भारत का संविधान - bharat ka samvidhan

प्रस्तावना

इस बात के ऐतिहासिक प्रमाण हैं कि जब राज्य का उद्भव हुआ या यह कहा जाये कि जब मनुष्य ने संगठित रुप से रहना प्रारम्भ किया अर्थात राज्य रुपी संस्था, अपने अनगढ़ रुप में ही सही, अस्तित्व में आयी उसी के साथ ही राज्य व जनता के आपसी रिश्तों को संचालित करने के लिए कुछ नियमों को लिखित अथवा अलिखित रुप में स्वीकार किया गया। जिसे संविधान का प्राचीनतम रुप माना जा सकता है।
इस बात की पुष्टि इस ऐतिहासिक तथ्य से की जा सकती है कि आज से लगभग ढ़ाई हजार वर्ष पूर्व यूनानी राजनीतिक विचारक अरस्तु ने 158 राज्यों के संविधानों का तुलनात्मक अध्ययन कर संविधानों के वर्गीकरण का प्रथम प्रयास किया था।

उद्देश्य

इस लेख को पढ़ने के उपरान्त आप
  • संविधान, उसकी परिभाषा उसकी आवश्यकता और संविधानों के वर्गीकरण के विषय में जान पायेंगे।
  • संविधानिक सरकार के बारे में जान पायेंगे।
  • संविधानवाद, संविधानवाद की अवधारणा, उसके तत्व और विशेषताओं के विषय में जान पायेंगे।

संविधान की आवश्यकता

किसी भी देश में निम्न कारणों से संविधान की आवश्यकता होती है:-
  • शासन की शक्तियों को संविधान द्वारा ही सीमित किया जा सकता है।
  • राजतंत्र और कुलीन तंत्रीय शासनों में अत्याचारों के अनुभवों ने संविधान की आवश्यकता को स्पष्ट कर दिया है।
  • व्यक्ति और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए भी संविधान आवश्यक है।
  • वर्तमान और भावी पीड़ी की स्वेच्छा पर नियंत्रण के लिए संविधान आवश्यक है।

संविधान का अर्थ और परिभाषाएँ

संविधान अंग्रेजी शब्द ‘कान्स्टीट्यूशन का हिन्दी रूपान्तर है। जिस प्रकार मानव शरीर के संदर्भ में कान्स्टीट्यूशन का अर्थ शरीर के ढाँचे व गठन से होता है, उसी प्रकार राजनीति विज्ञान में 'कान्स्टीट्यूशन का तात्पर्य राज्य के ढाँचे तथा संगठन से होता है। अतः राज्य के संविधान में राज्य की सरकार के विभिन्न अंगो, उनके संगठन व शक्तियों, जनता के अधिकारों आदि का उल्लेख रहता है। राज्य का रूप चाहे किसी भी प्रकार का हो, आवश्यक रूप से उसका एक संविधान होता है। आवश्यक नहीं है कि संविधान लिखित ही हो। आवश्यक यह है कि कुछ ऐसे नियमों का अस्तित्व हो, जिनके द्वारा देश की शासन-व्यवस्था के ढाँचे को निर्धारित किया जा सके और सरकार की कार्यप्रणाली के विषय में जाना जा सके।
राज्य के लिए संविधान की अनिवार्यता बतलाते हए जैलीनेक ने कहा कि “संविधानहीन राज्य की कल्पना नहीं की जा सकती, संविधान के अभाव में राज्य, राज्य न होकर एक प्रकार की अराजकता होगी। इसी प्रकार शुल्टज कहते हैं कि “राज्य कहलाने का अधिकार रखने वाले हर समाज का संविधान अवश्य होना चाहिए, अर्थात ऐसे सिद्धान्तों की संहिता होनी चाहिए जो सरकार और प्रजा के संबंध निश्चित करें और जिनके अनुसार राज्य अपनी शक्ति का प्रयोग करें।“ यह एक वैधानिक उपकरण है जिसे भिन्न नामों जैसे-राज्य के नियम, शासन का उपकरण, देश का मौलिक कानून, राज्य व्यवस्था का आधारभूत-विधान, राष्ट्र-राज्य की आधारशिला आदि से भी जाना जाता है। किन्तु इसके लिए सर्वाधिक उपयुक्त शब्दावली ‘संविधान ही है।

