राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग | rashtriya anusuchit janjati aayog

राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग

भारत में अनुसूचित जनजाति शब्द का प्रयोग पहली बार भारत शासन अधिनियम, 1935 में किया गया और भारतीय संविधान के अनुच्छेद-341 में राष्ट्रपति के द्वारा अनुसूचित जाति का निर्धारण किया जाता है, जिसमें सम्बंधित राज्यों के राज्यपाल से भी परामर्श किया जाता है।
rashtriya anusuchit janjati aayog
राष्ट्रीय जनजाति आयोग वर्ष-2003 से एक संवैधानिक निकाय है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 338क कहता है कि अनुसूचित जनजातियों के लिए एक आयोग होगा। इसे राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के नाम से जाना जाएगा। आयोग की शक्तियां एवं कार्य ठीक वैसा ही होगा, जैसा एक संवैधानिक निकाय का होता है।
इस आयोग से पूर्व संसदीय कार्यपालिका ने 65वें संविधान संशोधन अधिनियम-1990 के द्वारा अनुसूचित जनजातियों व जनजातियों के लिए एक बहु-सदस्यीय राष्ट्रीय अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति आयोग की स्थापना की थी। इसके पास काम की अधिकता होने के कारण यह व्यवस्थित तौर पर मामलों का निराकरण नहीं कर पा रहा था। कार्यपालिका को दिए गए सुझाव के बाद 89वें संविधान संशोधन अधिनियम-2003 से राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (अनुच्छेद-338) और राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (अनुच्छेद-338 क) को अलग-अलग दो भागों में विभाजित कर दिया।
अनुसूचित जनजाति का अभिप्राय, आदिवासी अथवा वनवासी समुदाय से है, जो भौगोलिक रूप से सुदूर पहाड़ी एवं वन्य क्षेत्रों में रहते हैं। वे आर्थिक व राजनैतिक रूप से अत्यधिक पिछड़े हुए हैं और अपनी आजीविका के लिये पूर्णतः वन्य उत्पादों एवं कृषि पर निर्भर हैं। राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग की तरह राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग भी एक संवैधानिक निकाय है। इसका गठन संविधान के अनुच्छेद 338-क के द्वारा किया गया है।
उनकी भाषा और संस्कृति विशिष्ट है तथा वे समाज की मुख्य धारा में शामिल नहीं हैं वे स्वयं को समाज से अलग-थलग बनाए रखते हैं।
89वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 द्वारा राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के गठन का पृथक् प्रावधान किया गया, (अनुच्छेद-338क)।
वर्ष 2004 में राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग वर्ष 2004 में अस्तित्व में आया।

आयोग की स्थापना

वर्ष 1990 में, 65वें संविधान संशोधन के द्वारा अनुच्छेद-338 के अन्तर्गत एक राष्ट्रीय अनुसूचित जाति एवं जनजाति आयोग की स्थापना की गई थी।
  • भौगोलिक एंव सांस्कृतिक रूप से अनुसूचित जनजातियाँ अनुसूचित जातियों से भिन्न हैं तथा उनकी समस्याएँ भी अनुसूचित जातियों से भिन्न हैं। 1999 में अनुसूचित जनजातियों के कल्याण एवं विकास से सम्बंधित कार्यों को गति देने के लिये एक नये जनजातीय मंत्रालय की स्थापना संघ सरकार द्वारा की गयी।
  • इस प्रकार अनूसूचित जनजातियों के हितों की अधिक प्रभावी तरीके से रक्षा के लिए यह प्रस्ताव रखा गया कि, राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग एवं जनजाति आयोग का विभाजन कर दिया जाये तथा दोनों के लिये पृथक्-पृथक् आयोगों की स्थापना की जाए।
  • इसके लिये संविधान के अनुच्छेद-338 में संशोधन किया गया तथा उसमें एक नया अनुच्छेद 338(क) जोड़ा गया।

