में नगरपालिकाओं का गठन किया गया। इनके मुख्य कार्य थे- कर लगाकर कानून-व्यवस्था बनाए रखना तथा संपत्तियों का रखरखाव करना। 1842 में पहला नगरपालिका अधिनियम केवल बंगाल के लिए पारित किया गया। लेकिन इसका काफी विरोध हुआ। अतः इसे समाप्त कर 1850 में दूसरा नगरपालिका अधिनियम पारित किया गया। जिसमें यह व्यवस्था थी कि इसे ऐच्छिक रूप से किसी भी नगर में लागू किया जा सकता है।
लेकिन ये सभी प्रयास नगरीय प्रशासन स्थापित करने की दिशा में किए गए थे। ग्रामों में पंचायतों की ओर से कोई भी ध्यान नहीं दिया गया। ग्रामों के विकास की ओर सबसे पहले ध्यान 1863 में शाही स्वच्छता आयोग की रिपोर्ट के बाद दिया गया।
इस रिपोर्ट में भारतीय गांवों की साफ-सफाई संबंधी दुर्दशा के बारे में बताया गया था और कहा गया था कि गांवों की स्वच्छता की ओर ध्यान देना आवश्यक है। इसके बाद विभिन्न राज्यों में ग्रामीण स्वच्छता अधिनियम पारित किए गए।
14 दिसम्बर 1870 को लार्ड मेयो ने सत्ता के विकेंद्रीकरण और स्वायतशासी संस्थाओं के गठन के लिए कौंसिल में प्रस्ताव स्थापित करने का पहला प्रयास किया। इसका उद्देश्य प्रशासनिक क्षमता को बढ़ाना तथा वित्तीय साधन जुटाना था।
इस प्रस्ताव को ध्यान में रखकर केंद्रीय सरकार ने शिक्षा, चिकित्सा सेवाओं, सड़कों के रखरखाव और निर्माण आदि का काम प्रांतीय सरकारों को हस्तांतरित करने तथा इस हेतु उन्हें अनुदान देने का निर्णय किया।
इस प्रकार 1871 के अधिनियम के अनुसार बंबई, बंगाल, पंजाब व उत्तर-पश्चिमी प्रांतों में मेयो प्रस्ताव के बाद स्थानीय स्वायत्त शासनों की स्थापना हुई। इस अधिनियमों के प्रावधानों के अनुसार उपकर (सेस) को कानूनी दर्जा दिया गया तथा व्यय को पूरा करने के लिए उन्हें बढ़ाया भी जा सकता था।
इसमें जिला समिति के गठन की व्यवस्था थी तथा सरकारी व गैर-सरकारी सभी सदस्यों के मनोनयन आदि का उल्लेख था। जिला समिति का अध्यक्ष सरकारी व्यक्ति को बनाने का प्रावधान था। पर मेयो का प्रस्ताव भी सही मायनों में स्वायत्त संस्थाओं यानी पंचायतों की स्थापना नहीं कर सका क्योंकि पंचायतों में जन-प्रतिनिधित्व न के बराबर था और वे सरकारी व्यक्तियों का जमघट बनकर रह गई।
लार्ड रिपन का प्रस्ताव, जो 18 मई, 1882 में लागू हुआ, स्वायत्त शासन की संस्थाएं स्थापित करने में मील का पत्थर सिद्ध हुआ। इस प्रस्ताव में स्वायत्त शासन की संस्थाओं के विकास तथा लोगों की आशा व अभिलाषा को पूर्ण करने के लिए कुछ ठोस एवं व्यावहारिक प्रावधान थे।
इसमें स्वायत्त शासन की संस्थाएं स्थापित करने के लिए जिन प्रावधानों को आधार बनाया गया वे इस प्रकार थे:
गैर-सरकारी सदस्यों का बहुमत (किसी भी हालत में सरकारी सदस्य कुल सदस्यों के एक-तिहाई से अधिक नहीं होंगे);
  • गैर-सरकारी सदस्य लोगों द्वारा चुने जाएंगे।
  • जहाँ तक संभव होगा, जन-प्रतिनिधि ही बोर्डों के अध्यक्ष होंगे;
  • प्रत्येक प्रांत अपनी स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखकर प्रस्ताव को अमल में लाएगा।
इस प्रस्ताव में तालुका या तहसील को इकाई बनाया गया था। इसमें गांव के स्तर पर स्वायत्त शासन की संस्थाओं के गठन की बात नहीं कहीं गई थी। इस प्रस्ताव का बंबई के गवर्नर व बंगाल के लेफ्टीनेंट गवर्नर ने विरोध किया जबकि उत्तरी और पश्चिमी प्रांतों के प्रशासकों द्वारा इसका स्वागत किया गया। इसी कारण यह पूर्ण रूप में लागू नहीं हो सका। नतीजा यह हुआ है कि सरकारी अधिकारी ही बोर्डों के अध्यक्ष बनाए गए।
1901 से 1910 के दौरान भारत सचिव विस्काउंट मोडी ने इस बढ़ते हुए केन्द्रीकरण पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि केन्द्रीकरण से सरकार व लोगों के बीच खाई बढ़ गई है। इसे दूर करने के लिए 1907 में चार्ल्स होबहाउस की अध्यक्षता में शाही विकेन्द्रीकरण आयोग गठन किया गया। आयोग ने आम राय जानने के बाद पाया कि जनता विकेन्द्रीकरण चाहती है। जनता सरकारी अधिकारियों के वर्चस्व से भी खिन्न है।
आयोग का विचार था कि स्वायत्त शासन की संस्थाओं की शुरूआत ग्राम-स्तर से होनी चाहिए, न कि जिला-स्तर से, जैसा कि प्रचलन में था। उसका यह भी विचार था कि पंचायतें ग्रामीण विकास व दिन-प्रतिदिन के कार्यकलापों के अलावा न्याय-संबंधी कार्य भी करें, जिससे कि लोगों को कोर्ट-कचहरी के चक्कर से दूर रखा जा सके। फौजदारी व दीवानी मुकदमें सुनने के अलावा गांव की सफाई, तालाब, कुएं व सड़कों का निर्माण, प्राथमिक शिक्षा आदि पंचायतों के काम में शामिल किए गए।
आयोग के समक्ष इस बात को समझते हुए कि वित्तीय साधनों के अभाव में कार्य सौंपने का कोई अर्थ नहीं है, आयोग ने पंचायतों की वित्तीय स्थिति सुधारने और उनके लिए आय के साधन जुटाने हेतु निम्न सुझाव दिए:-
  • भूमि-कर का, जिसे जिला बोर्डों द्वारा लगाया जाता है, एक हिस्सा गांव पंचायतों को जाए।
  • जिला बोर्ड व जिलाधीश द्वारा स्थानीय सुधार के लिए विशेष अनुदान दिया जाए।
  • तलाबों व बाजारों आदि से प्राप्त आय पंचायतों को मिले।
  • उन मुकदमों की फीस मामूली रखी जाए जिनकी सुनवाई पंचायतें करें।
इस प्रकार शाही आयोग की सिफारिशें पंचायतों को वास्तव में जन-प्रतिनिधित्व की संस्थाएं बनाने और उसकी आर्थिक स्थिति मजबूत बनाने की दिशा में सराहनीय कदम थीं। उसी दौरान दिसंबर, 1909 में लाहौर में हए अखिल भारतीय कांग्रेस अधिवेशन में यह प्रस्ताव पारित किया गया कि सरकार ग्राम-स्तर से ऊपर तक जन-निर्वाचित स्थानीय निकाय स्थापित करने के लिए उचित कदम उठाए।
1915 में भारत सरकार ने एक प्रस्ताव पारित करके पंचायतों से संबधित कानून तथा नियम बनाने का कार्य प्रांतीय सरकारों को दे दिया। प्रस्ताव में सुझावा दिया गया कि बंगाल की चौकीदारी पंचायतों, मद्रास के स्थानीय विधि संघों, बंबई की स्वच्छता समितियों तथा उत्तर प्रदेश व पंजाब की ग्राम पंचायतों को समर्थ व सक्षम बनाने के लिए शक्तियां तथा वित्तीय साधन दिए जाएं। इसके अतिरिक्त इस प्रस्ताव में पंचायतों को मजबूत करने के लिए विभिन्न सिफारिशें भी की गई थी, लेकिन वे भी कागजों पर ही सीमित रह गई।
1919 में ब्रिटिश संसद ने भारत सरकार अधिनियम, 1919 पारित किया। इसे मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार के नाम से जाना जाता है। इस अधिनियम में पचायतें प्रांतीय सरकारों को हस्तातरित करने की बात कही गई थी। पंचायतों के अधिकारों और कार्यों पर जोर देते हुए इसमें कहा गया था कि वे जहां-जहां सफल रूप से कार्य कर रही हैं वहां-वहां उन्हें छोटे-छोटे फौजदारी व दीवानी मामले निपटाने के अधिकार तथा स्थानीय कर लगाने का अधिकार भी दिया जाना चाहिए। इसका परिणाम यह हुआ कि 1925 तक आठ प्रांतों में पंचायत अधिनियम, 1919, बिहार स्वायत्त शासन अधिनियम, 1920, बंबई ग्राम पंचायत अधिनियम, 1920, उत्तर प्रदेश ग्राम पंचायत अधिनियम,1920: पंजाब अधिनियम, 1922 तथा असम स्वायत्त शासन अधिनियम, 1925 पास किए गए। इसके अतिरिक्त विभिन्न रजवाड़ों में भी पंचायत अधिनियम पास किए गए।
1919 के भारत सरकार अधिनियम ने जहां पंचायत का विषय राज्य सरकारों को हस्तांतरित किया, वहां भारत सरकार अधिनियम, 1935 ने पंचायतों को प्रांतीय विधायी सूची में सम्मिलित कर दिया। 1937 में जब सभी प्रांतों में सरकारें बनीं तो सभी ने पंचायतों को जनप्रतिनिधत्व की संस्थाएं बनाया। लेकिन 1939 में द्वितीय विश्वयुद्ध छिड़ जाने से इस प्रक्रिया में पुनः गतिरोध आ गया।
1939 से 1946 तक भारत में हर स्तर पर गवर्नर का ही शासन चला जिसमें नौकरशाही का बोलबाला था। इस काल में ब्रिटिश सरकार ने पंचायतों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया।

स्वतंत्र भारत में पंचायती राज का विकास
जब भारत आजाद हुआ तो नया संविधान बनाने के लिए संविधान सभा गठित कि गई। (1946 में ही संविधान सभा का गठन हो चुका था।) जब संविधान सभा में विभिन्न प्रस्ताव पेश किये गये उनमें से स्वतंत्र भारत में पंचायतों के स्थान भूमिका आदि का भी प्रस्ताव शामिल था। विभिन्न मुद्दों पर सोच-विचार करने के लिए विभिन्न समितियाँ भी बनायी गयी। उन समितियों में पंचायत के मुद्दे पर बहस के दौरान अंबेडकर ने मैटकॉफ के एक प्रसिद्ध कथन का उद्धत करते हुए है कि-
भारत गांव का देश है गांवों के उन्नत एवं प्रगति पर ही भारत की उन्नति एवं प्रगति निर्भर करती है। गांधी जी ने ठीक ही कहा था कि, 'यदि गाँव नष्ट होते हैं तो भारत नष्ट हो जायेगा।' वस्तुतः हमारा जनतंत्र इस बुनियादी धारा पर आधारित है कि शासन के प्रत्येक स्तर पर जनता अधिक से अधिक कार्यों में हाथ बंटाये और राज करने की जिम्मेदारी स्वयं उठाये। भारत में जन तंत्र का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि ग्रामीण जनो का शासन से कितनी अधिक प्रत्यक्ष और सजीव संपर्क स्थापित हो जाता है। पण्डित जवाहर लाल नेहरू ने ठीक ही कहा था कि, 'यदि हमारे स्वाधीनता को जनता की आवाज की प्रतिध्वनि बनना है तो पंचायतों को जितनी अधिक शक्ति मिले जनता के लिए उतना ही भला है।'
नेहरू को लोकतांत्रिक तरीकों में अटूट विश्वास था। सन् 1952 में उन्हीं के पहल पर सामुदायिक विकास कार्यक्रम आरंभ हुआ। इस कार्यक्रम का आरंभ इसलिए किया गया था ताकि आर्थिक नियोजन एवं सामाजिक पुनरूद्धार की राष्ट्रीय योजना के प्रति देश की ग्रामीण जनता में सक्रिय रूचि पैदा की जा सके। परंतु सामुदायिक विकास के सरकार द्वारा प्रेरित एवं प्रायोजित कार्यक्रम में ग्रामीण जनता को नियोजन की परिधि में लाकर खड़ा कर दिया। परंतु ग्रामीण स्तर पर योजना के क्रियान्वयन में उसे इच्छुक पक्ष नहीं बनाया जा सका।
यह कार्यक्रम सरकारी तंत्र और ग्रामीण जनता के बीच की दूरी कम करने की मुख्य उद्देश्य में विफल रहा। क्योंकि-
  • इसे सरकारी महकमे की तरह चलाया गया।
  • गाँव के विकास के बजाय सामुदायिक विकास की सरकारी मशीनरी के विस्तार पर ही ज्यादा जोर दिया गया।
  • सामुदायिक विकास की सबसे बड़ी कमजोरी उसका सरकारी स्वरूप और नेताओं के लफ्फाजी थी। कार्यक्रम जनता को चलाना था लेकिन वे ऊपर से बनाये जाते थे।
देश आजाद हुआ, संविधान बन गया। पंचायतें उसका अंग बनीं। विभिन्न राज्यों में राजनीतिक पार्टियां सत्ता में आई। उन्होंने पंचायतें स्थापित करने व उन्हें सशक्त बनाने की बात की। पंचायतें गठित भी हुई। लेकिन वास्तव में जमीनी तौर पर कुछ नहीं हुआ। कारण यह है कि वे सही अर्थों में स्वायत्त शासन की संस्थाएं नहीं बन सकीं।
अगर विभिन्न राज्यों में पंचायतें बनीं तो उन पर राज्य का नियंत्रण रहा। कोई कर लगाना हो या अन्य कोई कार्य करना हो, हर बात के लिए सरकार से अनुमति लेनी होती थी और इसमें राज्य स्तर से कोई सहयोग पंचायतों को नहीं मिला। इसलिए जो कार्य पंचायतों को सौंपे गए उन्हें वे पूरा नहीं कर सकीं और कुल मिलाकर सत्ता के विकेन्द्रीकरण की बात कागजों तक सीमित होकर रह गई।