परिभाषाएँ

  • गिलक्राइस्ट के अनुसार “संविधान उन लिखित या अलिखित नियमों अथवा कानूनों का समूह होता है जिनके द्वारा सरकार का संगठन, सरकार की शक्तियों का विभिन्न अंगों में वितरण और इन शक्तियों के प्रयोग के सामान्य सिद्धान्त निश्चित किये जाते हैं।"
  • डायसी के अनुसार “संविधान उन समस्त नियमों का संग्रह है जिनका राज्य की प्रभुत्व सत्ता के प्रयोग अथवा वितरण पर प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से प्रभाव पड़ता है। "
  • वल्जे के अनुसार “संविधान नियमों के उस समूह को कहते हैं जिसके अनुसार सरकार की शक्तियों, शासितों के अधिकारों और इन दोनों के पारस्परिक संबंधों के विषय में सामंजस्य स्थापित किया जाता हैं।
  • फाइनर के अनुसार “संविधान आधारभूत राजनीतिक संस्थाओं की व्यवस्था होती है।"
  • गैटिल के अनुसार “वे मौलिक सिद्धान्त, जिनके द्वारा किसी राज्य का स्वरूप निर्धारित होता है,
  • संविधान कहलाता है।"
  • ब्राइस के अनुसार “संविधान ऐसे निश्चित नियमों का एक संग्रह होता है, जिनमें सरकार की कार्यविधि प्रतिपादित होती है और जिनके द्वारा उसका संचालन होता है।"
  • चार्ल्स बर्गेन्ड के अनुसार “संविधान एक आधारभूत कानून होता है, जिसके द्वारा किसी राज्य की सरकार संगठित की जाती है और जिसके अनुसार व्यक्तियों अथवा नैतिक नियमों का पालन करने वाले मनुष्य तथा समाज के पारस्परिक संबंध निर्धारित किये जाते है।"

संविधान का विकास

'संविधान के निर्माण के संदर्भ में पूर्णतः यह नहीं कहा जा सकता कि इसका निर्माण एक निश्चित समय में विचार-विमर्श करके किया गया है। संविधान को चाहे कितना ही विचार-विमर्श करके बनाया जाए, लेकिन यह अपनी प्रकृति से विकास का परिणाम है। इसके विकास में कई महत्वपूर्ण तत्व सहायक होते हैं।
  • प्रथाएँ और परम्पराएँ प्रथाओं और परम्पराओं ने संविधान के विकास को दिशा दी है। ग्रेट ब्रिटेन का संविधान तो अधिकांशतः प्रथाओं और परम्पराओं के द्वारा ही निर्मित है, परन्तु अन्य देशों के संविधानों जैसे संयुक्त राष्ट्र अमेरिका, भारत, स्विट्जरलैण्ड आदि को भी प्रथाओं और परम्पराओं से प्रभावित देखा जा सकता है। प्रथाएँ और परम्पराएँ मानव सभ्यता के विकास से हैं, जिनके साथ व्यक्ति भावनात्मक रूप से जुड़ा है। संविधान के निर्माण विकास के बाद भी व्यक्ति ने अपनी प्रथाओं और परम्पराओं के साथ जीना नहीं छोड़ा, जिस कारण संविधान के विकास में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
  • न्यायाधीशों के निर्णय न्यायाधीशों के द्वारा संविधान के विभिन्न उपबन्धों के संबंध में दिए गये निर्णयों और व्याख्याओं से भी संविधान के विकास को गति मिलती है। भारत एवं संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधानों में इसे देखा जा सकता है राज्य अमेरिका के विषय में तो यहाँ तक कहा जाता है कि “संविधान वही है, जो न्यायाधीश कहते हैं।"
  • संशोधन प्रक्रिया संविधान में संशोधन के लिए जो संशोधन विधि वर्णित होती है उसके आधार पर संविधान में बहुत से संशोधन समय-समय पर होते रहते हैं। संविधान में संशोधनों के माध्यम से कई देशों ने मौलिक अधिकारों को संविधान का महत्वपूर्ण अंग बना दिया है। अतः संशोधन प्रक्रिया के माध्यम से भी संविधान के विकास का मार्ग प्रशस्त होता है।
संविधान का विकास इस आधार पर होना चाहिए कि उसमें समय-समय पर आने वाली परिस्थितियों से निपटने की क्षमता होनी चाहिए।