संवैधानिक स्थिति

संविधान निर्माताओं द्वारा संविधान में अनुच्छेद 17, 46, 335, 15(4), 330, 332 तथा 338 का वर्णन इस समुदाय के उत्थान के प्रति गहरी चिंता को व्यक्त करता है। संविधान के अनुसार अनुसूचित जनजाति आयोग का यह कर्तव्य है कि वह संविधान के तहत अनुसूचित जनजातियों को उपलब्ध कराए गये सुरक्षा उपायों से संबंधित सभी मामलों की जांच करे। आयोग के विभिन्न कार्य और शक्तियों का उल्लेख संविधान में किया गया है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 366 (25) उन समुदायों को अनुसूचित जनजाति के लिए सदर्भित करता है जिनका निर्धारण संविधान के अनुच्छेद 342 के अनुसार किया गया है। यह अनुच्छेद कहता है कि केवल वो समुदाय जिन्हें एक आरंभिक सार्वजनिक अधिसूचना के माध्यम से या एक संसदीय संशोधन अधिनियम के माध्यम से राष्ट्रपति द्वारा घोषित किया गया है उन्हें ही अनुसूचित जनजाति माना जाएगा।
अनुच्छेद 338क में इस बात का उल्लेख है कि अनुसूचित जनजातियों के लिए लिए एक आयोग होगा जिसे राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के रूप में जाना जाएगा।
राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के कार्यालय के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और प्रत्येक सदस्य का कार्यकाल कार्यालय में कार्यभार ग्रहण करने की तिथि से तीन वर्ष का होता है। आयोग के अध्यक्ष को एक केंद्रीय मंत्री का दर्जा प्राप्त होता है और उपाध्यक्ष को एक राज्य मंत्री का दर्जा प्राप्त होता है। आयोग के अन्य सदस्यों को भारत सरकार के एक सचिव का रैंक प्राप्त होता है।

आयोग की संरचना

  • अनुसूचित जनजातियों के लिए एक आयोग होगा, जिसे राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के रूप में जाना जाएगा।
  • आयोग के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और अन्य सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति के हस्ताक्षर और मुहर सहित एक अधिपत्र के माध्यम से की जाएगी।
  • आयोग के पास अपनी प्रक्रिया को नियंत्रित करने की शक्ति रहेगी।
  • हालांकि, केंद्र और प्रत्येक राज्य सरकारें उन प्रमुख सभी नीतिगत मामलों पर आयोग से परामर्श करेंगे जो अनुसूचित जनजातियों को प्रभावित करते हैं।
  • जैसे-भारत की अनसचित जनजातियां गोंड, आंध्र प्रदेश में भील, अरुणाचल प्रदेश में अपातनी व अधिक जनजातियां हैं।
  • आयोग में एक अध्यक्ष, एक उपाध्यक्ष और तीन अन्य सदस्य होते हैं।
  • आयोग से सदस्यों को राष्ट्रपति के आदेश और हस्ताक्षर तथा मुहर के तहत नियुक्त किया जाता है।
  • राष्ट्रपति, समय-समय पर अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और सदस्यों की सेवा-शर्तों एवं कार्यकाल का निर्धारण करता है।
  • आयोग के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष एवं अन्य सदस्यों का कार्यकाल तीन वर्ष का होता है। अध्यक्ष और सदस्य दो कार्यकाल से अधिक के लिए नियुक्त नहीं हो सकते। अध्यक्ष, अनुसूचित जनजाति का सदस्य होना चाहिए, जो प्रसिद्ध सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ता हो तथा उपाध्यक्ष एवं अन्य सदस्यों में से कम से कम दो व्यक्ति अनुसूचित जनजाति से सम्बंधित होने चाहिए।
  • अध्यक्ष को केन्द्रीय कैबिनेट मंत्री और उपाध्यक्ष को केन्द्रीय राज्य मंत्री तथा सदस्यों को भारत सरकार के सचिव का दर्जा प्राप्त होता है।
  • इनके वेतन व भत्ते भारत सरकार के सचिव के समान होंगे।

राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के 6 क्षेत्रीय कार्यालय
  • भोपाल (मध्य प्रदेश)
  • भुवनेश्वर (ओडिशा)
  • जयपुर (राजस्थान)
  • रायपुर (छत्तीसगढ़)
  • रांची (झारखण्ड)
  • शिलांग (मेघालय)