बलवंत राय मेहता समिति
जनवरी 1957 में भारत सरकार ने सामुदायिक विकास कार्यक्रम (1952) तथा राष्ट्रीय विस्तार सेवा (1953) द्वारा किए कार्यों की जांच और उनके बेहतर ढंग से कार्य करने के लिए उपाय सुझाने के लिए एक समिति का गठन किया। इस समिति के अध्यक्ष बलवंत राय मेहता थे। समिति ने नवंबर 1957 को अपनी रिपोर्ट सौंपी और 'लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण (स्वायतत्ता)' की योजना की सिफारिश की, जो कि अंतिम रूप से पंचायती राज के रूप में जाना गया। समिति द्वारा दी गई विशिष्ट सिफारिशें निम्नलिखित हैं:
  1. तीन स्तरीय पंचायती राज पद्धति की स्थापना-गांव स्तर पर ग्राम पंचायत, ब्लॉक स्तर पर पंचायत समिति और जिला स्तर पर जिला परिषद। ये तीनों स्तर आपस में अप्रत्यक्ष चुनाव द्वारा गठन जुड़े होने चाहिये।
  2. ग्राम पंचायत की स्थापना प्रत्यक्ष रूप से चुने प्रतिनिधियों द्वारा होना चाहिए, जबकि पंचायत समिति और जिला परिषद का गठन अप्रत्यक्ष रूप से चुने सदस्यों द्वारा होनी चाहिए।
  3. सभी योजना और विकास के कार्य इन निकायों को सौंपे जाने चाहिए।
  4. पंचायत समिति को कार्यकारी निकाय तथा जिला परिषद को सलाहकारी, समन्वयकारी और पर्यवेक्षण निकाय होना चाहिए।
  5. जिला परिषद का अध्यक्ष, जिलाधिकारी होना चाहिए।
  6. इन लोकतांत्रिक निकायों में शक्ति तथा उतरदायित्व का वास्तविक स्थानांतरण होना चाहिए।
  7. इन निकायों को पर्याप्त स्रोत मिलने चाहिएं ताकि ये अपने कार्यों और जिम्मेदारियों को संपादित करने में समर्थ हो सकें।
  8. भविष्य में अधिकारों के और अधिक प्रत्यायन के लिए एक पद्धति विकसित की जानी चाहिए।
समिति की इन सिफारिशों को राष्ट्रीय विकास परिषद द्वारा जनवरी, 1958 में स्वीकार किया गया। परिषद ने किसी विशिष्ट प्रणाली या नमूने पर जोर नहीं दिया और यह राज्यों पर छोड़ दिया ताकि वे अपनी स्थानीय स्थिति के अनुसार इन नमूनों को विकसित करें। किंतु बुनियादी सिद्धांत और मुख्य आधारभूत विशेषताएं पूरे देश में समान होनी चाहिए।
राजस्थान देश का पहला राज्य था, जहां पंचायती राज की स्थापना हुई। इस योजना का उद्घाटन 2 अक्टूबर, 1959 को राजस्थान के नागौर जिले में तत्कालीन प्रधानमंत्री प. जवाहरलाल नेहरु द्वारा किया गया। इसके बाद आंध्र प्रदेश ने इस योजना को 1959 में लागू किया। इसके बाद अधिकांश राज्यों ने इस योजना को प्रारंभ किया।
यद्यपि 1960 दशक के मध्य तक बहुत से राज्यों ने पंचायती राज संस्थाएं स्थापित की। फिर भी राज्यों की इन संस्थाओं में स्तरों की संख्या, समिति और परिषद की सापेक्षः स्थित, उनका कार्यकाल, संगठन, कार्य, राजस्व और अन्य तरीकों में अंतर था। उदाहरण के लिए राजस्थान ने त्रिस्तरीय पद्धति अपनाई जबकि तमिलनाडु ने द्विस्तरीय पद्धति अपनाई। पश्चिमी बंगाल ने चार स्तरीय पद्धति अपनाई। इसके अलावा राजस्थान-आंध्र-प्रदेश पद्धति में पंचायत समिति मजबूत थी क्योंकि नियोजन और विकास की इकाई ब्लॉक थी, जबकि महाराष्ट्र गुजरात पद्धति में, जिला परिषद शक्तिशाली थी क्योंकि योजना और विकास की इकाई जिला थी। कुछ राज्यों ने न्याय पंचायत की भी स्थापना की, जो छोटे दीवानी या आपराधिक मामलों के लिए थी।

अध्ययन दल तथा समितियाँ
सन् 1960 से पंचायती राज व्यवस्था की कार्य प्रणाली के विविध पक्षों का अध्ययन करने के लिए अनेक अध्ययन दल, समितियाँ तथा कार्यदल नियुक्त किए जाते रहे हैं।

अशोक मेहता समिति
दिसंबर 1977 में, जनता पार्टी की सरकार ने अशोक मेहता की अध्यक्षता में पंचायती राज संस्थाओं पर एक समिति को गठन किया। इसने अगस्त 1978 में अपनी रिपोर्ट सौंपी और देश में पतनोन्मुख पंचायती राज पद्धति को पुनर्जीवित और मजबूत 132 सिफारिशें की।
इसकी मुख्य सिफारिशें इस प्रकार हैं-
  • त्रिस्तरीय पंचायती राज पद्धति को द्विस्तरीय पद्धति में नाम बदलना चाहिए। जिला परिषद जिला स्तर पर, और उससे नीचे मंडल पंचायत में 15,000 से 20,000 जनसंख्या वाले गांवों के समूह होने चाहिए।
  • राज्य स्तर से नीचे लोक निरीक्षण में विकेंद्रीकरण के लिए जिला ही प्रथम बिंदु होना चाहिए।
  • जिला परिषद कार्यकारी निकाय होना चाहिए और वह राज्य स्तर पर योजना और विकास के लिए जिम्मेदार बनाया जाए।
  • पंचायती चुनावों में सभी स्तर पर राजनीतिक पार्टियों की आधिकारिक भागीदारी हो।
  • अपने आर्थिक स्रोतों के लिए पंचायती राज संस्थाओं के पास कराधान की अनिवार्य शक्ति हो।
  • जिला स्तर के अभिकरण और विधायिकों से बनी समिति द्वारा संस्था का नियमित सामाजिक लेखा परीक्षण होना चाहिए ताकि यह ज्ञात हो सके कि सामाजिक एवं आर्थिक रूप से सुभेद्य समूहों के लिए आबंटित राशि उन तक पहुंच रही है अथवा नहीं।
  • राज्य सरकार द्वारा पंचायती राज संस्थाओं का अतिक्रमण नहीं किया जाना चाहिए। आवश्यक अधिक्रमण करने की दशा में अधिक्रमण के छह महीने के भीतर चुनाव हो जाने चाहिएं।
  • 'न्याय पंचायत' को विकास पंचायत से अलग निकाय के रूप में रखा जाना चाहिए। एक योग्य न्यायाधीश द्वारा इनका सभापतित्व किया जाना चाहिए।
  • राज्य के मुख्य चुनाव अधिकारी द्वारा मुख्य चुनाव आयुक्त के परामर्श से पंचायती राज चुनाव कराए जाने चाहिएं।
  • विकास के कार्य जिला परिषद को स्थानांतरित होने चाहिएं और सभी विकास कर्मचारी इसके नियंत्रण और देखरेख में होने चाहिए।
  • पंचायती राज के समर्थन में लोगों को प्रेरित करने में स्वैच्छिक संगठनों की महत्वपूर्ण भूमिका होना चाहिए।
  • पंचायती राज संस्थाओं के मामलों की देखरेख के लिए राज्य मंत्रिपरिषद में एक मंत्री की नियुक्ति होनी चाहिए।
  • उनकी जनसंख्या के आधार पर अनुसूचित जाति व जनजाति के लिए स्थान आरक्षित होना चाहिए।
  • पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक मान्यता दी जानी चाहिए। इससे उन्हें उपयुक्त हैसियत (पवित्रता एवं महत्ता) के साथ ही सतत सक्रियता का आश्वासन मिलेगा।
समिति का कार्यकाल पूरा होने से पूर्व, जनता पार्टी सरकार के भंग होने के कारण, केंद्रीय स्तर पर अशोक मेहता समिति की सिफारिशों पर कोई कार्यवाही नहीं की जा सकी। फिर भी तीन राज्य कर्नाटक, पं० बंगाल और आंध्र प्रदेश ने अशोक मेहता समिति की सिफारिशों को ध्यान में रखकर पंचायती राज संस्थाओं के पुनरुद्धार के लिए कुछ कदम उठाए।

जी.वी.के. राव समिति
ग्रामीण विकास एवं गरीबी उन्मूलम कार्यक्रम की समीक्षा करने के लिए मौजूदा प्रशासनिक व्यवस्थाओं के लिए योजना आयोग द्वारा 1985 में जी.वी.के. राव की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया किया। समिति इस निष्कर्ष पर पहुंची कि विकास प्रक्रिया दफ्तरशाही युक्त होकर पंचायत राज से विच्छेदित हो गई है। विकास प्रशासन के लोकतंत्रीकरण के विपरीत उसके नौकरशाहीकरण की इस प्रक्रिया के कारण पंचायती राज संस्थाएं कमजोर हो गईं और परिणामस्वरूप इसे 'बिना जड़ की घास' कहा गया।
अतः समिति ने पंचायती राज पद्धति को मजबूत और पुनर्जीवित करने हेतु विभिन्न सिफारिशें की, जो इस प्रकार थीं:
  • जिला स्तरीय निकाय, अर्थात् जिला परिषद को लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण में सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान दिया जाना चाहिये। यह कहा गया कि “नियोजन एवं विकास की उचित इकाई जिला है तथा जिला परिषद को उन सभी विकास कार्यक्रमों के प्रबंधन के लिए मुख्य निकाय बनाया जाना चाहिये। जो उस स्तर पर संचालित किए जा सकते है
  • जिला एवं स्थानीय स्तर पर पंचायती राज संस्थाओं को विकास कार्यों के नियोजन, क्रियान्वयन एवं निगरानी में महत्वपूर्ण भूमिका प्रदान की जानी चाहिये।
  • प्रभावी जिला नियोजन विकेंद्रीकरण के लिये राज्य स्तर के कुछ नियोजन कार्यों को जिला स्तर पर हस्तांतरित किया जाना चाहिये।
  • एक जिला विकास आयुक्त के पद का सृजन किया जाना चाहिये। इसे जिला परिषद के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के रूप में कार्य करना चाहिए तथा उसे जिला स्तर के सभी विकास विभागों का प्रभारी होना चाहिये।
  • पंचायती राज संस्थानों में नियमित निर्वाचन होने चाहिये। यह पाया गया कि 11 राज्यों में एक अथवा अधिक स्तरों के लिए ये चुनाव समय से संपन्न नहीं कराये गए हैं।
समिति ने पंचायतों को मजबूत करने के लिए निम्नलिखित सुझाव दिए-
  • योजनाएं तैयार करने, निर्णय लेने व उसे लागू करने का कार्य पंचायतों को सौंपा जाए क्योंकि वे जनता के अधिक निकट हैं।
  • समिति का मत था कि जिला स्तर पर विशेष रूप से विकेन्द्रीकरण किया जाना चाहिए। जिला परिषद के एक सदस्य को 30,000 से 40,000 की जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करना चाहिए। बैंकों, शहरी स्थानीय स्वायत्त संस्थाओं के प्रतिनिधि, विधान सभाओं के सदस्य व सांसद भी इसमें सहयोजित होने चाहिए। इसका कार्यकाल आठ वर्ष का होना चाहिए। कार्यकाल समाप्त होते ही तुरंत चुनाव कराने चाहिए विशेष परिस्थिति में यदि उनका कार्यकाल बढ़ाया भी जाए तो वह छह महीने से अधिक नहीं होना चाहिए।
  • जिल स्तर के सभी कार्यालय स्पष्ट रूप से जिला परिषद के अधीन होने चाहिए। कृषि, पशुपालन, सहकारिता, लघु, सिंचाई, प्राथमिक व प्रौढ़ शिक्षा, लोक स्वास्थ्य, ग्रामीण जल आपूर्ति, जिले की सड़कें, लघु व ग्रामोद्योग, अनुसूचित जाति व अनूसूचित जनजाति का कल्याण, समाज व महिला कल्याण और सामाजिक वनपालन जिला परिषदों को दे देने चाहिए।
  • कार्य संपादन के लिए जिला परिषदों की विभिन्न समितियां गठित की जानी चाहिए।
  • राज्य सरकारों द्वारा दी जानेवाली धनराशि को निर्धारित करने का काम वित्त आयोग को दिया जाना चाहिए, जिसकी नियुक्ति हर पांच साल के बाद होनी चाहिए। जिला स्तर पर वित्त पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होता रहे, इसके लिए मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में राज्य विकास परिषद् का गठन होना चाहिए। राज्य सरकार में सभी मंत्री व जिला परिषदों के अध्यक्ष इस समिति के सदस्य होने चाहिए।
इस प्रकार समिति ने विकेन्द्रित क्षेत्रीय प्रशासन की अपनी योजना में पंचायती राज को स्थानीय आयोजना एवं विकास में प्रमुख भूमिका प्रदान की। यहाँ इसी बिन्दु पर जी.वी.के.राव समिति रिपोर्ट 1986 प्रखंड स्तरीय आयोजना पर दाँतवाला समिति, 1978 तथा जिला आयोजना पर हनुमंत राव समिति रिपोर्ट 1984 से अलग है। दोनों समितियों में यह सुझाया गया था कि मूलभूत विकेन्द्रित आयोजना का कार्य जिला स्तर पर सम्पन्न किया जाना चाहिए। हनुमंत राव समिति ने जिला अधिकारी अथवा किसी मंत्री के अधीन अलग जिला योजना निकायों की वकालत की थी। इन दोनों मॉडल में जिलाधिकारी की विकेन्द्रित आयोजना में महत्वपूर्ण भूमिका बनती है।
हालाँकि समिति का कहना था कि विकेन्द्रित आयोजना कि इस प्रक्रिया में पंचायती राज संस्थाओं को भी जोड़ा जाए। समिति ने जिला स्तर पर सभी विकासात्मक एवं आयोजना गतिविधियों के लिए जिलाधिकारी को समन्वयक बनाने की अनुशंसा भी।
इस प्रकार हनुमंत राव समिति बलवंत राय मेहता समिति, प्रशासनिक सुधार आयोग, अशोक मेहता समिति तथा अंत में जी.वी. में राव समिति से भिन्न अनुशंसाएँ भी हैं, जिन्होंने एक जिलाधिकारी की विकासात्मक भूमिका को सीमित करने की अनुशंसा की तथा विकासात्मक प्रशासन में पंचायती राज को महत्वपूर्ण भूमिका प्रदान की।