संविधानों का वर्गीकरण

संविधानों का तीन आधारों पर वर्गीकरण किया जा सकता है-

उत्पत्ति के आधार पर
उत्पत्ति के आधार पर संविधान दो प्रकार के होते है-विकसित और निर्मित संविधान विकसित संविधान विकसित संविधान वे हैं, जिनका निर्माण संविधान-सभा जैसी किसी संस्था द्वारा निश्चित समय पर नहीं किया जाता वरन् ये संविधान विभिन्न परम्पराओं, रीति-रिवाजों, प्रथाओं और न्यायालयों के निर्णय पर आधारित होता हैं। इग्लैण्ड का संविधान विकसित संविधान का श्रेष्ठ उदाहरण है। वहाँ राजा, मंत्रिपरिषद, संसद अथवा अन्य राजनैतिक संस्थाओं की शक्ति और उनके अधिकार क्षेत्र आदि लेखबद्ध नहीं है तथा न उनसे संबंधित नियमों का एक समय निर्माण किया गया है। वस्तुतः ब्रिटिश संविधान का वर्तमान स्वरूप उसके पन्द्रह सौ वर्षों के संवैधानिक विकास का परिणाम है। इसी कारण प्रो0 मुनरो ने लिखा है कि ब्रिटिश-संविधान कोई पूर्णतया प्राप्त वस्तु न होकर एक विकासशील वस्तु है। यह बुद्धिमता और संयोग की सन्तान है जिसका मार्गदर्शन कहीं आकस्मिकता और कहीं उच्चकोटि की योजनाओं ने किया है।
निर्मित संविधान वे संविधान होते हैं, जिनका निर्माण एक विशेष समय पर संविधान सभा जैसी किसी विशेष संस्था के द्वारा किया जाता है। निर्मित-संविधान स्वाभाविक रूप से लिखित होते हैं और साधारणतया कठोर भी। ‘अमरीका का संविधान विश्व का प्रथम निर्मित संविधान है, जिसे सन् 1787 ई0 के फिलोडेलफिया सम्मेलन में निर्मित किया गया था। स्विटजरलैण्ड का संविधान भी निर्मित है, जिसका प्रारूप 1848 में 14 सदस्यों के एक आयोग द्वारा तैयार किया गया था और इस प्रारूप में 1874 में व्यापक परिवर्तन किये गये। भारत के संविधान को संविधान-सभा ने लगभग तीन वर्षों (9 दिसम्बर 1946 से 26 नवम्बर 1949) के परिश्रम के बाद तैयार किया किन्तु यह लागू हुआ 26 जनवरी 1950 से। 1982 का नया चीनी संविधान भी निर्मित संविधानों की श्रेणी में आता है, जिसका निर्माण विशेष रूप से नियुक्त की गयी एक समिति तथा जनवादी-कांग्रेस ने किया। उपयुक्त विकसित तथा निर्मित संविधानों के अपने-अपने गुण-दोष भी देखने को मिलते हैं- जैसे विकसित संविधान में गतिशीलता होने की विशेषता है। यह लोगों की आवश्यकताओं तथा आंकाक्षाओं के अनुकूल सदा परिवर्तन की प्रक्रिया में रहता है, परन्तु दोष इसका यह है कि ये असंख्य अलग-अलग व बिखरे हुए प्रपत्रों तथा राजनीतिक रीति-रिवाजों के रूप में रहता है। अतः इसमें निश्चितता नहीं होती है। इसी तथ्य को ध्यान में रखकर टामसपैन जैसे एक अमरीकी विचारक तथा डी0टाकविले जैसे एक फ्रांसीसी इतिहासकार ने यह मत प्रकट किया कि 'इंगलैण्ड में कोई संविधान नही हैं।"
इसके विपरीत निर्मित संविधान सर्वथा सुनिश्चित होता है। संहिताबद्ध रूप में होने के कारण यह सदा लोगों के लिए महान सुविधा का स्रोत होता है, परन्तु इग्लैण्ड के लोग इस तथ्य के बावजूद अपने संविधान पर गर्व करते हैं।