आयोग के कार्य

  • राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग को भारतीय संविधान के अधीन या अस्थायी रूप से किसी अन्य कानून के अधीन या सरकार के किसी आदेश के अधीन अनुसूचित जनजातियों को दिए गए संरक्षण से सम्बंधित सभी विषयों की जाँच करना व निगरानी करना।
  • संविधान के तहत अनुसूचित जनजातियों को उपलब्ध कराए गये सुरक्षा उपायों से संबंधित सभी मामलों की जांच करना और उन पर नजर रखना या अन्य किसी कानून के तहत कुछ समय के लिए लागू करना या भारत सरकार के किसी भी आदेश और सुरक्षा उपायों की कार्यप्रणाली का मूल्यांकन करना।
  • अनुसूचित जनजातियों के लिए बनायी जाने वाली सामाजिक आर्थिक विकास की योजना प्रक्रिया में हिस्सा लेना और सलाह देना तथा केंद्र एवं किसी भी राज्य के अधीन उनके विकास की प्रगति का मूल्यांकन करना।
  • केंद्र या किसी राज्य द्वारा बनाये गये सुरक्षा उपायों के प्रभावी कार्यान्वयन और अनुसूचित जनजातियों के संरक्षण, कल्याण और सामाजिक-आर्थिक विकास के अन्य उपायों की रिपोर्ट तैयार करना जिसके लिए इन्हें प्रभावी बनाने की सिफारिश की गयी है।
  • राष्ट्रपति द्वारा निर्दिष्ट, और संसद द्वारा अनुसूचित जनजातियों के संरक्षण, कल्याण, विकास और उन्नति से संबंधित अन्य कार्यों के लिए बनाये गये कानूनों को लागू कर इनका निर्वहन करना।
  • उन उपायों का निर्माण करना जिससे बन क्षेत्रों में रहने वाले अनुसूचित जनजातियों को लघु वन उपज से संबंधित स्वामित्व अधिकार देने की जरूरत के लिये कदम उठाना।
  • खनिज संसाधन, जल संसाधनों आदि पर कानून के अनुसार आदिवासी समुदायों के अधिकारों से संबंधित नियम तय करने के लिए और अधिक कदम उठाना। 7 जनजातियों के विकास तथा व्यावहारिक आजीविका की रणनीतियां बनाने के लिए और अधिक कदम उठाना।
  • विकास परियोजनाओं के कारण विस्थापित आदिवासी समूहों के लिए राहत और पुनर्वास उपायों की क्षमता में सवार - करने के लिए कदम उठाना।
  • अपनी भूमि या जगह से जनजातीय लोगों के अलगाव को रोकने और प्रभावी ढंग से उन लोगों का और उनमें पहले से ही निहित अलगाव की भावना को दूर करने के लिए कदम उठाना।
  • अनुसूचित जनजातियों के अधिकारों के हनन से सम्बंधित विशिष्ट शिकायतों की जाँच करना।
  • अनुसूचित जनजातियों के सामाजिक एवं आर्थिक विकास से सम्बंधित योजना निर्माण में भाग लेना और सलाह देना साथ ही संघ और किसी भी राज्य में उनके विकास की प्रगति का मूल्यांकन करना।
  • आयोग राष्ट्रपति को अनुसूचित जनजातियों से सम्बंधित वार्षिक प्रतिवेदन सौंपता है।
  • अनुसूचित जनजातियों के संरक्षण, कल्याण और विकास तथा प्रगति के सम्बंध में ऐसे अन्य कार्यों को, जिन्हें राष्ट्रपति, संसद द्वारा निर्मित किसी कानून के अधीन विनिर्दिष्ट करें, उनका निर्वहन करना है।
  • अनुसूचित जनजातियों के लिए इस संविधान या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि या सरकार के किसी आदेश के अधीन उपबंधित रक्षोपायों से संबंधित सभी विषयों का अन्वेषण करे और उन पर निगरानी रखे तथा ऐसे रक्षोपायों के कार्यकरण का मूल्यांकन करे
  • अनुसूचित जनजातियों को उनके अधिकारों और रक्षोपायों से वंचित करने के सम्बन्ध में विनिर्दिष्ट शिकायतों की जांच करे
  • अनुसूचित जनजातियों के सामाजिक-आर्थिक विकास की योजना प्रक्रिया में भाग ले और उन पर सलाह दे तथा संघ और किसी राज्य के अधीन उनके विकास की प्रगति का मूल्यांकन करे
  • उन रक्षोपायों के कार्यकरण के बारे में प्रतिवर्ष और ऐसे अन्य समयों पर जो आयोग ठीक समझे, राष्ट्रपति को रिपोर्ट प्रस्तुत करे
  • ऐसी रिपोर्टों में उन उपायों के बारे में, जो उन रक्षोपायों के प्रभावपूर्ण कार्यान्वयन के लिए संघ या किसी राज्य द्वारा किए जाने चाहिए तथा अनुसूचित जनजातियों के संरक्षण, कल्याण और सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए अन्य उपायों के बारे में सिफारिश करे, और
  • अनुसूचित जनजातियों के संरक्षण, कल्याण और विकास तथा उन्नयन के संबंध में ऐसे अन्य कृत्यों का निर्वहन करे जो राष्ट्रपति, संसद, द्वारा बनाई गई किसी विधि के उपबंधों के अधीन रहते हुए, नियम द्वारा विनिर्दिष्ट करे।