एल.एम. सिंघवी समिति
एल.एम.सिंघवी समिति राव समिति की रिपोर्ट के एक वर्ष बाद एल.एम.सिंघवी की अध्यक्षता में पंचायती राज संबंधी प्रपत्र तैयार करने के लिए समिति गठित की गई जिसने अपनी रिपोर्ट 27 नवम्बर 1986 को प्रस्तुत की।
1986 में राजीव गांधी सरकार ने लोकतंत्र व विकास के लिए पंचायती राज संस्थाओं का पुनरुद्धार' पर एक अवधारणा पत्र तैयार करने के लिए एक समिति का गठन एल.एम. सिंहवी की अध्यक्षता में किया।
इसने निम्न सिफारिशें दीं:
  • पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक रूप से मान्यता देने और उनके संरक्षण की आवश्यकता है। इस कार्य के लिये भारत के संविधान में एक नया अध्याय जोड़ा जाये। इससे उनकी पहचान और विश्वसनीयता अनुलंघनीय होने में महत्वपूर्ण मदद मिलेगी। इसने पंचायती राज निकास के नियमित स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव कराने के संवैधानिक उपबंध की सलाह भी दी।
  • गांवों के समूह के लिए न्याय पंचायतों की स्थापना की जाये।
  • ग्राम पंचायतों को ज्यादा व्यवहार बनाने के लिए गांवों का पुनर्गठन किया जाना। इसने ग्राम सभा की महत्ता पर भी जोर दिया तथा इसे प्रत्यक्ष लोकतंत्र की मूर्ति बताया।
  • गांव की पंचायतों को ज्यादा आर्थिक संसाधन उपलब्ध कराये जाने चाहिये।
  • पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव, उनके विघटन एवं उनके कार्यों से संबंधित जो भी विवाद उत्पन्न होते हैं. उनके निस्तारण के लिये न्यायिक अधिकरणों की स्थापना की जानी चाहिये।
इस समिति ने पंचायतों का अवलोकन व मूल्यांकन करने के बाद पंचायती राज व्यवस्था को पुनर्जीवित करने के लिए विभिन्न सिफारिशें की।
इनमें प्रमुख सिफारिश पंचायती राज प्रणाली के कुछ पहलुओं को संवैधानिक दर्जा दिया जाना था ताकि इन्हें राजनीतिज्ञों व नौकरशाही के हस्तक्षेप से दूर रखा जा सके। न्याय पंचायतों के गठन की सिफारिश भी की गई।
समिति ने पहली बार पंचायतों से संबंधित संविधान संशोधन विधेयक का मसौदा तैयार किया। इस समिति का दृष्टिकोण था कि पंचायतों को एक ऐसा समग्र संस्थागत ढांचे के रूप में संगठित किया जाना चाहिए जिसका आधार नीचे से ऊपर की ओर उन्मुख लोकतांत्रिक विकेन्दीकरण हो। इन स्वशासन की संस्थाओं के माध्यम से विकेन्द्रीकृत शासन, योजना तथा विकास की प्रक्रिया में जनता की सहभागिता इनका उद्देश्य था।

पी.के. थुंगन समिति
थुंगन समिति ने भी पंचायती राज को संवैधानिक आधार देने का समर्थन किया परंतु थुंगन समिति के अनुसार, भारत में पंचायतों का संबंध सीधा संघ सरकार से होना चाहिए। अतः समिति ने पंचायती राज को राज्यों का विषय नहीं माना।
1988 में, संसद की सलाहकार समिति की एक उप-समिति पी. के. थुंगन की अध्यक्षता में राजनीतिक औ प्रशासनिक ढांचे की जांच करने के उद्देश्य से गठित की गयी। इस समिति में पंचायती राज व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए सुझाव दिया।
इस समिति ने निम्न अनुशंसाएं की थी :
  1. पंचायती राज्य संस्थाओं को संवैधानिक मान्यता प्राप्त होनी चाहिए।
  2. गांव प्रखंड तथा जिला स्तरों पर त्रि-स्तरीय पंचायती राज
  3. जिला परिषद को पंचायती राज व्यवस्था की धुरी होना चाहिए। इसे जिले में योजना निर्माण एवं विकास की एजेंसी के रूप में कार्य करना चाहिए।
  4. पंचायती राज संस्थाओं का पांच वर्ष का निश्चित कार्यकाल होनी चाहिए।
  5. एक संस्था के सुपर सत्र की अधिकतम अवधि छह माह होनी चाहिए।
  6. राज्य स्तर पर योजना मंत्री की अध्यक्षता में एक योजना निर्माण तथा समन्वय समिति गठित होनी चाहिए।
  7. पंचायती राज पर केंद्रित विषयों की एक विस्तृत सूची तैयार करनी चाहिए तथा उसे संविधान में समाहित करना चाहिए।
  8. पंचायती राज के तीन स्वरों पर जनसंख्या के हिसाब से आरक्षण होनी चाहिए। महिलाओं के लिए भी आरक्षण होनी चाहिए।
  9. हर राज्य में एक राज्य वित्त आयोग का गठन होना चाहिए। यह आयोग पंचायती राज संस्थाओं को वित्त के वितरण के पात्रता-बिंदु तथा विधियां तय करेगा।
  10. जिला परिषद का मुख्य कार्यकारी पदाधिकारी जिले का कलक्टर होगा।

गाडगिल समिति
1988 में वी.एन गाडगिल की अध्यक्षता में एक नीति एवं कार्यक्रम समिति का गठन कांग्रेस पार्टी ने किया था। इस समिति से इस प्रश्न पर विचार करने के लिए कहा गया कि "पंचायती राज संस्थाओं को प्रभावी कैसे बनाया जा सकता।" इस संदर्भ में समिति ने निम्नलिखित अनुशंसाएं की थी-
  • पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा दिया जाए।
  • गाँव, प्रखंड तथा जिला स्तर पर त्रि-स्तरीय पंचायती राज होना चाहिए।
  • पचायती राज संस्थाओं का कार्यकाल पाँच वर्ष सुनिश्चित कर दिया जाए।
  • पंचायत के सभी तीन स्तरों के सदस्यों का सीधा निर्वाचन होना चाहिए।
  • अनुसूचित जातियों, जनजातियों तथा महिलाओं के लिए आरक्षण होना चाहिए।
  • पंचायती राज संस्थाओं की यह जिम्मेवारी होगी कि वे पंचायत क्षेत्र के सामाजिक आर्थिक विकास के लिए योजनाएँ बनाएँगे तथा उन्हें कार्यान्वित करेंगे।
  • पंचायती राज संस्थाओं को कर (taxes) तथा (duties) लगाने, वसूलने तथा जमा करने का अधिकार होगा।
  • एक राज्यवित्त आयोग की स्थापना हो जो पंचायतों को वित्त का आवंटन करें
  • एक राज्य चुनाव आयोग की स्थापना हो जो पंचायतों के चुनाव संपन्न करवाए।
गाडगिल समिति की ये अनुशंसाएँ एक संशोधन विधेयक के निर्माण का आधार बनीं। इस विधेयक का लक्ष्य था-पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा तथा सुरक्षा देना।

पंचायती राज के विकास में मील के पत्थर'

पहली पीढ़ी की पंचायतों की ओर 
  • 1948 - 49 संविधान सभा में पंचायती राज की भूमिका पर चर्चा
  • 1950 - 26 जनवरी को भारत का संविधान लागू हुआ। राज्य के नीति-निदेशक सिद्धान्तों के अंतर्गत ग्राम पंचायतों का "स्वशासन की इकाइयों" के रूप में उल्लेख किया गया (अनुच्छेद 40)।
  • 1952 - 2 अक्टूबर को सामुदायिक विकास कार्यक्रम का शुभारंभ
  • 1957 - बलवंत राय मेहता समिति का जनवरी में गठन, समिति ने 24 नवम्बर को अपनी रिपोर्ट सौंपी
  • 1958-60 - कतिपय राज्य सरकारों ने पंचायत अधिनियम पारित किए जिनमें त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था का प्रावधान किया गया।
  • 1959 - 2 अक्टूबर को राजस्थान के नागौर में जवाहरलाल नेहरू ने प्रथम पीढ़ी की पंचायत का उद्घाटन किया। केरल विधान सभा में केरल जिला परिषद् विधेयक लाया गया। विधान सभा भंग होने के पश्चात यह विधेयक पारित नहीं हो सका।
  • 1964-67 - प्रथम पीढ़ी के पंचायती राज संस्थाओं का अवसान

दूसरी पीढ़ी की पंचायतों का विकास एवं अवसान
  • 1978 - पश्चिम बंगाल में 4 जून को दलीय आधार पर पंचायत चुनाव सम्पन्न और इसी के साथ दसरी राज की शुरूआत। पंचायतों की कार्य-प्रणाली पर 12 दिसम्बर, 1977 को अशोक मेहता समिति की नियुक्ति जिसने अपनी रिपोर्ट 21 अगस्त, 1978 को सौंपी।
  • 1983 - कर्नाटक सरकार ने नया पंचायती राज अधिनियम अधिनियमित किया।
  • 1984 - योजना आयोग द्वारा सितम्बर 1982 में जिला स्तरीय आयोजना पर गठित हनुमंत राव समिति ने अपनी रिपोर्ट सौंपी।
  • 1985 - कर्नाटक पंचायती राज अधिनियम को जुलाई में राष्ट्रपति की स्वीकृति। 14 अगस्त से यह कानून लागू।
  • 1985 - योजना आयोग द्वारा ग्रामीण विकास के प्रशासकीय पक्ष पर 25 मार्च को गठित जी.वी.के राव समिति ने अपनी रिपोर्ट दिसम्बर में सौंपी।
  • 1986 - आंध्र प्रदेश ने पश्चिम बंगाल तथा कर्नाटक के पंचायती राज मॉडल का अनुसरण किया।
  • 1987 - कर्नाटक में जनवरी में पंचायत चुनाव सम्पन्न।
  • 1990-92 - कर्नाटक में पंचायतें भंग, उन्हें प्रशासकों के अधीन किया गया।

III पंचायती राज को संवैधानिक दर्जा
  • 1986 - एल.एम. सिंघवी समिति ने 27 नवम्बर को अपनी रिपोर्ट सौंपी, पंचायतों को संवैधानिक दर्जा देने की अनुशंसा भी की।
  • 1988 - संसद की परामर्शदात्री समिति ने पी.के. थुगन की अध्यक्षता में एक उप-समिति संविधान संशोधन पर विचार करने के लिए गठित की।
  • 1989 - संसद में 15 मई को 64 वाँ संविधान संशोधन विधेयक लाया गया, जो कि 15 अक्टूबर को राज्य सभा में पराजित हो गया।
  • 1990 - संसद में 07 सितम्बर को 74वाँ संविधान संशोधन विधेयक लाया गया, जो कि लोकसभा भंग होने के पश्चात रद्द हो गया।
  • 1991 - संसद में 72वाँ (पंचायत) एवं 73वाँ (नगर निकाय) संशोधन विधेयक लाए गए जिन्हें संसद की संयुक्त प्रवर समिति को सितम्बर में संदर्भित कर दिया गया।
  • 1992 - 22 दिसम्बर को लोकसभा में दोनों विधेयक पारित, जबकि 23 दिसम्बर को राज्यसभा में दोनों विधेयक पारित हो गए।
  • 1993 - 73वाँ संशोधन अधिनियम, 1992 24 अप्रैल से लागू हो गया। 74वाँ संशोधन अधिनियम, 1992 01 जून से लागू हो गया।
  • 1993-94 - सभी राज्य सरकारों ने 30 मई, 1993 और 23 अप्रैल, 1994 के बीच समनुरूप अधिनियम पारित किया।
  • 1994 - 30 मई को 73वें संशोधन के अन्तर्गत मध्य प्रदेश में पंचायत चुनाव सम्पन्न।
  • 1996 - पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम 1996 (PESA) के प्रावधान जिनके अंतर्गत 73वें संशोधन को अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तरित किया गया। 24 दिसम्बर से लागू हो गया। केरल में 16 अगस्त को जन-योजना अभियान (People's Plan Campaign) शुरू किया गया।
  • 2001 - बिहार में 23 वर्षों बाद पंचायत चुनाव सम्पन्न (11 से 30 अप्रैल)।
  • 2001 - 83 वें संविधान संशोधन अधिनियम 2000 के द्वारा अनुच्छेद 243एम में संशोधन लाया गया, जो कि अरुणाचल प्रदेश में अनुसूचित जातियों के आरक्षण से संबंधित है-अब तक बचे एकमात्र राज्य में नई परिस्थितियों में पंचायत चुनाव कराने का मार्ग प्रशस्त हुआ।

पंचायती राज का महत्व

ब्रिटिश युग तक पंचायतों ने गांवों के सामाजिक जीवन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है और ग्रामीणों के बीच कई छोटे विवादों को भी सुलझाया है। ब्रिटिश राज के अन्तर्गत अदालतों, कानूनों और राजस्व संग्रह की नई व्यवस्था के कारण पंचायतों की पुरानी शक्ति और सम्मान समाप्त हो गयी। यद्यपि स्वतंत्र भारत के संविधान में राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांत संघीय और राज्य सरकारों को ग्राम पंचायतों को संगठित करने तथा उन्हें ऐसी शक्तियां और सता देने के प्रयास करने के निर्देश देता है, जो उन्हें स्वशासन की इकाई के रूप में कार्य करने के लिए आवश्यक हो, परंतु राज्यों ने पंचायती राज को गंभीरता से नहीं लिया। अब उन्हें संवैधानिक दर्जा दिया गया है।

पंचायतों की संरचना

पंचायत के तीनों स्तरों पर सदस्यों का चुनाव प्रत्यक्ष रूप से होगा। लेकिन अध्यक्ष पदों के लिए निचले स्तर अर्थात ग्राम पंचायत को छोड़कर मध्य व जिला स्तर पर चुनाव प्रत्यक्ष रूप से चुने सदस्यों द्वारा किया जाएगा। ग्राम पंचायत स्तर पर अध्यक्ष का चनाव प्रत्यक्ष रूप से हो या अप्रत्यक्ष रूप से हो, यह राज्य विधान मंडल पर छोड़ दिया है।

अवधि
पंचायतों का कार्यकाल उनकी पहली बैठक से पांच वर्ष का होगा। पंचायतों को भंग कर दिए जाने की स्थिति में चुनाव 6 महीने के अंदर होने जरूरी हैं।

ऐच्छिक प्रावधान
ऐच्छिक प्रावधान वे हैं, जो राज्य विधानमंडल की इच्छा पर छोड़ दिया गया है। दूसरे शब्दों में उनका होना अनिवार्य नहीं है। संविधान संशोधन अधिनियम में उसके उल्लेख मात्र कर दिया है।

विभिन्न स्तरों के नाम
पंचायतों के तीन स्तरों के नाम क्या-क्या होंगे यह राज्य। विधानमंडल को तय करना है। यही कारण है कि पंचायतों के नाम सभी राज्यों में एक समान नहीं है। निम्न स्तर पर कहीं 'विलेज' पंचायत है तो कहीं 'ग्राम पंचायत' है। मध्य स्तर पर कहीं पंचायत समिति है, तो कहीं क्षेत्र पंचायत है, कहीं जनपद पंचायत है, कहीं मंडल पंचायत है, तो कहीं तालुका पंचायत है। जिला स्तर पर कहीं जिला पंचायत हैं, तो कहीं जिला परिषद हैं।