प्रथाओं और कानूनों के आधार पर
इस आधार पर दो प्रकार के संविधान होते हैं - लिखित संविधान व अलिखित संविधान
लिखित संविधान वे संविधान होते हैं, जिनके प्रावधान विस्तारपूर्वक लिखे होते है। अमरीका, स्विट्जरलैण्ड, फ्रांस, रूस, जापान, चीन, भारत आदि देशों के संविधान लिखित-संविधानों के श्रेष्ठ उदाहरण हैं।
अमरीका का संविधान विश्व का प्रथम लिखित संविधान है, जिसमें केवल 4000 शब्द हैं, जो 10 या 12 पृष्ठों में मुद्रित हैं और जिन्हें आधे घण्टे में पढ़ा जा सकता है। यह विश्व के लिखित संविधानों में सर्वाधिक संक्षिप्त है। इसमें केवल 7 अनुच्छेद हैं। भारत का संविधान विश्व के लिखित संविधानों में सबसे विस्तृत हैं। इसमें कोई 90,000 शब्द हैं। भारतीय संविधान में 445 अनुच्छेद एवं 12 अनुसूचियाँ हैं। भारत के मूल संविधान में 395 अनुच्छेद व 8 अनुसूचियाँ थी। स्विस संविधान में 123 अनुच्छेद है, जो 3 अध्यायों में बँटा है। चीन के नये संविधान में एक प्रस्तावना तथा 138 अनुच्छेद हैं जो 4 अध्यायों में बँटा है।
अलिखित संविधान वे संविधान होते हैं, जिसके लिखित प्रावधान बहुत संक्षिप्त होते हैं तथा संविधान के अधिकांश नियमों का अस्तित्व व्यवहारों व प्रथाओं के रूप में होता है। ब्रिटेन का संविधान, अलिखित संविधान का सर्वोत्तम उदाहरण है और अलिखित संविधान की व्यवस्था से ब्रिटेन को कोई हानि न होकर लाभ ही हुआ है।