आयोग के अन्य कार्य

2005 में राष्ट्रपति ने अनुसूचित जनजातियों की सुरक्षा, कल्याण तथा विकास और उन्नति के लिए आयोग के निम्नलिखित कुछ अन्य कार्य निर्धारित किए'
  1. वन क्षेत्र में रह रही अनुसूचित जनजातियों को लघु वनोपज पर स्वामित्व का अधिकार देने संबंधी उपाय।
  2. कानून के अनुसार जनजातीय समुदायों के खनिज तथा जल संसाधनों आदि पर अधिकार को सुरक्षित रखने संबंधी उपाय।
  3. जनजातियों के विकास तथा उनके लिए अधिक वहनीय आजीविका रणनीतियों पर काम करने संबंधी उपाय।
  4. विकास परियोजनाओं द्वारा विस्थापित जनजातीय समूहों के लिए सहायता एवं पुनर्वास उपायों की प्रभावकारिता बढ़ाने संबंधी उपाय।
  5. जनजातीय लोगों का भूमि से बिलगाव रोकने के उपाय तथा उन लोगों का प्रभावी पुनर्वासन करना जी पहले ही भूमि से विलग हो चुके हैं।
  6. जनजातीय समुदायों की वन सुरक्षा तथा सामाजिक वानिकी में अधिकतम सहयोग एवं संलग्नता प्राप्त करने संबंधी उपाय।
  7. पेसा अधिनियम, 1996 का पूर्ण कार्यान्वयन सुनिश्चित करने संबंधी उपाय।
  8. जनजातियों द्वारा झूम खेती के प्रचलन को कम करने तथा अंततः समाप्त करने संबंधी उपाय, जिसके कारण उनके लगातार अशक्तीकरण के साथ भूमि तथा पर्यावरण का अपरदन होता है।

अनूसूचित जनजातियों के लिए पृथक् आयोग
1990 के 65वें संविधान संशोधन अधिनियम के द्वारा अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों के लिये एक राष्ट्रीय अनुसूचित जाति एवं जनजाति आयोग की स्थापना की गयी। संविधान के अनुच्छेद 338 के द्वारा इस आयोग की स्थापना अनुसूचित जाति जनजाति को संविधान या अन्य विधियों के अंतर्गत संरक्षण प्रदान करने के उद्देश्य से की गयी है।
भौगोलिक एवं सांस्कृतिक रूप से अनुसूचित जनजातियां अनुसूचित जातियों से भिन्न हैं तथा उनकी समस्यायें भी अनुसूचित जातियों से भिन्न हैं। 1999 में अनुसूचित जनजातियों के कल्याण एवं विकास के कार्यों को गति देने के लिये एक नये जनजातीय मंत्रालय की स्थापना की गयी। यह महसूस किया गया कि अनुसूचित जनजातियों से संबंधित सभी योजनाओं में समन्वय स्थापित करने के लिये जनजातीय कल्याण मंत्रालय का होना आवश्यक है। चूंकि सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के लिए इस भूमिका को निभाना प्रशासनिक दृष्टि से संभव नहीं था।
इस प्रकार अनुसूचित जनजातियों के हितों की अधिक प्रभावी तरीके से रक्षा के लिये यह प्रस्ताव रखा गया कि राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग एवं जनजाति आयोग का विभाजन कर दिया जाये तथा दोनों के लिये पृथक-पृथक आयोगों की स्थापना की जाये। इसकी स्थापना अंतत: 2003 के 89वें संविधान संशोधन अधिनियम के द्वारा की गयी। इसके लिये संविधान के अनुच्छेद 338 में संशोधन किया गया तथा उसमें एक नया अनुच्छेद 338-क जोड़ा गया।
वर्ष 2004 से राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग अस्तित्व में आया। इस आयोग में एक अध्यक्ष, एक उपाध्यक्ष एवं तीन अन्य सदस्य हैं। वे राष्ट्रपति द्वारा उसके आदेश एवं मुहर लगे आदेश द्वारा नियुक्त किये जाते हैं। उनकी सेवा शर्ते एवं कार्यकाल भी राष्ट्रपति द्वारा ही निर्धारित किया जाता है।

अनुसूचित जनजातियों के विकास में आयोग की भूमिका
  • जनजातीय मंत्रालय के माध्यम से आयोग अनुसूचित जनजातियों के कल्याण एवं विकास का कार्य संपादित करता है। जिसके द्वारा जनजातीय क्षेत्र में लघु वन उपजों पर इनका स्वामित्व सम्बंधी अधिकार होगा।
  • प्राकृतिक वन्य संसाधनों पर जनजातियों का अधिकार होगा तथा जनजातीय क्षेत्रों का विकास किया जाएगा और विकास परियोजनाओं से विस्थापित जनजातियों का पुनर्वास की व्यवस्था करना आयोग का दायित्व है।
  • सामाजिक-वानिकी तथा वन के संरक्षण के लिए जनजातियों का सहयोग प्राप्त करना, झूम खेती की परंपरा को धीरे-धीरे स्थाई कृषि में परिवर्तित करना।
संघ सरकार एवं राज्य सरकारों के द्वारा अनुसूचित जनजातियों के कल्याण से सम्बंधित निर्मित नीतियों में राष्ट्रीय जनजाति आयोग की सलाह ली जाती है।