पंचायती राज के तीन स्तर

(i) ग्राम स्तर पर पंचायत यह पंचायती राज का आधार अथवा आधारभूत स्तर है। किसी एक गांव अथवा गांवों के समूह के लिए पंचायत में (क) ग्राम सभा, (प्रत्यक्ष लोकतंत्र की प्रतीक) और (ख) ग्राम पंचायत होती हैं।

(a) ग्राम सभा
प्रत्यक्ष लोकतंत्र की संस्था ग्राम सभा को मान्यता देना, 73वें संशोधन की एक महत्वपूर्ण विशेषता है। गांवों के सभी वयस्क निवासी ग्राम सभा के सदस्य होते हैं। अतः देश में प्रत्यक्ष लोकतंत्र की यह अकेली संस्था है। सामान्यतः ग्राम सभा की वर्ष में दो बैठकें सभाएं होती हैं। इन सभाओं में ग्राम सभा लोगों की आम सभा होने के नाते पंचायतों की वार्षिक आय-व्यय का व्यौरा. लेखा निरीक्षण अथवा पंचायतों की प्रशासनिक रिपोर्ट को सुनती है। यह पंचायतों द्वारा लिए जाने वाली नई विकासात्मक परियोजनाओं को भी स्वीकृति प्रदान करती है। यह गांव के गरीब लोगों की पहचान करने में भी सहायता प्रदान करती है ताकि उन्हें आर्थिक सहायता दी जा सके।

(b) ग्राम पंचायत
देश में पंचायती राज का निचला स्तर ग्राम स्तरीय पंचायत है। अधिकांश राज्यों में इसे ग्राम पंचायत के रूप में जाना जाता है। ग्राम पंचायत के सदस्य जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से चुने जाते हैं। ग्राम पंचायत के सदस्यों की संख्या को गांव की जनसंख्या के आधार पर निश्चित किया जाता है। अत: यह प्रत्येक गांव के लिए भिन्न-भिन्न होती है। एकल सदस्य चुनाव क्षेत्र के आधार पर चुनाव करवाए जाते हैं। जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है कि कुल सीटों की संख्या का एक तिहाई महिलाओं के लिए आरक्षित है और कुछ अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए जिनमें एक तिहाई अनुसूचित जातियों और जनजातियों की महिलाओं के लिए है।
अलग-अलग राज्यों में ग्राम पंचायतों के अध्यक्ष को अलग-अलग नाम से जैसे सरपंच, प्रधान अथवा मुखिया पुकारा जाता है। एक उपाध्यक्ष भी होता है। दोनों को पंचायत के सदस्य चुनते हैं। ग्राम पंचायतें साधारणतया महीने में एक बार अपनी बैठक करती हैं। पंचायतें सभी स्तरों पर अपना काम चलाने के लिए समितियां गठित करती हैं।

(ii) पंचायत समिति
पंचायती राज का दूसरा अथवा मध्यम स्तर पंचायत समिति है जो ग्राम पंचायत और जिला परिषद के बीच की कड़ी है। पंचायत समिति की सदस्य संख्या भी समिति क्षेत्र की जनसंख्या पर निर्भर करती है। पंचायत समिति में कुछ सदस्य सीधे निर्वाचित होते हैं। ग्राम पंचायतों के अध्यक्ष पंचायत समिति के पदेन सदस्य होते हैं। परंतु सभी पंचायतों के अध्यक्ष एक ही समय पर पंचायत समिति के सदस्य नहीं होते। इसका अर्थ यह है कि एक समय पर कुछ ही ग्राम पंचायतों के अध्यक्ष इसके सदस्य होते हैं। कुछ पंचायतों में क्षेत्र से संबंधित विधायकों, विधान परिषद के सदस्यों और सांसदों को भी समिति के सदस्य के रूप में शामिल किया जाता है। पंचायत समिति के अध्यक्ष को प्रायः प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित सदस्यों में से चुना जाता है।

(ii) जिला परिषद
जिला स्तर पर जिला परिषद पंचायती राज का सबसे उच्च स्तर है। इस संस्था के अलग कुछ सदस्य प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित किए जाते हैं जिनकी संख्या एक राज्य से दूसरे राज्य में अलग होती है क्योंकि यह भी जनसंख्या पर आधारित है। पंचायत समितियों के अध्यक्ष जिला परिषद के पदेन सदस्य होते हैं। जिला से संबंध रखने वाले सांसद, विधान सभा और विधान परिषद के सदस्यों को भी जिला परिषद का सदस्य नामांकित किया जाता है। जिला परिषद के चैयरपर्सन, जिसे अध्यक्ष कहा जाता है, को प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित सदस्यों में से चुना जाता है। वाईस चैयरमैन या उपाध्यक्ष को भी इसी प्रकार चुना जाता है। जिला परिषद की मीटिंग मास में एक बार की जाती है। विशेष मामलों पर चर्चा के लिए विशेष बैठकें की जा सकती हैं। विषय समितियां भी बनाई जाती हैं।
पदेन सदस्य इसलिए पद पर नहीं होता कि उसे निर्वाचित किया गया है अपितु उसके पास दूसरा कोई पद होने के कारण वह पद का हकदार होता है।

पंचायतों के अध्यक्षों के नाम

इनमें भी सभी राज्यों में समानता नहीं है। कहीं पर ग्राम स्तर पर अध्यक्ष का नाम, 'प्रधान' है तो कहीं 'सरपंच' है। मध्य स्तर के अध्यक्ष को कहीं प्रमुख' कहते हैं तो कही 'प्रधान' से संबोधित करते हैं।

पंचायतों का गठन

ग्राम पंचायत स्तर पर अध्यक्ष का चुनाव प्रत्यक्ष हो या परोक्ष यह भी विधानमंडल पर छोड़ा हुआ है।
ग्राम पंचायत के अध्यक्षों का प्रतिनिधित्व मध्य स्तर पर व मध्य स्तर के अध्यक्षों का प्रतिनिधित्व उच्च पर हो या न हो यह भी राज्य विधानमंडल पर छोड़ा हुआ है।
सांसद या विधान सभा के सदस्य मध्य या उच्च स्तर के सदस्य हों, यह भी राज्य के विधानमंडल पर छोड़ा हुआ है।

पंचायतों की शक्तियां व अधिकार

राज्य व विधानमंडल विधि द्वारा पंचायतों को वे सभी शक्तियां और अधिकार प्रदान करेगा, जो उन्हें स्वायत्त शासन की संस्थाओं के रूप में कार्य करने में सक्षम बनाएं। निर्दिष्ट शर्तों के अधीन पंचायत आर्थिक विकास व सामाजिक न्याय के लिए योजनाएं तैयार करेगी तथा उन्हें क्रियान्वित करेगी जिसमें विभिन्न योजनाएं भी शामिल हैं। संविधान संशोधन में 11वीं अनुसूची संलग्न है, जिसमें 29 विषय सूचीबद्ध हैं उन्हें भी योजना बनाते समय शामिल किया जाना है। तीन स्तरों के अतिरिक्त ग्राम सभा के अधिकार व शक्तियां कितनी हो वह भी राज्य विधानमंडल पर छोड़ दिया गया है।

वित्त
पंचायतों को कर, पथ-कर व शुल्क लगाने, करों का बंटवारा करने तथा अनुदान लेने का प्रावधान भी विधानमंडल पर छोड़ा हुआ है।

लेखा
पंचायतों के हिसाब-किताब की जांच आदि का प्रावधान भी राज्य के विधानमंडल द्वारा किए जाने का प्रावधान है।
उपर्युक्त से स्पष्ट है कि पंचायतों को अधिकार व शक्तियां देने का दायित्व संपूर्ण रूप से राज्य विधानमंडल पर छोड़ा गया है। इसलिए, राज्य विधानमंडल ने राज्य के पंचायती राज्य अधिनियमों में अनिवार्य प्रावधान शामिल करके बाकी पहले से चले आ रहे प्रावधान ही अधिनियमों में रख दिए हैं। यहां महत्वपूर्ण बात यह है कि पंचायतों को वांछित अधिकार व शक्तियां तथा इनको पूरा करने के लिए पर्याप्त वित्त का प्रावधान होना जरूरी है। तभी जाकर ये संस्थाएं स्वायत्त शासन की संस्थाएं बनती है जैसा कि संविधान संशोधन की धारा 243-छ में इन्हें ऐसा बनाने के लिए कहा गया है। संविधान संशोधन में वैसे 29 विषय 11वीं अनुसूची के माध्यम से पंचायतों को सौंपो गए हैं।

ग्राम पंचायत की कार्य तथा शक्तियां
संविधान के 73वें संशोधन द्वारा 11वीं अनुसूची स्थापित कर राज्य विधानमंडल तथा पंचायतों के मध्य शक्तियों का उसी प्रकार विभाजन किया गया है जिस प्रकार 7वीं अनसची में संघ तथा राज्य विधान मंडलों के मध्य किया गया है। पंचायतों की शक्तियों तथा कार्यों को तीन प्रवर्गों में रखा गया है

अनिवार्य कार्य
  • चिकित्सा एवं स्वास्थ्य रक्षा
  • सड़क तथा गलियों का निर्माण
  • प्रारंभिक तथा माध्यमिक शिक्षा का प्रबंध
  • पीने के पानी की व्यवस्था
  • मातृत्व एवं बाल कल्याण
  • सार्वजनिक बाजारों तथा स्थलों की व्यवस्था
  • कृषि का विकास
  • शांति तथा कानून व्यवस्था की स्थापना में राज्य सरकार का सहयोग

ऐच्छिक कार्य
  • इसके तहत ऐसे कार्य रखे गए हैं जिसको पंचायत अपनी आर्थिक स्थिति के अनुरूप अपना सकती है-
  • सड़क के दोनों ओर पेड़ लगाना।
  • पुस्तकालय तथा वाचनालय की स्थापना।
  • प्राकृतिक आपदा के समय ग्रामवासियों की सहायता।
  • ग्रामवासियों के मनोरंजन का प्रबंध।

विकासात्मक कार्य
  • लघु, कुटीर तथा वनोद्योगों का विकास
  • भूमि सुधार कानूनों को लागू करना
  • तकनीकी तथा व्यावसायिक शिक्षा को बढावा देना
  • सार्वजनिक वितरण प्रणाली को मजबूत बनाने में सरकार की मदद करना।

ग्राम पंचायत में स्थानों का आरक्षण
  • प्रत्येक पंचायत में अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति को उसकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण दिया जाएगा।
  • राज्य विधायिका को अधिकार होगा कि वह ग्राम प्रधान की एक तिहाई सीटों हेतु SC,ST के लिए आरक्षण का प्रावधान करें।
  • अधिनियम में राज्य विधायिका को OBC के लिए सदस्य तथा अध्यक्ष स्तर पर आरक्षण करने की शक्ति दी गई है।
  • अधिनियम में कुल सीटों के कम से कम 1/3 सीटों को महिलाओं के लिए (SC,ST वर्ग की महिला सहित) आरक्षित करने का प्रावधान दिया गया है।
  • पंचायत के अध्यक्ष के स्तर पर महिलाओं को 1/3 आरक्षण दिया जाएगा।


संवैधानीकरण

राजीव गांधी सरकार : एल.एम. सिंघवी समिति की उपरान्त अनुशंसाओं की प्रतिक्रिया। राजीव गांधी सरकार ने पंचायती राज संस्थाओं के संवैधानीकरण और उन्हें ज्यादा शक्तिशाली और व्यापक बनाने हेतु जुलाई 1989 में 64वां संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में पेश किया। यद्यपि अगस्त 1989 में लोकसभा ने यह विधेयक पारित किया, किंतु राज्यसभा द्वारा इसे पारित नहीं किया गया। इस विधेयक का विपक्ष द्वारा जोरदार विरोध किया गया क्योंकि इसके द्वारा संघीय व्यवस्था में केंद्र को मजबूत बनाने का प्रावधान था।

वी.पी. सिंह सरकार : नवंबर 1989 में वी.पी. सिंह के प्रधानमंत्रित्व में राष्ट्रीय मोर्चा सरकार ने कार्यालय संभाला और शीघ्र ही घोषणा की कि वहे पंचायती राज संस्थाओं को मजबूती प्रदान करेगी। जून 1990 में पंचायती राज संस्थाओं के मजबूत करने संबंधी मामलों पर विचार करने के लिए वी.पी. सिंह की अध्यक्षता में राज्यों के मुख्यमंत्रियों का 2 दिन का सम्मेलन हुआ। सम्मेलन में एक नए संविधान संशोधन विधेयक को पेश करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई। परिणामस्वरूप, सितंबर 1990 में लोकसभा में एक संविधान संशोधन विधेयक प्रस्तुत किया गया। लेकिन सरकार के गिरने के साथ ही यह विधेयक भी समाप्त हो गया।

नरसिम्हा राव सरकार : पी.वी. नरसिम्हा राव के प्रधानमंत्रित्व में कांग्रेस सरकार ने एक बार फिर पंचायती राज के संवैधानिकरण के मामले पर विचार किया। इसने प्रारंभ के विवादस्पद प्रावधानों को हटाकर नया प्रस्ताव रखा और सितंबर, 1991 को लोकसभा में एक संविधान संशोधन विधेयक प्रस्तुत किया। अंतत: यह विधेयक 73वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 के रूप में पारित हुआ और 24 अप्रैल, 1993 को प्रभाव में आया।