संविधान में संशोधन के आधार पर
इस आधार पर संविधान के दो भेद हैं - लचीला संविधान और कठोर संविधान।
लचीला संविधान यदि सामान्य कानून और संवैधानिक कानून के बीच कोई अन्तर न हो और संवैधानिक कानून में भी सामान्य कानून के निर्माण की प्रक्रिया से ही संशोधन-परिवर्तन किया जा सके, तो संविधान को लचीला या परिवर्तनशील कहा जायेगा। गार्नर के शब्दों में लचीला संविधान वह है जिसको साधारण कानून से अधिक शक्ति एवं सत्ता प्राप्त नहीं है और जो साधारण-कानून की भॉति ही बदला जा सकता है, चाहे वह एक प्रलेख या अधिकांशत परम्पराओं के रूप में हो।"
लचीले संविधान के उदाहरण स्वरूप हम इंग्लैण्ड के संविधान को ले सकते हैं। इग्लैण्ड में संसद, जिस प्रक्रिया द्वारा सड़क पर चलने के नियमों या मद्य-निषेध के नियमों में परिवर्तन करती है, बिल्कुल उसी प्रक्रिया के आधार पर संवैधानिक कानूनों में परिवर्तन कर सकती है। दूसरे शब्दों में ये दोनों काम संसद के साधारण बहुमत द्वारा सम्पन्न किये जा सकते हैं।
चीन का संविधान भी इसी श्रेणी में आता है क्योंकि इसमें साधारण कानून निर्माण प्रक्रिया से ही संशोधन किया जा सकता है। संविधान के अनुच्छेद 64 में संशोधन की प्रक्रिया वर्णित है। संविधान में संशोधन का प्रस्ताव राष्ट्रीय जनवादी कांग्रेस की स्थायी समिति द्वारा या राष्ट्रीय जनवादी कांग्रेस के 1/5 सदस्यों द्वारा रखा जाना चाहिए तथा यह प्रस्ताव राष्ट्रीय जनवादी कांग्रेस के कुल सदस्यों के 2/3 बहुमत से स्वीकृत होना चाहिए।
ज्ञातव्य है कि चीन की राष्ट्रीय-जनवादी कांग्रेस विश्व का सबसे बड़ा एकसदनात्मक विधायी सदन है क्योंकि इसके सदस्यों की उपस्थिति नये संविधान (1982) को स्वीकृत करते समय 3,037 थी।
कठोर संविधान से अभिप्राय उस संविधान से है जिसमें संशोधन के लिये किसी विशेष प्रक्रिया को प्रयुक्त किया जाता है। कठोर-संविधान में संवैधानिक एवं साधारण कानून में मौलिक भेद समझा जाता है तथा इसमें संवैधानिक कानूनों में संशोधन-परिवर्तन के लिए साधारण कानूनों के निर्माण से भिन्न प्रक्रिया, जो साधारण कानून के निर्माण की पद्धति से कठिन होती है, अपनाना आवश्यक होता है। सरल शब्दों में व्यवस्थापिका जिस विधि अथवा प्रक्रिया से साधारण कानूनों को पारित करती है, उसी विधि से संविधान में संशोधन नहीं कर सकती है। कठोर संविधान के उदाहरण स्विट्जरलैण्ड, आस्ट्रेलिया, रूस, इटली, फ्रांस, डेनमार्क, स्वीडन, नार्वे, जापान तथा भारत के संविधान हैं। किन्तु इसका सबसे अच्छा उदाहरण संयुक्त राज्य अमेरिका का संविधान है। वहाँ पर संविधान में संशोधन के लिए कांग्रेस (प्रतिनिधि सभा 435, सीनेट 100) के 2/3 बहुमत तथा 3/4 राज्यों के विधानमण्डलों की स्वीकृति आवश्यक हैं। इसी का परिणाम यह हुआ है कि 211 वर्षों में केवल 26 संशोधन किये जा सके हैं। यहाँ यह सूच्य है कि अमेरिका में संविधान के अनुच्छेद 5 में संशोधन प्रक्रिया वर्णित है।
स्विट्जरलैण्ड के संविधान में संशोधन की प्रक्रिया भारत से जटिल है किन्तु अमरीका की तुलना में कम कठोर है। संविधान में संशोधन का प्रस्ताव स्विस व्यवस्थापिका (संघीय सभा) के दोनों सदनो (राष्ट्रीय परिषद 200 एवं राज्य परिषद 44) के बहुमत द्वारा पास होना चाहिए और उसके बाद उसका समर्थन मतदाताओं तथा कैन्टनों (राज्य) के बहुमत से होना चाहिए।

संवैधानिक सरकार

संविधानिक सरकार से तात्पर्य ऐसी सरकार से है जो संविधान की व्यवस्थाओं के अनुसार गठित, नियंत्रित व सीमित हो तथा व्यक्ति विशेष की इच्छाओं के स्थान पर विधि के अनुरुप ही संचालित होती हो। सामान्यतया ऐसा समझा जाता है कि जिस राज्य में संविधान हो वहाँ संवैधानिक सरकार भी होती है। हर राज्य में किसी न किसी प्रकार का संविधान तो होता ही है पर संविधानिक सरकार भी हो ऐसा आवश्यक नहीं है। हिटलर व स्तालिन के समय जर्मनी व रुस में संविधान तो थे पर संवैधानिक सरकारें भी थी ऐसा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि इन देशों का राजनीतिक आचरण संविधान पर आधारित न होकर व्यक्ति या राजनीतिक दल की महत्वाकांक्षाओं पर आधारित थी। संवैधानिक सरकारें विधि के अनुरुप व लोक कल्याण पर आधारित होती हैं। अतः राज्य में केवल संविधान का हेना मात्र सरकार को संवैधानिक नहीं बनाता है। केवल वही सरकार संवैधानिक सरकार कही जायेगी जो संविधान पर आधारित हो। संविधान द्वारा सीमित व नियंत्रित हो व निरंकुशता के स्थान पर विधि के अनुरुप ही संचालित हो।