शिकायतों की जाँच

  • आयोग के द्वारा अनुसूचित जनजातियों के उत्पीड़न की शिकायत की जाँच भी की जाती है। इस संदर्भ में शिकायत सीधे आयोग के अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष को भेजी जाती है।
  • यदि किसी विषय में न्यायपालिका का निर्णय लम्बित है, तो उसकी शिकायत आयोग से नहीं की जा सकती।

आयोग की शक्तियाँ

आयोग को अपनी कार्यविधि को विनियमित करने की शक्ति प्राप्त है।
आयोग को, किसी विषय का अन्वेषण करते समय या । किसी परिवाद के बारे में जांच करते समय, विशिष्टता निम्नलिखित विषयों के संबंध में, वे सभी शक्तियां होंगी, जो वाद का विचारण करते समय सिविल न्यायालय को प्राप्त हैं, अर्थात्
  1. भारत के किसी भी भाग से किसी व्यक्ति को समन करना और हाजिर कराना तथा शपथ पर उसकी परीक्षा करना
  2. किसी दस्तावेज को प्रकट और पेश करने की अपेक्षा करना
  3. शपथ पत्रों पर साक्ष्य ग्रहण करना
  4. किसी न्यायालय या कार्यालय से किसी लोक अभिलेख या उसकी प्रति की अध्यपेक्षा करना
  5. साक्षियों और दस्तावेजों की परीक्षा के लिए कमीशन निकालना
  6. कोई अन्य विषय, जो राष्ट्रपति, नियम द्वारा अवधारित करे संघ और प्रत्येक राज्य सरकार, अनुसूचित जनजातियों को प्रभावित करने वाले सभी महत्वपूर्ण नीतिगत विषयों पर आयोग से परामर्श करेगी।
किसी भी व्यक्ति विशेष आयोग समन जारी कर सकता है और पूछताछ कर सकता है। आयोग मामले के संबंध में किसी भी प्रकार के दस्तावेजों की खोज, छानबीन, प्रस्तुत करने को कह सकता है। आयोग हलफनामों पर सबूत मांग सकता है। संबंधित अधिकारी ऐसा करने से मना नहीं कर सकता। किसी भी न्यायालय अथवा कार्यालय से कोई भी सार्वजनिक रिकॉर्ड या उसकी प्रति मंगाने की शक्ति है। गवाहों और दस्तावेजों की जांच के लिए आयोग के पास भेजना, विशेषज्ञों से जांच कराना। राष्ट्रपति शासन द्वारा, निर्धारित किसी भी मामले का निर्धारण व नियमन का पालन करना।
  • आयोग के पास सिविल न्यायालय की वे सभी शक्तियाँ होंगी, जो उसे किसी वाद की सुनवाई के सम्बंध में प्राप्त हैं। आयोग भारत के किसी भी भाग के किसी भी व्यक्ति को उपस्थित होने के लिए समन जारी कर सकता है।
  • शपथ-पत्र प्राप्त कर सकता है एवं उससे पूछताछ कर सकता है।
  • आयोग किसी भी दस्तावेज की खोज और प्राप्ति का आदेश दे सकता है।
  • शपथ-पत्र पर साक्ष्य प्राप्त कर सकता है।
  • किसी भी न्यायालय या कार्यालय से सार्वजनिक दस्तावेज अथवा उसकी प्रतिलिपि की माँग करना।
  • गवाहों और प्रलेखों (Documents) की जाँच के लिए अधिकार-पत्र जारी करना।
  • किसी अन्य विषय के सम्बंध में शक्तियाँ, जो राष्ट्रपति नियम द्वारा। निर्धारित करें।
  • 6 जून, 2018 को सर्वोच्च न्यायालय ने सरकारी नौकरियों में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के कर्मचारियों की प्रोन्नति में कानून सम्मत आरक्षण देने की अनुमति दे दी है।
  • शीर्ष न्यायालय ने प्रोन्नति जारी रखने का आदेश का अंतिम फैसला आने तक के लिए दिया है।