1992 का 73वां संशोधन अधिनियम

अधिनियम का महत्व
इस अधिनियम ने भारत के संविधान में एक नया खंड-IX सम्मिलित किया। इसे 'पंचायतें' नाम से इस भाग में उल्लिखित किया गया और अनुच्छेद 243 से 243 'ण' के प्रावधान सम्मिलित किए गए। इस अधिनियम ने संविधान में एक नई 11वीं सूची भी जोड़ी। इस सूची में पंचायतों की 29 कार्यकारी विषय-वस्तु है। यह अनुच्छेद 243-जी से संबंधित है।
इस अधिनियम ने संविधान के 40वें अनुच्छेद को एक व्यवहारिक रूप दिया, जिसमें कहा गया है कि, "ग्राम पंचायतों को गठित करने के लिए राज्य कदम उठाएगा और उन्हें उन आवश्यक शक्तियों और अधिकारों से विभूषित करेगा जिससे कि वे स्वशासन की इकाई की तरह कार्य करने में सक्षम हो। यह अनुच्छेद राज्य नीति के निदेशक सिद्धांतों का एक हिस्सा है।"
इस अधिनियम ने पंचायती राज संस्थाओं को एक संवैधानिक दर्जा दिया और इसे संविधान के अंतर्गत वाद योग्य हिस्से के अधीन लाया। दूसरे शब्दों में इस अधिनियम के उपबंध के अनुसार नई पंचायती राज पद्धति को अपनाने के लिए राज्य सरकारें संवैधानिक से बाध्य है। परिणामस्वरूप, पंचायत का गठन और नियमित अंतराल पर चुनाव राज्य सरकार की इच्छा पर निर्भर नहीं।
इस अधिनियम के उपबंधों को दो हिस्सों में बांटा जा सकता है- अनिवार्य और स्वैच्छिक। अधिनियम के अनिवार्य हिस्से को पंचायती राज व्यवस्था के गठन के लिए राज्य के कानून में शामिल किया जाना आवश्यक है। दूसरे भाग के स्वैच्छिक उपबंधों को राज्यों के स्व-विवेकानुसार सम्मिलित किया जा सकता है। अतः स्वैच्छिक प्रावधान राज्य को नई पंचायती राज पद्धति को अपनाते समय भौगोलिक, राजनीतिक एवं प्रशासनिक तथ्यों को ध्यान में रखकर अपनाने का अधिकार सुनिश्चित करता है।
यह अधिनियम देश में जमीनी स्तर पर लोकतांत्रिक संस्थाओं के विकास में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह प्रतिनिधित्व लोकतंत्र को 'भागीदारी लोकतंत्र' में बदलता है। यह देश में लोकतंत्र को जमीनी स्तर पर तैयार करने की एक क्रांतिकारी संकल्पना है।

प्रमुख विशेषताएं
इस अधिनियम की महत्वपूर्ण विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

ग्राम सभा : यह अधिनियम पंचायती राज के ग्राम सभा का प्रावधान करता है। इस निकाय में गांव स्तर पर गठित पंचायत क्षेत्र में निर्वाचक सूची में पंजीकृत व्यक्ति होते हैं। अतः यह पंचायत क्षेत्र में पंजीकृत मतदाताओं की एक ग्राम स्तरीय सभा है। यह उन शक्तियों का प्रयोग करेगी और ऐसे कार्य निष्पादित कर सकती है जो राज्य के विधानमंडल द्वारा निर्धारित किए गए हैं।

त्रिस्तरीय प्रणाली : इस अधिनियम में सभी राज्यों के लिए त्रिस्तरीय प्रणाली का प्रावधान किया गया है, अर्थात् ग्राम, माध्यमिक और जिला स्तर पर पंचायत। अतः यह अधिनियम पूरे देश में पंचायत राज की संरचना में समरूपता लाता है। फिर भी, ऐसा राज्य जिसकी जनसंख्या 20 लाख से ऊपर न हो, को माध्यमिक स्तर पर पंचायतें को गठन न करने की छूट देता है।

सदस्यों एवं अध्यक्ष का चुनाव : गांव, माध्यमिक तथा जिला स्तर पर पंचायतों के सभी सदस्य लोगों द्वारा सीधे चुने जाएंगे। इसके अलावा, माध्यमिक एवं जिला स्तर पर पंचायत के अध्यक्ष का चुनाव निर्वाचित सदस्यों द्वारा उन्हीं में से अप्रत्यक्ष रूप से होगा, जबकि गांव स्तर पर पंचायत के अध्यक्ष का चुनाव राज्य के विधानमंडल द्वारा निर्धारित तरीके से किया जाएगा।

सीटों का आरक्षण : यह अधिनियम प्रत्येक पंचायत में (सभी तीन स्तरों पर) अनुसूचित जाति एवं जनजाति को उनकी संख्या के कुल जनसंख्या के अनुपात में सीटों पर आरक्षण उपलब्ध कराता है। राज्य विधानमंडल गांव या अन्य स्तर पर पंचायतों में अनुसचिन एवं जनजाति के लिए अध्यक्ष के पद के लिए आरक्षण भी करेगा।

इस अधिनियम में यह व्यवस्था की गई है कि आरक्षण मसले पर महिलाओं के लिए उपलब्ध कुल सीटों की संख्या (का वह संख्या भी शामिल है, जिसके तहत अनुसूचित जाति एवं जनजाति की महिलाओं को आरक्षण दिया जाता है) एक-तिहाई से कम हो। इसके अतिरिक्त पंचायतों में अध्यक्ष व अन्य पदों के लिए का स्तर पर महिलाओं के लिए आरक्षण एक-तिहाई से कम नहीं होगा
यह अधिनियम विधानमंडल को इसके लिए भी अधिकृत करता है कि वह पंचायत अध्यक्ष के कार्यालय में पिछड़े वर्गों के लिए किसी भी स्तर पर आरक्षण की व्यवस्था करे।

पंचायतों का कार्यकाल

73वां अधिनियम यह अधिनियम सभी स्तरों पर पंचायतों का कार्यकाल पांच वर्ष के लिए निश्चित करता है। तथापि, समय पूरा होने से पूर्व भी उसे विघटित किया जा सकता है। इसके बाद पंचायत गठन के लिए नए चुनाव होंगे।
  • (अ) इसकी 5 वर्ष की अवधि खत्म होने से पूर्व या
  • (ब) विघटित होने की दशा में इसके विघटित होने की तिथि से 6 माह खत्म होने की अवधि के अंदर।
परंतु जहाँ शेष अवधि (जिसमें भंग पंचायत काम करते रहती है) छह माह से कम है, वहाँ इस अवधि के लिए नई पंचायत का चुनाव आवश्यक नहीं होगा।
यह भी है कि एक भंग पंचायत के स्थान पर गठित पंचायत जो भंग पंचायत की शेष अवधि के लिए गठित की गई है। वह भंग पंचायत की शेष अवधि तक ही कार्यरत रहेगी। दूसरे शब्दों में, एक पंचायत जो समय-पूर्व भंग होने पर पुनर्गठित हुई है, वह पूरे पाँच वर्ष की निर्धारित अवधि तक कार्यरत नहीं होती, बल्कि केवल बचे हुए समय के लिए ही कार्यरत होती है।

अनर्हताएं
कोई भी व्यक्ति पंचायत का सदस्य नहीं बन पाएगा यदि वह निम्न प्रकार से अनर्ह होगा।
(अ) राज्य विधानमंडल के लिए निर्वाचित होने के उद्देश्य से संबंधित राज्य में उस समय प्रभावी कानून के अंतर्गत, अथवा
(ब) राज्य विधानमंडल द्वारा बनाए गए किसी भी कानून के अंतर्गत लेकिन किसी भी व्यक्ति को इस बात पर अयोग्य घोषित नहीं किया जाएगा कि वे 25 वर्ष से कम आयु का है, यदि वह 21 वर्ष की आयु पूरा कर चुका है। अयोग्यता संबंधित सभी प्रश्न, राज्य विधान द्वारा निर्धारित प्राधिकारी को संदर्भित किए जाएंगे।

राज्य निर्वाचन
चुनावी प्रक्रियाओं की तैयारी की देख-रेख, निर्देशन, मतदाता सूचि तैयार करने पर नियंत्रण और पंचायतों के सभी चुनावों को संपन्न करने की शक्ति राज्य निर्वाचन आयोग में निहित होगी, इसमें राज्यपाल द्वारा नियुक्त राज्य चुनाव आयुक्त सम्मिलित है। उसकी सेवा शर्ते और पदावधि भी राज्यपाल द्वारा निर्धारित की जाएंगी। इसे राज्य के उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने लिए निर्धारित तरीके के अलावा अन्य किसी तरीके से नहीं हटाया जायेगा, उसकी नियुक्ति के बाद उसकी सेवा शर्तों में ऐसा कोई परिवर्तन नहीं किया जाएगा जिससे उसका नुकसान हो।
पंचायतों के चुनाव संबंधित सभी मामलों पर राज्य विधान कोई भी उपबंध बना सकता है।

शक्तियां और कार्य
राज्य विधानमंडल पंचायतों को आवश्यकतानुसार ऐसी शक्तियां और अधिकार दे सकता है, जिससे की वह स्वशासन संस्थाओं के रूप में कार्य करने में सक्षम हों इस तरह की योजना में उपयुक्त स्तर पर पंचायतों के अंतर्गत शक्तियां और जिम्मेदारियां प्रत्यापित की जाएं जो निम्नलिखित से संबंधित हैं:
(अ) आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय के कार्यक्रमों को तैयार करने से।
(ब) आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय के सौंपे जाएं कार्यक्रमों को कार्यान्वित करना जिसमें 11वीं अनुसूची के 29 मामलों के सूत्र भी सम्मिलित हैं।

वित्त : राज्य विधानमंडल निम्न अधिकार रखता है:-
  • (अ) पंचायत को उपयुक्त कर, चुंगी, शुल्क लगाने और उनके संग्रहण के लिए प्राधिकृत कर सकता है।
  • (ब) राज्य विधानमंडल राज्य सरकार द्वारा आरोपित और संगृहीत करो, चुंगी, मार्ग कर और शुल्क पंचायतों को सौंपे जा सकते हैं।
  • (स) राज्य की समेकित निधि से पंचायतों को अनुदान सहातया देने के लिए उपबंध करता है।
  • (द) निधियों के गठन का उपबंध करेगा जिसमें पंचायतों को दिया गया सारा धन जमा होगा।

वित्त आयोग : राज्य का राज्यपाल प्रत्येक 5 वर्ष के पश्चात पंचायतों की वित्तीय स्थिति की समीक्षा के लिए वित्त आयोग का गठन करेगा। यह आयोग राज्यपाल को निम्न सिफारिशें करेगा:

1. सिद्धांत जो नियंत्रित करेंगे
(अ) राज्य सरकार द्वारा लगाए गए कुल करों, चुंगी, मार्ग कर एवं एकत्रित शुल्कों का राज्य और पंचायतों के बंटवारा।
(ब) करों, चुंगी, मार्गकर और शुल्कों का निर्धारण जो पंचायतों को सौंपे गए हैं।
(स) राज्य की समेकित निधि कोष से पंचायतों को दी जाने वाली अनुदान सहायता।

2. पंचायतों की वित्तीय स्थिति के सुधार के लिए आवश्यक उपाय।

3. राज्यपाल द्वारा आयोग को सौंपा जाने वाला कोई भी मामला जो पंचायतों के मजबूत वित्त के लिए हो।

राज्य विधानमंडल आयोग की बनावट, इसके सदस्यों की आवश्यक अर्हता तथा उनके चुनने के तरीके को निर्धारित कर सकता है।
राज्यपाल आयोग द्वारा की गई सिफारिशों को की गई कार्यवाही रिपोर्ट के साथ राज्य विधानमंडल के समक्ष प्रस्तुत करेगा।
केंद्रीय वित्त आयोग भी राज्य में पंचायतों के पूरक स्रोतों में वृद्धि के लिए राज्य की समेकित विधि आवश्यक उपायों के बारे में सलाह देगा। (राज्य वित्त आयोग द्वारा दी गई सिफारिशों के आधार पर)।

लेखा परीक्षण : राज्य विधान मंडल पंचायतों के खातों (accounts) की देखरेख और उनके परीक्षण के लिए प्रावधान बना सकता है।

संघ राज्य क्षेत्रों पर लागू होना : भारत का राष्ट्रपति किसी भी संघ राज्यक्षेत्र अपवादों अथवा संशोधनों के साथ लागू करने के लिए निर्देश दे सकता है।

छूट प्राप्त राज्य व क्षेत्र : यह कानून जम्मू-कश्मीर, नागालैंड, मेघालय, मिजोरम और कुछ अन्य विशेष क्षेत्रों पर लागू नहीं होता।
इन क्षेत्रों के अंतर्गत
  • (अ) उन राज्यों के अनुसूचित आदिवासी और क्षेत्रों में
  • (ब) मणिपुर के उन पहाड़ी क्षेत्रों में जहां जिला परिषद अस्तित्व में हो।
  • (स) पं. बंगाल को दार्जिलिंग जिला जहां पर दार्जिलिंग गोरखा हिल, परिषद अस्तित्व में है।
हालांकि, संसद चाहे तो इस अधिनियम को ऐसे अपवादों और संशोधनों के साथ अनुसूचित क्षेत्रों एवं जनजाति क्षेत्रों में लागू कर सकती है, जो वह उचित समझे।

वर्तमान कानून की निरंतरता एवं पंचायतों का अस्तित्व : पंचायतों से संबंधित राज्य के सभी कानून प्रभावी रूप से इस अधिनियम के आरंभ होने से 1 वर्ष की अवधि खत्म होने तक लागू रहेंगे। दूसरे शब्दों में, कोई भी राज्य नए पंचायती राज कार्यक्रम को 24 अप्रैल, 1993 के बाद अधिकतम 1 वर्ष की अवधि के अंदर अपनाए जो कि इस अधिनियम के शुरुआत की तारीख है। फिर भी यह कानून लागू होने से पूर्व बनी पंचायत अपनी अवधि खत्म होने तक कार्यकाल पूरा कर सकती है यदि वह राज्य विधान उससे पूर्व शीघ्र ही विघटित न कर दी जाएं।
इसके परिणामस्वरूप 73वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 के अनुसार नई व्यवस्था अपनाने के लिए अधिकांश राज्यों ने 1993 एवं 1994 पंचायती राज अधिनियम पारित किए।

चुनावी मामलों में न्यायालय के हस्तक्षेप पर रोक : यह अधिनियम पंचायत के चुनावी मामलों में न्यायालय के हस्तक्षेप पर रोक लगाता है। इसमें कहा गया है कि निर्वाचन क्षेत्र और इन निर्वाचन क्षेत्र में सीटों के आवंटन संबंधी मुद्दों को न्यायालय के समक्ष पेश नहीं किया जा सकता। इसमें यह भी कहा गया है कि किसी भी पंचायत के चुनावों को राज्य विधानमंडल द्वारा निर्धारित प्राधिकारी अथवा तरीके के अलावा चुनौती नहीं दी जाएगी।