संविधानवाद

संविधानवाद एक आधुनिक विचारधारा है जो विधि द्वारा नियन्त्रित राजनीतिक व्यवस्था की स्थापना पर बल देती है।
संविधानवाद पर विद्वानों ने अपने- अपने विचार व्यक्त किये हैं -
  1. पिनॉक व स्मिथ “संविधानवाद उन विचारों की ओर संकेत करता है जो संविधान का विवेचन व समर्थन करते हैं तथा जिनके माध्यम से राजनीतिक शक्ति पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करना सम्भव होता है।"
  2. पीटर एच0 मार्क “संविधानवाद का तात्पर्य सुव्यवस्थित और संगठित राजनीतिक शक्ति को नियंत्रण में रखना है।"
  3. कार्ल जे0 फ्रेडरिक “शक्तियों का विभाजन सभ्य सरकार का आधार है, यही संविधानवाद है।"
  4. कॉरी और अब्राहम “स्थापित संविधान के निर्देशों के अनुरुप शासन को संविधानवाद कहते हैं।"
  5. जे0 एस0 राउसेक “धारणा के रुप में संविधानवाद का अर्थ है कि यह अनिवार्य रुप से सीमित सरकार तथा शासित तथा शासन के ऊपर नियंत्रण की एक व्यवस्था है। "
  6. के0सी0 व्हीयर “संवैधानिक शासन का अर्थ किसी शासन के नियमों के अनुसार शासन चलाने से अधिक कुछ नहीं है। इसका अर्थ है कि निरंकुश शासन के विपरीत नियमानुकूल शासन। केवल अधिकार का उपयोग करने वालों की इच्छा और क्षमता के अनुसार चलने वाला शासन नहीं बल्कि संविधान के नियमों के अनुसार चलने वाला शासन होता है।"
उपरोक्त परिभाषाओं का विश्लेषण करने पर स्पस्ट होता है कि संविधानवाद सीमित शासन का प्रतीक है।

संविधानवाद की अवधारणाएँ

वर्तमान में संविधानवाद की तीन प्रचलित अवधारणाएँ है
  • पाश्चात्य अवधारणा, जो लोकतांत्रिक पूँजीवादी राज्यों में विशेष रुप से प्रचलित है।
  • साम्यवादी अवधारणा, यह प्रायः साम्यवादी विचारधारा पर आधारित राज्यों में प्रचलित है।
  • विकासशील लोकतांत्रिक अवधारणा, यह उन राज्यों में अस्तित्व ग्रहण कर रही है, जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद स्वतंत्र हुए है और प्रायः ‘तृतीय विश्व के नाम से जाने जाते है।

संविधानवाद की पाश्चात्य अवधारणा
संविधानवाद की पाश्चात्य अवधारणा को उदारवादी लोकतांत्रिक अवधारणा भी कहा जाता है। यहाँ साध्य ‘व्यक्ति स्वतंत्रता व साधन ‘सीमित सरकार को माना गया है। एक प्रकार से यह ‘राज्य व व्यक्ति के बीच समन्वयात्मक व सहजीवी दृष्टिकाण को स्वीकार करता है। यहाँ व्यक्तिगत स्वच्छन्दता व राज्य-निरंकुशता दोनों को अस्वीकार किया गया है। किन्तु समन्वयवादी दृष्टिकोण के बावजूद राज्य शक्ति को संस्थात्मक व प्रक्रियात्मक प्रतिबंधों के आधार पर नियंत्रित करने पर अधिक बल दिया गया है। चूकि उदारवादी लोकतंत्र का साध्य व्यक्ति है और साधन राज्य शक्ति, अतः यहाँ इस बात पर विशेष ध्यान दिया गया है कि साध्य पर साधन हावी न होने पाये। पाश्चात्य अवधारणा इस साध्य की प्राप्ति हेतु निम्नांकित साधनों का प्रयोग करती है।