अनुसूचित जनजाति आयोग का प्रतिवेदन

  • आयोग के द्वारा प्रत्येक वर्ष राष्ट्रपति को अपना प्रतिवेदन (Report) प्रस्तुत किया जाता है राष्ट्रपति के द्वारा इस प्रतिवेदन को संसद के पटल पर रखवाया जाता है और इस प्रतिवेदन के साथ संघ सरकार से सम्बंधित अनुशंसाओं की स्वीकृति अथवा अस्वीकृति के कारणों का ज्ञापन भी शामिल होता है।
  • यदि रिपोर्ट में किसी राज्य से सम्बंधित विषय पर कुछ अनुशंसाएँ (Recommendation) की गई हैं तो रिपोर्ट की एक प्रति सम्बंधित राज्य के राज्यपाल को भेजी जाएगी, जो उसे राज्य विधानमण्डल के पटल पर रखवाता है। यहाँ भी स्वीकृति अथवा अस्वीकृति एवं अनुशंसाओं पर की जाने वाली कार्यवाही का ज्ञापन साथ में प्रस्तुत करना होगा।
  • आयोग अपना वार्षिक प्रतिवेदन राष्ट्रपति को प्रस्तुत करता है। यदि आवश्यक समझा जाता है तो समय से पहले भी आयोग अपना प्रतिवेदन दे सकता है।
राष्ट्रपति ऐसी सभी रिपोर्टों को संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाएगा और उनके साथ संघ से संबंधित सिफारिशों पर की गई या किए जाने के लिए प्रस्थापित कार्रवाई तथा यदि कोई ऐसी सिफारिश अस्वीकृत की गई है तो अस्वीकृति के कारणों को स्पष्ट करने वाला ज्ञापन भी होगा।
जहां कोई ऐसी रिपोर्ट या उसका कोई भाग, किसी ऐसे विषय से संबंधित है, जिसका किसी राज्य सरकार से संबंध है तो ऐसी रिपोर्ट की एक प्रति उस राज्य के राज्यपाल को भेजी जाएगी जो उसे राज्य के विधानमंडल के समक्ष रखवाएगा और उसके साथ राज्य से संबंधित सिफारिशों पर की गई या किए जाने के लिए प्रस्थापित कार्रवाई तथा यदि कोई ऐसी सिफारिश अस्वीकृत की गई है तो अस्वीकृति के कारणों को स्पष्ट करने वाला ज्ञापन भी होगा।

राष्ट्रीय आदिवासी नीति
केन्द्र सरकार ने राष्ट्रीय आदिवासी नीति का प्रारूप 21 जुलाई, 2006 को जारी किया गया। इस नये प्रारूप में सरकार ने आदिवासियों से जुड़े 23 विषयों पर ध्यान केंद्रित किया है
आदिवासियों की जमीन अधिग्रहण, उनके विस्थापन, पुनर्वास, शिक्षा, स्वास्थ्य, सफाई, राज्यों के पेसा कानून को केन्द्र के कानून के | संगत बनाना, लैंगिक भेदभाव को दूर करने, उनकी संस्कृति का संरक्षण करने, उन पर अनुसंधान करने आदि पर बल दिया गया है।
यह नीति आदिवासियों के हितों से जुड़े संविधान के अनुच्छेदों में अंतर्निहित अधिकारों और उद्देश्यों के आधार पर तैयार की गयी है।

संदर्भ सूची

  • अनुच्छेद 338क संविधान के भाग XVI 'कुछ वर्गों के संबंध में विशेष उपबंध' में वर्णित है। इस अनुच्छेद को 2003 के 89वें संविधान संशोधन अधिनियम के द्वारा जोड़ा गया है।
  • यह अधिनियम 12-03-1992 से प्रभाव में आया।
  • अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के लिये संवैधानिक संरक्षण की व्याख्या बाद में पृथक् अध्याय-66 में की गयी है।
  • सामाजिक न्याय एवं आधिकारिता मंत्रालय अनुसूचित जातियों से संबंधित सभी मामलों का समन्वय करता है।
  • यह अधिनियम 19-02-2004 से प्रभाव में आया।
  • नियमानुसार, इनका कार्यकाल 3 वर्ष का होगा।
  • अनुसूचित जनजातियों का राष्ट्रीय आयोग (अन्य कार्यों का विनिर्देशन) नियामवली, 2005

FAQ :

1. राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग है?
  • (a) एक संवैधानिक निकाय
  • (c) संवैधानिक अधिकार नहीं है।
  • (b) एक वैधानिक निकाय
  • (d) अर्द्ध-न्यायिक
(a) एक संवैधानिक निकाय

2. राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग का गठन किया गया है? 
  • (a) अनुच्छेद 338 के तहत
  • (b) अनुच्छेद 338 क के तहत
  • (c) अनुच्छेद 338 ख के तहत
  • (d) अनुच्छेद 342 क के तहत 
(a) अनुच्छेद 338 के तहत

3. अनुसूचित जनजातियों के लिए एक पृथक आयोग गठन का निर्णय लिया गया था?
  • (a) 42वें संविधान संशोधन द्वारा
  • (b) 65वें संविधान संशोधन द्वारा
  • (c) 89वें संविधान संशोधन द्वारा 
  • (d) 41वें संविधान संशोधन द्वारा
(c) 89वें संविधान संशोधन द्वारा