11वीं अनुसूची : इसमें पंचायतों के कानून क्षेत्र के साथ 29 प्रकार्यात्मक विषय-वस्तु समाहित हैं:
  • कृषि जिसमें कृषि विस्तार सम्मिलित है।
  • भूमि विकास, भूमि सुधार लागू करना, भूमि संगठन एवं भूमि संरक्षण।
  • लघु सिंचाई, जल प्रबंधन और नदियों के मध्य भूमि विकास।
  • पशुपालन, दुग्ध व्यवसाय तथा मत्स्यपालन।
  • मत्स्य उद्योग।
  • वन-जीवन तथा कृषि खेती (वनों में)।
  • लघु वन उत्पत्ति।
  • लघु उद्योग, जिसमें खाद्य उद्योग सम्मिलित है।
  • खादी, ग्राम एवं कुटीर उद्योग।
  • ग्रामीण विकास।
  • पीने वाला पानी।
  • ईंधन तथा पशु चारा।
  • सड़कें, पुलों, तटों, जलमार्ग तथा अन्य संचार के साधन।
  • ग्रामीण विघुत जिसमें विघुत विभाजन समाहित है।
  • गैर-परंपरागत ऊर्जा स्रोत।
  • गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम।
  • प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा संबंधी विघालय।
  • यांत्रिक प्रशिक्षण एवं व्यावसायिक शिक्षा।
  • वयस्क एवं गैर-वयस्क औपचारिक शिक्षा।
  • पुस्तकालय।
  • सांस्कृतिक कार्य।
  • बाजार एवं मेले।
  • स्वास्थ्य एवं स्वास्थ्य संबंधी संस्थाएं जिनमें अस्पताल प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तथा दवाखाने शामिल हैं।
  • पारिवारिक समृद्धि।
  • महिला एवं बाल विकास।
  • सामाजिक समृद्धि जिसमें विकलांग व मानसिक रोगी की समृद्धि निहित है।
  • कमजोर वर्ग की समृद्धि जिसमें विशेषकर अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति वर्ग शामिल हैं।
  • लोक विभाजन पद्धति।
  • सार्वजनिक संपत्ति की देखरेख।

अनिवार्य एवं स्वैच्छिक प्रावधान
अब, हम संविधान के भाग 11 या 73वें संविधान संशोधन अधिनियम के अनिवार्य (बाध्यकारी) एवं स्वैच्छिक (विवेकाधीन या वैकल्पिक) उपबंधों प्रावधानों का पृथक्-पृथक् विवेचन करेंगे:

अ. अनिवार्य प्रावधान
  • एक गांव या गांवों के समूह में ग्राम सभा का गठन।
  • गांव स्तर पर पंचायतों, माध्यमिक स्तर एवं जिला स्तर पर पंचायतों की स्थापना।
  • तीनों स्तरों पर सभी सीटों के लिये प्रत्यक्ष चुनाव।
  • माध्यमिक और जिला स्तर के प्रमुखों के लिये अप्रत्यक्ष चुनाव।.
  • पंचायतों में चुनाव लड़ने के लिये न्यूनतम आयु 21 वर्ष होनी चाहिये।
  • सभी स्तरों पर अनुसूचित जाति एवं जनजातियों (सदस्य एवं प्रमुख दोनों के लिये) के लिये आरक्षण।
  • सभी स्तरों पर (सदस्य एवं प्रमुख दोनों के लिये) एक तिहाई पद महिलाओं के लिये आरक्षित।
  • पंचायतों के साथ ही मध्यवर्ती एवं जिला निकायों का कार्यकाल पांच वर्ष होना चाहिये तथा किसी पंचायत का कार्यकाल समाप्त होने के छह माह की अवधि के भीतर नये चुनाव हो जाने चाहिये।
  • पंचायती राज संस्थानों में चुनाव कराने के लिये राज्य निर्वाचन आयोग की स्थापना।
  • पंचायतों की वित्तीय स्थिति का समीक्षा करने के लिये प्रत्येक पांच वर्ष बाद एक राज्य वित्त आयोग की स्थापना की जानी चाहिये।

स्वैच्छिक प्रावधान
  • विधानसभाओं एवं संसदीय के निर्वाचन क्षेत्र विशेष के अंतर्गत आने वाली सभी पंचायती राज संस्थाओं में संसद और विधानमण्डल (दोनों सदन) के प्रतिनिधियों को शामिल किया जाना।
  • पंचायत के किसी भी स्तर पर पिछड़े वर्ग के लिये (सदस्य एवं प्रमुख दोनों के लिये) स्थानों का आरक्षण।
  • पंचायतें स्थानीय सरकार के रूप में कार्य कर सकें. इस हेतु उन्हें अधिकार एवं शक्तियां देना (संक्षेप में, इन्हें स्वायत्त निकाय बनाने के लिये)।
  • पंचायतों को सामाजिक न्याय एवं आर्थिक विकास के लिये योजनाएं तैयार करने के लिए शक्तियों और दायित्वों का प्रत्यायन और संविधान की ग्यारहवीं अनुसूची के 29 कार्यों में से सभी अथवा कुछ को संपन्न करना।
  • पंचायतों को वित्तीय अधिकार देना, अर्थात् उन्हें उचित कर, पथकर और शुल्क आदि के आरोपण और संग्रहण के लिए प्राधिकृत करना।

1996 का पेसा अधिनियम (विस्तार अधिनियम)
1996 का पेसा (विस्तार अधिनियम) पंचायतों से संबंधित संविधान का भाग-9 पाँचवीं अनुसूची में वर्णित क्षेत्रों पर लागू नहीं होता। हालाँकि संसद इन प्रावधानों को कुछ अपवादों तथा संशोधनों सहित उक्त क्षेत्रों पर लागू कर सकती है। इस प्रावधान के अंतर्गत संसद ने पंचायत के प्रावधान (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तारित) अधिनियम 1996 पारित किया, जिसे पेसा एक्ट अथवा विस्तार अधिनियम कहा जाता है।
वर्तमान (2016) में दस राज्यों में पाँचवीं अनुसूची क्षेत्र आते हैं- आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, छत्तीसगढ़, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा और राजस्थान। इन दस राज्यों में अपने पंचायती राज अधिनियमों में संशोधन कर अपेक्षित अनुपालन कानून अधिनियमित किए हैं।

अधिनियम के उद्देश्य
पेसा अधिनियम के उद्देश्य निम्नलिखित हैं :
  • संविधान के भाग 9 के पंचायतों से जुड़े प्रावधानों को जरूरी संशोधनों के साथ अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तारित करना।
  • जनजातीय जनसंख्या को स्वशासन प्रदान करना।
  • सहयात्री लोकतंत्र के तहत ग्राम प्रशासन स्थापित करना तथा ग्राम सभा को सभी गतिविधियों का केन्द्र बनाना।
  • पारंपरिक परिपाटियों की सुसंगतता में उपयुक्त प्रशासनिक ढाँचा विकसित करना।
  • जनजातीय समुदायों की परम्पराओं एवं रिवाजों की सुरक्षा तथा संरक्षण करना।
  • जनजातीय लोगों की आवश्यकताओं के अनुरूप उपयुक्त स्तरों पर पंचायतों को विशिष्ट शक्तियों से युक्त करना।
  • उच्च स्तर पर पंचायतों को निचले स्तर की ग्राम सभा की शक्तियों एवं अधिकारों के छिनने से रोकना।

अधिनियम की विशेषताएँ
पेसा अधिनियम की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
1. अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायतों पर राज्य विधायन वहाँ के प्रथागत कानूनों, सामाजिक एवं धार्मिक प्रचलनों तथा सामुदायिक संसाधनों के पारंपरिक प्रबंधन परिपाटियों के अनुरूप होगा।

2. एक गाँव के अंतर्गत एक समुदाय का वास स्थल अथवा वास स्थलों का एक समूह अथवा एक टोला अथवा टोलों का समूह होगा, जहाँ वह समुदाय अपनी परंपराओं एवं रिवाजों के अनुसार अपना जीवनयापन कर रहा हो।

3. प्रत्येक गाँव में एक ग्राम सभा होगी जिसमें ऐसे लोग होंगे जिनके नाम ग्राम स्तर पर पंचायत के लिए निर्वाचक सूची में दर्ज हों।

4. प्रत्येक ग्राम सभा अपने लोगों की परंपराओं एवं प्रथाओं, उनकी सांस्कृतिक पहचान, सामुदायिक संसाधन तथा विवाद निवारण के परंपरागत तरीकों की सुरक्षा एवं संरक्षण के लिए सक्षम होगी।

5. प्रत्येक ग्राम सभाः
(i) सामाजिक एवं आर्थिक विकास के कार्यक्रमों एवं परियोजनाओं को स्वीकृति देगी, इसके पहले कि वे ग्राम स्तरीय पंचायत द्वारा कार्यान्वयन के लिए हाथ में लिए जाएँ।
(ii) गरीबी उन्मूलन एवं अन्य कार्यक्रमों के लाभार्थियों की पहचान के लिए जिम्मेदार होगी।

6. प्रत्येक पंचायत उपरोक्त योजनाओं, कार्यक्रमों एवं परियोजनाओं के लिए निधि में उपयोग संबंधी प्रमाण पत्र ग्राम सभा से प्राप्त करेगी।

7. प्रत्येक पंचायत में अनुसूचित क्षेत्रों में सीटों का आरक्षण उन समुदायों की जनसंख्या के अनुपात में होगा, जिनके लिए संविधान में भाग 9 में आरक्षण की व्यवस्था की गई है। हालाँकि अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षण कुल सीटों के आधे (one-halt) से कम नहीं होगा। इसके अतिरिक्त पंचायतों के हर स्तर पर अध्यक्षों की सभी सीटें अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित होंगी।

8. जिन अनुसूचित जनजातियों का प्रतिनिधित्व मध्यवर्ती स्तर की पंचायत या जिला स्तर की पंचायत में नहीं है उन्हें सरकार द्वारा नामित किया जाएगा। किन्तु नामित सदस्यों की संख्या पंचायत में निर्वाचित कुल सदस्यों की
संख्या के 1/10 वें भाग से अधिक नहीं होगी।

9. अनुसुचित क्षेत्रों में विकास परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण के पहले अथवा अनुसूचित क्षेत्रों में इन परियोजनाओं से प्रभावित व्यक्तियों के पुनर्स्थापन अथवा पुनर्वास के पहले ग्राम सभा अथवा उपयुक्त स्तर की पंचायत से सलाह की जाएगी। हालाँकि परियोजनाओं की आयोजना एवं कार्यान्वयन अनुसूचित क्षेत्रों में राज्य स्तर पर समन्वयीकृत किया जाएगा।

10. अधिसूचित क्षेत्रों में लघु जल स्रोतों के लिए आयोजना एवं प्रबंधन की जिम्मेदारी उपयुक्त स्तर के पंचायत को दी जाएगी।

11. अधिसूचित क्षेत्रों में छोटे स्तर पर खनिजों का खनन संबंधी लाइसेंस अथवा खनन पट्टा प्राप्त करने के लिए ग्राम सभा अथवा उपयुक्त स्तर की पंचायत की अनुशंसा प्राप्त करना अनिवार्य होगा।

12. छोटे स्तर पर खनिजों की नीलामी द्वारा दोहन के लिए रियायत प्राप्त करने के लिए ग्राम सभा अथवा उपयुक्त स्तर की पंचायत की पूर्व अनुशंसा अनिवार्य होगी।

13. जबकि अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायतों को स्वशासन की संस्थाओं के रूप में कार्य करने के लिए अधिभार सम्पन्न बनाया जा रहा है, राज्य विधायिका यह सुनिश्चित करेगी कि उपयुक्त स्तर पर पंचायत तथा ग्राम सभा कोः।
  • किसी नशीले पदार्थ की बिक्री अथवा उपयोग को रोकने अथवा नियमित करने अथवा प्रतिबंधित करने का अधिकार होगा।
  • छोटे स्तर पर वन उपज पर स्वामित्व होगा
  • अनुसूचित क्षेत्रों में भूमि से अलगाव को रोकने की शक्ति होगी। साथ ही किसी अनुसूचित जनजाति की गैर-कानूनी ढंग से बेदखली के पश्चात् वापस भूमि प्राप्त करने के लिए आवश्यक कार्रवाई का अधिकार होगा।
  • ग्रामीण हाट-बाजारों के प्रबंधन की शक्ति होगी।
  • अनुसूचित जनजातियों को पैसा उधार देने के मामले में नियंत्रण रखने की शक्ति होगी।
  • सभी सामाजिक क्षेत्रों में कार्यरत संस्थाओं एवं पदाधिकारियों पर नियंत्रण रखने की शक्ति होगी, तथा
  • स्थानीय आयोजनाओं तथा ऐसी आयोजनाओं, जिनमें जनजातीय उप-आयोजनाएँ शामिल हैं, पर नियंत्रण की शक्ति होगी।

14. राज्य विधायन के अन्तर्गत ऐसी व्यवस्था होगी जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि उच्च स्तर की पंचायतें निचले स्तर की किसी पंचायत या ग्राम सभा के अधिकारों का हनन अथवा उपयोग नहीं कर रही हैं।

15. अनुसूचित क्षेत्रों में जिला स्तर पर प्रशासकीय व्यवस्था बनाते समय राज्य विधायिका संविधान की छठी अनुसूची का अनुसरण करेगी।

16. अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायतों से संबंधित किसी कानून का कोई प्रावधान यदि इस अधिनियम की संगति में नहीं है तो वह राष्ट्रपति' द्वारा इस अधिनियम की स्वीकृति प्राप्त होने की तिथि के एक वर्ष की समाप्ति के पश्चात् लागू होने से रह जाएगा। हालाँकि उक्त तिथि के तत्काल पहले अस्तित्व में रहीं सभी पंचायतें अपने कार्यकाल की समाप्ति तक चलती रहेंगी बशर्ते कि उन्हें राज्य विधायिका द्वारा पहले ही भंग न कर दिया जाए।

क्षेत्र पंचायत अथवा पंचायत समिति
प्रशासनिक विकेन्द्रीकरण में जिस तरह ग्राम पंचायत को पहली इकाई माना गया, उसी तरह क्षेत्र पंचायत को दुसरी इकाई का दर्जा दिया गया। एक क्षेत्र पंचायत में कई ग्राम पंचायतों को शामिल किया गया। क्षेत्र पंचायत स्तर पर नियुक्त ब्लॉक विकास अधिकारी को बतौर नोडल अधिकारी जिम्मेदारी दी गई। यहां लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत प्रमुख अथवा प्रधान का चुनाव कराया जाता है। इसके लिए क्षेत्र पंचायतों को विभिन्न वाडौं के रूप में बांटा दिया जाता है। क्षेत्र पंचायत के प्रमुख का चुनाव प्रत्यक्ष मतदान द्वारा नहीं बल्कि अप्रत्यक्ष मतदान द्वारा किया जाता है। इसके तहत विभिन्न वार्डों से चुने गए सदस्य ही प्रमुख अथवा प्रधान का चुनाव करते हैं। ग्राम पंचायत की तरह ही क्षेत्र पंचायत में भी विभिन्न समितियां बनी हुई हैं। क्षेत्र पंचायत ग्राम पंचायतों को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