सीमित व उत्तरदायी सरकार
संविधानवाद का लक्ष्य चूकि व्यक्ति स्वतंत्रता की राज्य की निरकुंशता से रक्षा करना है। अतः संविधानवाद विविध माध्यमों से सरकार पर अंकुश आरोपित करता है। सरकार को सीमित क्षेत्र में ही अपने क्रियाकलापों को क्रियान्वित करने की इजाजत दी जाती है। साथ ही सरकार को उत्तरदायी बनाने पर जोर दिया जाता है। इन दो साधनों के द्वारा संविधानवाद के मूल लक्ष्य को प्राप्त करने का प्रयास किया गया है।

विधि का शासन
सीमित सरकार के लक्ष्य प्राप्ति के लिए विधि का शासन होना नितांत आवश्यक है। विधि के शासन से तात्पर्य है कि राज्य में व्यक्ति का शासन नही अपितु नियम कानून के द्वारा शासन होना चाहिए। विधि के शासन का विचार यद्यपि काफी प्राचीन है, प्लेटो के ग्रंथ 'लॉज व अरस्तु के पॉलिटिक्स · में इसका प्रारम्भिक स्वरुप मिलता है, लेकिन आधुनिक युग में विधिवत रुप में इसकी स्थापना का श्रेय ब्रिटिश राजनीतिक विद्वान डायसी को जाता है। विधि के शासन में प्रायः दो बातों का समावेश किया जाता है- 1) विधि के समक्ष समानता 2) विधि का समान संरक्षण। पहली स्थिति का तात्पर्य है कि विधि की दृष्टि में राज्य का प्रत्येक व्यक्ति समान माना जायेगा, चाहे उसकी पद प्रतिष्ठा कुछ भी क्यों न हो। विधि का उल्लेख करने पर समान दण्ड की व्यवस्था होगी। डायसी ने बड़े गर्व से इस बात को रखा था कि ब्रिटेन में विधि का शासन है वहाँ प्रधानमंत्री से लेकर कृषक तक सभी विधि के समक्ष समान है। संविधानवाद व्यक्ति के कल्याण की बात करता है और समानता के बिना यह सम्भव नही है अतः विधि के समक्ष समानता संविधानवाद का अनिवार्य लक्षण बन जाता है। जहाँ तक दूसरी स्थिति, विधि का समान संरक्षण का सम्बन्ध है, यहाँ यह व्यवस्था है कि ‘समानो के मध्य समानता। अर्थात यदि किसी विशेष परिस्थिति में ‘तर्कपूर्ण विभेद किया जाता है तो वह स्वीकार्य होगा। किन्तु उल्लेखनीय है कि विभेद मनमाना या गैरतार्किक नहीं होना चाहिए।

मौलिक अधिकारों की व्यवस्था
संविधानवाद की पाश्चात्य धारणा मौलिक अधिकारों की मांग करती है। प्रत्येक उदारवादी लोकंतात्रिक देश के संविधान में इनकी व्यवस्था को प्राथमिकता दी जाती है। इसके तहत् कई प्रकार के अधिकारों को लिया जाता है- स्वतंत्रता का अधिकार, जिसमें विचार, अभिव्यक्ति, अन्तःकरण, धर्म स्वीकारने की स्वतंत्रता, राजनीति में सहभागिता की स्वतंत्रता, आर्थिक क्षेत्र में स्वतंत्रता, आदि को प्रमख रुप से लिया जाता है। इसी प्रकार समानता के अधिकार को स्थान दिया गया है। मौलिक अधिकारों की सूची भिन्न-भिन्न राष्ट्रों में भिन्न-भिन्न है। मौलिक अधिकारों को सर्वप्रथम सन् 1791 ई0 में प्रथम दस संशोधनों के द्वारा अमेरिकी संविधान में जगह दी गयी। उसके बाद जितने भी उदारवादी देशों में संविधान बने, लगभग सभी में मौलिक अधिकारों को स्थान दिया है।