4. राष्ट्रीय अनुसूचित जाति एवं जनजाति आयोग की स्थापना की गई थी, जो एक संयुक्त राष्ट्रीय आयोग था।
  • (a) 42वें संविधान संशोधन द्वारा
  • (b) 65वें संविधान संशोधन द्वारा
  • (c) 89वें संविधान संशोधन द्वारा 
  • (d) 41वें संविधान संशोधन द्वारा
(b) 65वें संविधान संशोधन द्वारा

5. राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग का गठन अनुच्छेद 338क द्वारा किया गया। इस अनुच्छेद को भार संविधान में जोड़ा गया।
  • (a) 42वें संविधान संशोधन द्वारा
  • (b) 65वें संविधान संशोधन द्वारा
  • (c) 89वें संविधान संशोधन द्वारा
  • (d) 41वें संविधान संशोधन द्वारा
(c) 89वें संविधान संशोधन द्वारा

6. राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग अस्तित्व में आया?
  • (a) वर्ष 2000 में
  • (c) वर्ष 2005 में
  • (b) वर्ष 2004 में
  • (d) वर्ष 2008 में
(b) वर्ष 2004 में

7. राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग की संरचना में शामिल है?
  • (a) एक अध्यक्ष
  • (b) एक अध्यक्ष एवं एक उपाध्यक्ष
  • (c) तीन सदस्य
  • (d) विकल्प B और C
(d) विकल्प B और C

8. अनुसूचित जनजाति शब्द का पहली बार प्रयोग किया गया?
  • (a) भारत शासन अधिनियम-1919
  • (b) भारत शासन अधिनियम-1935
  • (c) भारत शासन अधिनियम-1909
  • (d) भारत शासन अधिनियम-1947
(b) भारत शासन अधिनियम-1935

9. भारतीय संविधान के अनुसार अनुसूचित जनजाति का अभिप्राय है?
  • (a) बंजारे एवं घुमक्कड़ों से
  • (b) कृषि आधारित उत्पादों से जुड़े व्यापारियों से
  • (c) आदिवासी अथवा वनवासी समुदास से
  • (d) पूजा पहुती को न मानने वाले
(c) आदिवासी अथवा वनवासी समुदास से

10. राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग वार्षिक प्रतिवेदन सौंपता है?
  • (a) संघ सरकार को
  • (b) राष्ट्रपति को
  • (c) संबंधित राज्य सरकार को
  • (d) उप-राष्ट्रपति को
(b) राष्ट्रपति को

11. राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग से संबंधित कथनों में सत्य है?
  • I जनजातिय मंत्रालय के माध्यम से कार्य संपादित करता है
  • II जनजातियों का पुनर्वास करना आयोग का दायित्व है।
  • III झूम खेती परंपरा को धीरे-धीरे स्थाई खेती में बदलना।
  • IV अनुच्छेद-338 में आयोग का उल्लेख है, किंतु अनुसूचित जनजातियों का नहीं
(a) I, II, IV
(b) I, II, III, IV
(c) I, II, III
(d) II, III

(b) I, II, III, IV

12. राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग से संबंधित है?
  • I केंद्र एवं राज्य सरकार जनजातियों के नीति निर्माण में आयोग से सलाह लेता है।
  • II आयोग के पास किसी भी व्यक्ति को समन जारी करने का अधिकार है।
  • III आयोग एक सिविल न्यायालय की शक्तियां धारण किए हुए है।
  • IV आयोग को सभी न्यायालय एवं कार्यालयों से सार्वजानिक दस्तावेज मांगने का अधिकार प्राप्त है।
(a) IV
(b) I, III
(c) सभी असत्य हैं।
(d) सभी सत्य हैं।

(d) सभी सत्य हैं।

13. आयोग का वार्षिक प्रतिवेदन संबंधित कथनों में सत्य है?
  • I इसे राष्ट्रपति लोकसभा के पटल पर रखते हैं।
  • II आयोग प्रत्येक सदन के समझ प्रस्तुत करता है।
  • III राष्ट्रपति प्रतिवेदन पर केवल हस्ताक्षर करते हैं।
  • IV राज्य विशेष का उल्लेख होने पर मुख्यमंत्री को भेजा जाता है।
(a) I, III, IV
(b) II, III
(c) सभी असत्य हैं।
(d) सभी सत्य हैं।