जिला पंचायत अथवा जिला परिषद
जिला पंचायत यानी जिला परिषद का गठन अधीनस्थ पंचायतों पर नियंत्रण तथा उनके कार्यों में समन्वय स्थापित करने के उद्देश्य से किया जाता है। जिला पंचायत या परिषद अधीनस्थ पंचायतों तथा राज्य सरकार के बीच कड़ी का कार्य करती है। इस प्रदेश । में लागू त्रि-स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था की यह सर्वोच्च कड़ी होती है। इसका नोडल अधिकारी जिला विकास अधिकारी एवं अधिशासी अधिकारी होता है। जनप्रतिनिधि के तौर पर पूरे जिले को विभिन्न वार्डों में बांट दिया जाता है। हर वार्ड से सदस्य चुने जाते हैं जो जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव करते हैं। एक उपाध्यक्ष भी चुना जाता है। यहां भी विभिन्न तरह की समितियां गठित की जाती हैं, जो कार्यों की निगरानी करती हैं। परिषद का अध्यक्ष जिला परिषद की बैठक आयोजित करता है तथा उसकी अध्यक्षता करता है। यह उसकी वित्त विधि पर निर्भर करता है। साथ ही जिला परिषद की गतिविधियों तथा कार्यकलापों पर भी नियंत्रण रखता है। सही अर्थों में जिला परिषद एक समन्वय एवं पर्यवेक्षण करने वाला निकाय है।

पंचायती राज संस्थाओं के कार्य

पंचायती राज संस्थाएं वे सब कार्य करती हैं जिन्हें राज्य कानूनों में पंचायती राज के लिए निर्धारित किया गया है। सामान्य रूप से उसके कार्य निम्नलिखित हैं:

(i) ग्राम पंचायत के कार्य
कुछ राज्य ग्राम पंचायत के अनिवार्य और ऐच्छिक कार्यों में भेद करते हैं जबकि अन्य राज्य ऐसा नहीं करते। सफाई, सार्वजनिक सड़कों की सफाई, सार्वजनिक कुओं का निर्माण, गलियों में प्रकाश की व्यवस्था, सामाजिक स्वास्थ्य तथा प्राथमिक और प्रौढ़ शिक्षा इत्यादि से संबंधित नागरिक कार्य ग्राम पंचायतों के अनिवार्य कार्य हैं। ऐच्छिक कार्य पंचायतों के संसाधनों पर निर्भर करते हैं। वे ऐसे कार्य कर अथवा नहीं भी कर सकते जैसे सड़कों के दोनों दोनों ओर वृक्ष लगवाना, पशु प्रजनन केन्द्र स्थापित करना, बाल और प्रसूति कल्याण केन्द्र स्थापित करना, कृषि को बढ़ावा देना, इत्यादि।
73वें संशोधन के बाद ग्राम पंचायत के कार्यों का क्षेत्र विस्तृत हुआ है। पंचायत क्षेत्र की वार्षिक विकास योजनाएं बनाना, वार्षिक बजट, प्राकृतिक आपदाओं में राहत कार्य, सार्वजनिक स्थलों पर अतिक्रमण हटाना, गरीबी हटाने के कार्यक्रमों को लागू करना एवं देख-रेख करने जैसे कार्य अब पंचायतों द्वारा किए जाने की आशा की जाती है। ग्राम सभा के माध्यम से लाभान्वित होने वालों का चयन, सार्वजनिक वितरण प्रणाली, गैर पारम्परिक ऊर्जा स्रोत, परिष्कृत चूल्हे, बायो-गैस प्लान्ट्स भी कुछ राज्यों में ग्राम पंचायतों को सौंप दिए गए हैं।

(ii) पंचायत समिति के कार्य
पंचायत समितियां विकास कार्यों का केन्द्र हैं। ब्लॉक विकास अधिकारी उनके शीर्ष पद पर होता है। कृषि, भूमि सुधार, पानी के संग्रहण का विकास, तकनीकी और व्यावसायिक शिक्षा इत्यादि जैसे कार्य इनको सौंपे गए हैं। दूसरे प्रकार के कार्यों का संबंध कुछ विशिष्ट योजनाओं को लागू करने से है जिनके लिए धनराशि निश्चित होती है। इसका अर्थ है कि पंचायत समिति को निश्चित परियोजनाओं पर पैसा खर्च करना होता है। स्थान अथवा लाभभोगियों को चुनने का अधिकार पंचायत समिति के पास उपलब्ध है।

(iii) जिला परिषद के कार्य
जिला परिषद जिले की पंचायत समितियों को जोड़ती है। यह उनकी गतिविधियों के साथ ताल मेल करती है और उनकी कार्य प्रणाली का निरीक्षण करती है। यह जिला की योजनाएं बनाती है और राज्य सरकार को प्रस्तुत करने के लिए समिति की योजनाओं का जिला योजनाओं में समाकलन करती है। जिला परिषद पूरे जिले के विकास कार्यों की देखभाल करती है। यह कृषि उत्पादन को बढ़ाने, भू जल संसाधनों के दोहन, ग्रामीण विद्युतीकरण को बढ़ाने तथा वितरण और रोजगार प्रदान करने वाली गतिविधियों को शुरू करने, सड़कें बनाने तथा अन्य सार्वजनिक कार्यों को अपने हाथ में लेती है। यह प्राकृतिक आपदाओं एवं अभाव के दौरान राहत कार्य जैसे कल्याणकारी कार्य, अनाथालयों और निर्धन गृह, रैन बसेरे, महिलाओं और बच्चों के कल्याण, इत्यादि के कार्य भी करती है।
इसके साथ ही जिला परिषद केन्द्र और राज्य सरकारों द्वारा प्रायोजित कार्यक्रमों के अंतर्गत दिए गए कार्यों
को भी करती है। उदाहरण के लिए जवाहर रोजगार योजना केन्द्र द्वारा प्रायोजित एक बड़ी योजना है जिसके लिए पैसा सीधे दिया जाता है। इसका उद्देश्य रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना है।

पंचायती राज के वित्तीय स्त्रोत

भारत के द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2005-2009) ने पंचायती राज संस्थाओं के वित्तीय स्रोतों तथा उनकी वित्तीय शक्तियों को निम्नांकित रूप में संक्षेपित किया है

1. संविधान के चौथे खंड का बड़ा हिस्सा पंचायती राज संस्थाओं के संरचनात्मक सशक्तीकरण के बारे में है। लेकिन स्वायत्तता तथा अपने ऊपर निर्भर संस्थाओं की कार्यकुशलता उनकी वित्तीय स्थिति पर निर्भर करती है। उनके अपने संसाधन जुटाने की क्षमता पर भी निर्भर करती है। साधारणतः हमारे देश में पंचायतें निम्नलिखित तरीकों में राजस्व एकत्र करती है-
  • संविधान की धारा 280 के आधार पर केंद्रीय वित्त आयोग की अनुशंसाओं के अनुसार केंद्र सरकार से प्राप्त अनुदान।
  • संविधान धारा 243-1 के अनुसार राज्य वित्त आयोग की अनुशंसाओं के आधार पर राज्य सरकार से प्राप्त अनुदान।
  • राज्य सरकार से प्राप्त कर्ज/अनुदान
  • केंद्र द्वारा प्रायोजित योजनाओं तथा अतिरिक्त केंद्रीय मदद के नाम पर कार्यक्रम-केंद्रित आवंटन
  • आंतरिक (स्थानीय स्तर) पर संसाधन निर्माण (कर तथा गैर-कर)।

2. देशभर में राज्यों ने पंचायतों के वित्तीय सशक्तीकरण पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया है। पंचायतों के अपने संसाधन अत्यल्प है। करेल, कर्नाटक तथा तमिलनाडु वे राज्य हैं जिन्हें पंचायत सशक्तीकरण के मामले में अग्रणी समझा जाता है लेकिन वहाँ भी पंचायतें सरकारी अनुदान पर अत्यधिक निर्भर हैं। इनके बारे में कोई निम्नलिखित निष्कर्ष निकाल सकता है-
  • पंचायतें आंतरिक संसाधन जुटाने में कमजोर हैं। यह एक हद तक एक क्षीण कर (domain) के कारण तो है ही, लेकिन यह पंचायतों के कर-संग्रहण में
  • पंचायतें अनुदान के लिए केंद्र तथा राज्य सरकारों पर अत्यधिक निर्भर हैं।
  • केंद्र और राज्य सरकारों से प्राप्त अनुदानों का बहुलांश विशेष योजना पर केंद्रित है। पंचायत को सीमित अधिकार है। व्यय के मामले में भी उन्हें सीमित अधिकार हैं।
  • राज्यों की गंभीर वित्तीय स्थिति के कारण राज्य सरकारों को पंचायतों को वित्त आवंटित करने में अनिच्छा हो रही है।
  • ग्यारहवीं अनुसूची के अहम विषयों प्राथमिक शिक्षा स्वास्थ्य सेवा, जलापूर्ति, स्वच्छता तथा लघु सिंचाई आदि से संबंधित योजनाओं तथा उन पर होने वाले व्यय पर आज भी राज्य सरकारें ही सीधे-सीधे जिम्मेदार हैं।
  • कुल मिलाकर, स्थिति यह है कि पंचायतों के पास जिम्मेदारी बहुत है पर संसाधन बेहद कम।

3. हालांकि केंद्र/राज्य सरकारों द्वारा हस्तांतरित वित्त पंचायत को प्राप्त होने वाली राशि का महत्वपूर्ण हिस्सा, होता है, परंतु पंचायती राज संस्थाओं द्वारा स्वयं द्वारा संगृहीत संसाधन उनके वित्तीय आधार का मूल है। प्रश्न केवल संसाधनों का नहीं है, स्थानीय कर व्यवस्था की मौजूदगी इस चुनी गई संस्था में जन-भागीदारी सुनिश्चित करती है। इससे पंचायती राज संस्था नागरिकों के प्रति जवाबदेह बनती है।

4. अपने संसाधनों के संग्रहण के मामले में, ग्राम पंचायतें तुलनात्मक रूप से बेहतर स्थिति में हैं क्योंकि उनकी अपनी भी कर व्यवस्था है। जबकि पंचायती राज के दो अन्य स्तर अपने संसाधन जुटाने के मामले में पूरी तरह से टोल करों, फीस तथा गैर-कर राजस्व पर निर्भर है।

5. राज्य पंचायती राज अधिनियम ने ग्राम पंचायतों को अधिकांश कराधान के अधिकार दे रखे हैं। माध्यमिक तथा जिला पंचायतों की कर-व्यवस्था (कर तथा गैर-कर, दोनों) काफी लघु रखी गई है जो कि द्वितीयक क्षेत्रों में जैसे कि (ferry services), बाजार, जल तथा संरक्षण सेवाएँ, वाहनों का पंजीकरण, स्टैंप, ड्यूटी पर (cess) तथा अन्य तक सीमित होते हैं।

6. कई राज्यों के विधायनों के अध्ययन से संकेत मिलता है कि कई तरह के कर, शुल्क मार्गकर तथा फीस ग्राम पंचायत के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। इनमें अन्य चीजों के अलावा चुंगी, संपत्ति/आवास कर, पेशाकार, भूमि करके, वाहनों पर लगने वाले कर/मार्गकर, मनोरंजन कर/पीस, लाइसेन्स फीस गैर-कृषि भूमि पर कर, मवेशी पंजीकरण फीस, स्वच्छता/जल-निवास/संरक्षण कर दे, जल कर, प्रकाश कर, शिक्षा शुल्क तथा मेलों, त्योहारों पर कर आते हैं।

पंचायतों की आय के स्रोत

पंचायतें अपना काम तभी प्रभावशाली ढंग से कर सकती हैं जब उनके पास पर्याप्त वित्तीय संसाधन हों। संसाधनों के लिए पंचायतें मुख्यतः राज्य सरकार के अनुदान पर निर्भर करती हैं। उनके पास कर लगाने की शक्ति भी होती है और अपनी अथवा निहित सम्पति से भी कुछ आय होती है। राज्य सरकार द्वारा लगाए गए एवं एकत्रित किए गए टैक्सों, शुल्कों और प्रवेश कर में से उन्हें हिस्सा मिल सकता है। आइये, हम अब देखें कि पंचायतों के पास अपने कार्य करने के लिए क्या संसाधन उपलब्ध हैं।

ग्राम पंचायत
अधिकांश राज्यों में टैक्स लगाने की शक्ति ग्राम पंचायतों के पास है। गृह कर, पशुओं एवं अचल सम्पत्ति पर कर, व्यवसायिक फसलें, पानी निकासी पर टैक्स, गांव में बेचे गए उत्पाद पर कर, घरों में दिए गए पानी पर कर, प्रकाश उपलब्ध कराने पर कर तथा पंचायत द्वारा लगाए गए कुछ शुल्क पंचायत द्वारा लगाए गए कर हैं। पंचायतें अस्थायी रूप से लगे थियेटर पर मनोरंजन कर, पशुओं पर तथा किराये के लिए चलाए जाने वाले गैर यांत्रिक वाहनों पर भी टैक्स लगा सकती हैं। ग्राम पंचायतों को उनकी सम्पति जैसे मैदान, चारागाह, जंगलों इत्यादि से भी आय के रूप में कोष प्राप्त होता है। गोबर, कूड़ा और जानवरों के मृत शरीरों को बेचने से भी ग्राम पंचायत को आय होती है। वे राज्य के भू-राजस्व में भी अपना हिस्सा प्राप्त करते हैं।

पंचायत समिति
पंचायत समिति अपने द्वारा प्रदान की गई सुविधाओं पर टैक्स लगा सकती है जैसे पेय जल अथवा सिंचाई के लिए दिए गए पानी, प्रकाश प्रबंधों, अपने प्रबंध में रखे गए पुलों, इत्यादि पर। पंचायत समिति की सम्पति में सार्वजनिक भवन, अपने कोष से निर्मित और रख-रखाव वाली सार्वजनिक सड़कें और सारी भूमि अथवा सरकार द्वारा स्थानान्तरित अन्य सम्पति सम्मिलित होती हैं। पंचायतें अपनी सम्पत्ति से आय प्राप्त करती हैं। वे राज्य सरकार से अनुदान भी प्राप्त करती हैं। जिला पंचायतें और राज्य सरकारें भी मध्यवर्ती स्तरों द्वारा लागू होने वाली योजनाओं के लिए पैसा स्थानान्तरित करती हैं।
टोल टैक्स उनसे लिया जाता है जो किसी सुविधा का प्रयोग करते हैं। इसलिए किसी पुल पर से गुजरने वालों से एक नाममात्र की राशि पुल के टोल टैक्स के रूप में ली जा सकती है।

जिला परिषद्
जिला परिषद् भी टैक्स लगाने का अधिकार रखती है। वे छह मास से ग्रामीण क्षेत्रों में कारोबार करने वालों पर, दलालों पर, उनके द्वारा स्थापित मार्किट में आढ़त करने वालों पर तथा इस मार्किट में सामान की बिक्री पर टैक्स लगा सकती है। जिला परिषद भू-राजस्व पर भी टैक्स लगा सकती है। जब कोई विकास योजना उसे सौंपी जाती है तो आवश्यक कोष भी प्रदान किया जाता है। वे राज्य सरकार से अनुदान भी प्राप्त करती हैं, धमार्थ संस्थाओं से दान प्राप्त कर सकती हैं और ऋण भी ले सकती हैं।

अप्रभावी निष्पादन के कारण
तिहत्तरवें विधेयक (1992) के जरिये संवैधानिक स्थिति तथा सुरक्षा प्रदान करने के बावजूद पंचायती राज संस्थाओं का काम संतोषजनक और आशानुकूल नहीं रहा।
इस निम्नस्तरीय निष्पादन के कारण ये हैं।
  • पर्याप्त हस्तांतरण का अभाव : अधिकतर राज्यों ने कार्य, फंड तथा कार्यकारियों के हस्तारण के पर्याप्त उपाय नहीं किये हैं ताकि पंचायती राज संस्थाएँ अपनी संविधान निर्धारित प्रकार्य संपन्न कर सकें। आगे यह जरूरी हैं कि पंचायतों के पास अपनी जिम्मेदारियों का पूरा करने लायक संसाधन हों। जहाँ एक ओर राज्य वित्त आयोगों ने अपनी अनुशंसाएँ भेज दी हैं। वहीं दूसरी ओर बहुत कम ही राज्यों ने पंचायती राज संस्थाओं की वित्तीय व्यवहार्यता को सुनिश्चित करने के कदम उठाए।
  • नौकरशाही का अत्यधिक नियंत्रण : कुछ राज्यों में ग्राम पंचायतों को अधीनस्थ स्थान दे दिया गया हो इसलिए ग्राम पंचायत के सरपंचों को आश्चर्यजनक रूप में अधिक समय प्रखंड कार्यालयों में फंड और/या तकनीकी अनुमोदन के लिए जाना पड़ता है। प्रखंड कार्यालय के कर्मचारियों के साथ काम करने से चुने गए प्रतिनिधि के रूप में सरपंचों की भूमिका पर आँच आती है।
  • फंडों की प्रकृति : इसके दो निहितार्थ हैं। कुछ परियोजनाओं के अंतर्गत निर्धारित गतिविधियाँ या कार्य जिले के सभी हिस्सों के लिए अनुकूल नहीं हैं। इसका नतीजा होता है गैर-जरूरी कार्यान्वयन या निधि राशि का अधूरा व्यय। सरकारी निधि पर अत्यधिक निर्भरता : प्राप्त निधि तथा स्व-संगृहीत निधि की समीक्षा से देखा गया है कि पंचायतें सरकारी निधि व्यवस्था पर लगभग पूरी तरह निर्भर हैं। जब पंचायतें संसाधन स्वयं संगृहीत नहीं करतीं, आत्मनिर्भर नहीं होतीं और बाहर से निधि प्राप्त करती हैं तो जनता निधि व्यय के सामाजिक अंकेक्षण के लिए नहीं करेगी।
  • वित्तीय अधिकारों के प्रयोग की अनिच्छा : एक महत्वपूर्ण शक्ति जो ग्राम पंचायतों को हस्तांतरित की गई है, वह है-संपत्ति पर कर लगाने की शक्ति, व्यापार, बाजार, मेला और अन्य उपलब्ध सेवाओं के लिए भी कराधान, जैसे सड़कों पर प्रकाश- व्यवस्था, सार्वजनिक शौचालयों की व्यवस्था। बहुत कम ही पंचायतें कर लगाने तथा वसूलने के अपने वित्तीय अधिकारों का प्रयोग करती हैं। पंचायतें यह तर्क पेश करती हैं कि जब आप खुद लोगों की बीच रहते है। तो उनसे कर वसूलना कठिन काम है।
  • ग्राम सभा की स्थिति : ग्राम सभाओं का सशक्तीकरण पारदर्शिता, जवाबदेही तथा वंचित समूहों की भागीदारी के मामले में एक सशक्त प्रभावकारी हथियार है। लेकिन कई राज्यों के एक्ट ग्राम सभाओं के अधिकारों को स्पष्ट नहीं कर पाए हैं, न ही इन सभाओं के प्रकार्यों की निर्दिष्ट कार्यविधियों को स्पष्ट किया गया। अधिकारियों को दंड देने की व्यवस्था के बारे में भी स्पष्टता नहीं है।
  • समांतर निकायों का गठन : प्रायः समांतर निकायों को त्वरित कार्यान्वयन तथा बेहतर जवाबदेही की आशा में गठित किया जाता है। हालांकि न के बराबर प्रमाण हैं कि ऐसी समांतर निकायें स्वयं को विकृतियों, यथा-पक्षपाती राजनीति, लूट की बंदरबाँट, भ्रष्टाचार तथा संभ्रान्तों द्वारा कब्जे आदि से मुक्त रख पाई हैं। खास-खास पहलें (missions), जो मुख्य-मुख्य कार्यक्रमों या कार्य योजनाओं को अनदेखी कर देती हैं, वर्तमान ढांचे तथा उसके प्रकार्यों और नव-निर्मित ढांचों तथा इसके प्रकार्यों के बीच मेल नहीं बनने देतीं। समांतर निकाय, पंचायती राज संस्थाओं के वैध क्षेत्र का अतिक्रमण करते हैं क्योंकि उनके पास श्रेष्ठतर संसाधन बंदोबस्त होते है।
  • कमजोर संरचना : देश में अनेकों ग्राम पंचायतों में पूर्णकालिक सचिव नहीं होते। लगभग 25% ग्राम पंचायतों के पास अपने कार्यालय भवन नहीं होते। अनेकों के पास नियोजन, निगरानी आदि के लिए आँकड़े या तथ्य संग्रह नहीं होते। निर्वाचित पंचायती संस्थाओं के अधिकतर सदस्य अर्द्ध-शिक्षित हैं इसलिए ने अपने भूमिका जिम्मेदारी, कार्ययोजना, कार्यप्रणाली तथा व्यवस्था के बारे में अनभिज्ञ रहते हैं। प्रायः सक्षम, आवश्यक तथा आवधिक प्रशिक्षण की कमी के कारण वे अपने प्रकार्यों का सही निष्पादन नहीं करते हैं। हालांकि सभी जिला-स्तरीय तथा मध्यवर्ती पंचायतें कंप्यूटरों से संपृक्त हैं परंतु केवल 20% ग्रा पंचायतें ऐसी हैं जहा कंप्यूटर पर काम करने की व्यवस्था है। कुछ राज्यों में ग्राम पंचायतों के पास कंप्यूटर की कोई व्यवस्था नहीं है।

पंचायती राज का मूल्याकन

ग्रामीण और शहरी दोनों स्तरों पर तृणमूल स्तर पर लोकतंत्र की अवधारणा फल-फूल नहीं पाई इस असफलता के पीछे कुछ मुख्य कारण प्रशासन का राजनीतिकरण, निर्वाचित संस्थाओं में अपराधियों का प्रवेश, व्याप्त भ्रष्टाचार, जातीय और वर्गीय विभाजन, जन कल्याण के उपर स्वार्थ को प्राथमिकता और चुनावी अनाचार हैं। 73वां संशोधन अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, पिछड़े वर्गों और महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित करके गांवों के ढांचे में क्रांतिकारी परिवर्तन लाना चाहता है। परंतु उचित शिक्षा की कमी, प्रशिक्षण और आर्थिक स्वतंत्रता की कमी के कारण ये समूह अपनी शक्ति प्रकट करने में असमर्थ हैं। निरक्षरता, गरीबी और बेरोजगारी मुख्य बाधाएं हैं। इन समस्याओं से जूझने के लिए आवश्यक कदम उठाने बहुत जरूरी हैं जिससे सहभागी विकास हो सके। यद्यपि महिलाओं के लिए सीटों के आरक्षण को उनके पुरुष साथियों-अधिकांशत: उनके पतियों ने गलत प्रयोग किया है, परंतु निश्चित रूप से इसने महिलाओं को कुछ हद तक सशक्त किया है। वह अपने अधिकारों और दायित्वों के प्रति अधिक जागरूक होती जा रही हैं और कुछ मामलों में तो अपनी शक्ति प्रदर्शित कर रही हैं। निश्चय ही यह बहुत सकारात्मक विकास है।
नवीनतम संविधान संशोधनों ने स्थानीय स्वशासी निकायों के वित्तीय संसाधनों को व्यापक किया है। फिर भी उन्हें पैसे की कमी है। उन्हें कर लगाने की शक्ति दी गई है पर वे पर्याप्त कर एकत्रित नहीं कर पाते। अतः संसाधनों की कमी के कारण पंचायतें स्वशासी संस्थाओं के रूप में अपनी भूमिका निभाने अथवा | ग्रामीण क्षेत्र में आर्थिक विकास करने में सफल नहीं हुई हैं। पंचायतों पर राज्य सरकार के अनेक नियंत्रण हैं। राज्य सरकारों को उनके प्रस्ताव रद्द करने और उन्हें भंग करने तक का अधिकार है। परंतु 73वें संशोधन ने राज्यों के लिए यह अनिवार्य कर दिया है कि वे पंचायती राज संस्थाओं के भंग होने के छह मास के अंदर उनके चुनाव करवायें। यह आवश्यक है कि लोग लोकतांत्रिक ढंग से निर्वाचित पंचायतों में सक्रिय भागीदारी करें। इसे ग्राम सभा के माध्यम से सुनिश्चित किया जा सकता है। ग्राम सभाओं के माध्यम से लोग पंचायतो से प्रश्न कर सकते हैं और स्पष्टीकरण की मांग कर सकते हैं। ग्राम सभा लोगों की आवश्यकताओं और प्राथमिकताओं में तालमेल कर सकती है और ग्राम विकास की दिशा भी नियोजित कर सकती है। ग्राम सभाएं तृणमूल स्तर पर लोकतंत्र संरक्षित करने की भूमिका सफलतापूर्वक निभा सकती हैं यदि उन्हें पर्याप्त अधिकार प्रदान किए जाएं। ग्रामीण क्षेत्र का सम्पूर्ण आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विकास मजबूत पंचायतों पर निर्भर करता है। निम्नतम स्तर पर लोकतंत्र की बुनियाद के रूप में पंचायतों को उनमें विश्वास जताकर तथा उन्हें पर्याप्त प्रशासनिक और वित्तीय शक्तियां देकर एवं लोगों की सक्रिय सतर्कता और भागीदारी को प्रोत्साहित करके सशक्त किया जा सकता है।

पंचायतों से संबंधित अनुच्छेद

अनुच्छेद विषय
243 परिभाषाएँ
243 ए ग्राम सभा
243 बी पंचायतों का संविधान
243 सी पंचायतों का गठन
243 डी सीटों का आरक्षण
243 इ पंचायतों का कार्यकाल इत्यादि
243 एफ सदस्यता से अयोग्यता
243 जी पंचायतों की शक्तियाँ, प्राधिकार तथा उत्तरदायित्व
243 एच पंचायतों की करारोपण की शक्ति
243 आई वित्तीय स्थिति की समीक्षा के लिए वित्त आयोग का गठन
243 जे पंचायतों के लेखा का अंकेक्षण
243 के पंचायतों का चुनाव
243 एल संघीय क्षेत्रों पर लागू होना
243 एम कतिपय मामलों में इस भाग का लागू नहीं होना
243 एन पहले से विद्यमान कानूनों एवं पंचायतों का जारी रहना
243 ओ चुनावी मामलों में न्यायालयों के हस्तक्षेप पर रोक

पंचायतों के नाम एवं उनकी संख्या (2010)
राज्य पंचायती राज संस्थाएँ संख्या
आंध्र प्रदेश 1. ग्राम पंचायत
2. मंडल परिषद्
3. जिला परिषद्
21809
1097
22
अरुणाचल प्रदेश 1. ग्राम पंचायत
2. अचल समिति
3. जिला परिषद्
1751
150
16
असम 1. गोअन पंचायत
2. आँचलिक पंचायत
3. जिला परिषद्
4. स्वशासी जिला परिषद् (ADC)
2202
185
20
4
बिहार 1. ग्राम पंचायत
2. पंचायत
3. जिला परिषद्
8463
531
38
छत्तीसगढ़ 1. ग्राम पंचायत
2. जनपद पंचायत
3. जिला पंचायत
9820
146
16
गोवा 1. ग्राम पंचायत
2. जिला पंचायत
189
2
गुजरात 1. ग्राम पंचायत
2. तालुका पंचायत
3. जिला पंचायत
13738
224
26
हरियाणा 1. ग्राम पंचायत
2. पंचायत समिति
3. जिला परिषद्
6817
119
19
हिमाचल प्रदेश 1. ग्राम पंचायत
2. पंचायत समिति
3. जिला परिषद्
3243
75
12
जम्मू एवं कश्मीर 1. हलका पंचायत 4139
झारखंड 1. ग्राम पंचायत
2. पंचायत समिति
3. जिला पंचायत
4562
212
24
कर्नाटक 1. ग्राम पंचायत
2. तालुका पंचायत
3. जिला पंचायत
5652
176
29
केरल 1. ग्राम पंचायत
2. प्रखंड पंचायत
3. जिला पंचायत
999
152
14
मध्य प्रदेश 1. ग्राम पंचायत
2. प्रखंड पंचायत
3. जिला पंचायत
23040
313
48
महाराष्ट्र 1. ग्राम पंचायत
2. पंचायत समिति
3. जिला परिषद्
27916
351
33
मणिपुर 1. ग्राम पंचायत
2. जिला पंचायत
3. स्वशासी जिला परिषद् (ADC)
165
4
6
मेघालय 1.स्वशासी जिला परिषद् (ADC) 3
मिजोरम 1. ग्राम परिषद् 707
नागालैंड 1. ग्राम परिषद् 1110
ओड़ीशा 1. ग्राम पंचायत
2. पंचायत समिति
3. जिला परिषद्
6234
314
30
पंजाब 1. ग्राम पंचायत
2. पंचायत समिति
3. जिला परिषद्
12447
141
20
राजस्थान 1. ग्राम पंचायत
2. पंचायत समिति
3. जिला परिषद्
9184
237
32
सिक्किम 1. ग्राम पंचायत
2. जिला पंचायत
163
4
तमिलनाडु 1. ग्राम पंचायत
2. पंचायत संघ
3. जिला पंचायत
12618
385
29
त्रिपुरा 1. ग्राम पंचायत
2. पंचायत समिति
3. जिला पंचायत
4. स्वशासी जिला परिषद् (ADC)
513
23
4
1
उत्तर प्रदेश 1. ग्राम पंचायत
2. क्षेत्र पंचायत
3. जिला पंचायत
52000
820
70
उत्तराखंड 1. ग्राम पंचायत
2. मध्यवर्ती पंचायत
3. जिला पंचायत
7227
95
13
पश्चिम बंगाल 1. ग्राम पंचायत
2. पंचायत समिति
3. जिला परिषद्
3354
341
18
संपूर्ण भारत 1 ग्राम पंचायत (ग्राम परिषदों सहित)
2. पंचायत समिति
3. जिला पंचायत
4. स्वशासी जिला परिषद् (ADC)
239432
6087
543
14
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