(c) सभी असत्य हैं।

14. उपर्युक्त में सत्य हैं?
  • I अनुसूचित जनजाति कल्याण के लिए 2002 में दिलीप सिंह भूरिया आयोग का गठन हुआ।
  • II इस अयोग ने 2004 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की।
  • III अनुसूचित जनजाति कल्याण की योजना बनाने का अधिकार केंद्र के पास है।
  • IV संविधानुसार संविधान लागू होने के 10 वर्ष के भीतर राष्ट्रपति द्वारा आयोग गठन अनिवार्य है।
(a) I, II
(b) I, II, III
(c) I, II, III, IV
(d) केवल IV

(c) I, II, III, IV

15. उक्त कथनों में सत्य का चयन करें
  • I किसी जाति को अनुसूचित जनजाति माना जाएगा यह अधिकार राष्ट्रपति को है।
  • II संविधान में उल्लेख नहीं कि किनको अनुसूचित जनजाति निरूपित किया जाए।
  • III जनजातियों के संबंध में अधिसूचना जारी करने का अधिकार आयोग के पास है।
  • IV अधिसूचना में जनजातियों को राष्ट्रपति द्वारा जोड़ा जाता है। आयोग की सलाह पर।
(a) I, II
(b) I, III
(c) I,II,III
(d) सभी असत्य है।

(a) I, II

16. देश के विभिन्न राज्यों एवं संघ शासित क्षेत्रों में कितनी जनजातियों की पहचान की गई है?
  • (a) 700 से कम
  • (b) 700 से अधिक
  • (c) 500 करीब
  • (d) 600 से अधिक
(b) 700 से अधिक

17. भारतीय संविधान के किस अनुच्छेद द्वारा जनजातियों को अधिसूचित किया जाता है?
  • (a) अनुच्छेद 342
  • (b) अनुच्छेद 338
  • (c) अनुच्छेद 338 क
  • (d) अनुच्छेद 17
(a) अनुच्छेद 342

18. देश के किस राज्य में सर्वाधिक संख्या में जनजातियां समुदाय विनिर्दिष्ट है।
  • (a) मप्र
  • (b) उड़ीसा
  • (c) पश्चिम बंगाल
  • (d) महाराष्ट्र
(b) उड़ीसा

19. राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के कर्तव्य /कार्य का वर्णन किया गया है।
  • (a) अनुच्छेद 338 क (2)
  • (b) अनुच्छेद 338 क (1)
  • (c) अनुच्छेद 338 क (3)
  • (d) अनुच्छेद 338 क (5)
(d) अनुच्छेद 338 क (5)

20. आयोग के पास अन्वेषण, जांच एवं सिविल न्यायालय की शक्तियां है? उनका वर्णन है...
  • (a) अनुच्छेद 338 क (5)
  • (b) अनुच्छेद 338 क (4)
  • (c) अनुच्छेद 338 क (8)
  • (d) अनुच्छेद 338 क (9)
(c) अनुच्छेद 338 क (8)

21. भारतीय संविधान के अनुसार आयोग का कर्तव्य होगा?
  • (a) सुरक्षा उपायो से संबंधित मामलों की जांच करना 
  • (b) व्यक्ति विशेष को समन जारी करना
  • (c) सार्वजनिक रिकॉर्ड की प्रति प्राप्त करना
  • (d) उपरोक्त सभी सही हैं
(d) उपरोक्त सभी सही हैं

22. आयोग के अध्यक्ष को दर्जा प्राप्त होता है?
  • (a) केन्द्रीय सचिव का
  • (b) राज्य मंत्री का दर्जा
  • (c) केन्द्रीय मंत्री का
  • (d) महान्यायवादी का
(a) केन्द्रीय सचिव का

23. आयोग के उपाध्यक्ष को दर्जा प्राप्त होता है?
  • (a) केन्द्रीय सचिव का
  • (b) राज्य मंत्री का
  • (c) केन्द्रीय मंत्री का
  • (d) महान्यायवादी का
(b) राज्य मंत्री का

24. आयोग के अन्य सभी सदस्यों को दर्जा प्राप्त होता है?
  • (a) केन्द्रीय सचिव का
  • (b) राज्य मंत्री का
  • (c) केन्द्रीय मंत्री का
  • (d) कोई नहीं
(a) केन्द्रीय सचिव का

25. अनुसूचित जनजाति आयोग बनने से पूर्व यह जाना जाता था?
  • (a) एक सदस्यीय आयोग के तौर पर
  • (b) बहु-सदस्यीय आयोग
  • (c) पांच सदस्यीय आयोग के तौर पर
  • (d) इनमें से कोई नहीं
(b) बहु-सदस्यीय आयोग

26. राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग को निम्न में से किस को जनजातियों के नीति निर्माण में सलाह देता है?
  • (a) केन्द्रीय सरकार को
  • (b) राज्य सरकार को
  • (c) केन्द व राज्य दोनों सरकारों को
  • (d) किसी को नहीं
(c) केन्द व राज्य दोनों सरकारों को
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