स्वतंत्र व निष्पक्ष न्यायपालिका
न्याय की उचित व्यवस्था न होने पर मौलिक अधिकारों की व्यवस्था का कोई औचित्य नहीं रह जाता है। अतः संविधानवाद मौलिक अधिकारों के साथ स्वतंत्र व निष्पक्ष न्यायपालिका की मांग करता है। सरकार की निरंकुशता पर अंकुश लगाने व नागरिक अधिकारों की रक्षा करने के लिए निष्पक्ष न्यायपालिका की व्यवस्था होनी चाहिए। न्यायपालिका के महत्व को समझाते हुए पीटर एच0 मार्क ने कहा कि स्वतंत्र न्यायपालिका आधुनिक संवैधानिक सरकार के सर्वाधिक महत्वपूर्ण लक्ष्यों में से एक है। न्यायपालिका की निष्पक्षता व स्वतंत्रता बनाये रखने के लिए विभिन्न देशों में न्यायाधीशों की नियुक्ति, कार्यावधि, वेतन आदि के सम्बन्ध में ऐसे विशेष प्रावधान किये हैं। न्यायपालिका को न्यायिक पुनरावलोकन का अधिकार भी दिया जाता है। वस्तुतः जैसा कि कार्टर और हर्ज ने भी उल्लेख किया है, “मूल अधिकार व स्वतंत्र न्यायपालिका प्रत्येक संविधानवाद की अनिवार्य विशेषता है।"

शक्ति पृथ्थककरण और शक्ति विभाजन
संविधानवाद की पाश्चात्य अवधारणा का शक्ति पृथ्थककरण व शक्ति विभाजन में अटूट विश्वास है। शक्ति पृथ्थककरण से तात्पर्य है कि सरकार के तीनों अंगों -व्यवस्थापिका, कार्यपालिका व न्यायपालिका की शक्तियों को पृथक-पृथक हाथों में दिया जाना चाहिए। चूँकि यदि ये तीनों शक्तियाँ किसी एक के हाथ में पड़ जायेंगी तो सत्ताधारी की मनमानी होगी और उसकी स्वार्थपरता को बढावा मिलेगा और निश्चित रुप से ऐसे में व्यक्ति स्वतंत्रता खतरे में पड़ जायेगी। अतः शक्तियों के एक हाथ में जाने से रोकना संविधानवाद की मुख्य मॉग है। दसरी बात, संविधानवाद शक्तियों के विभाजन की मॉग भी करता है। अर्थात, शक्तियों को केन्द्र व राज्य या क्षेत्रीय स्तर पर वितरण किया जाता ताकि निम्न स्तर से उच्च स्तर तक शक्तियों का व्यक्तियों के अधिकतम कल्याण में प्रयोग किया जा सके। इस प्रकार शक्तियों का पृथ्थककरण, विभाजन व विकेन्द्रीकरण पाश्चात्य संविधानवाद की परम्परा का मुख्य अंग है।

नियत-कालिक व नियमित निर्वाचन व्यवस्था
राजनीतिक उत्तरदायित्व पाश्चात्य संविधानवाद का अनिवार्य तत्व है और उत्तरदायित्व निर्धारण का तरीका नियत कालिक व नियमित निर्वाचन व्यवस्था में ढूढा गया है। पाश्चात्य संविधानवाद ‘लोकतंत्र के आदर्श मे विश्वास करता है। लोकतंत्रात्मक व्यवस्था में व्यक्ति अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से अपनी राजनीतिक इच्छा को अभिव्यक्त करता है चूँकि वर्तमान में राज्यों का आकार बड़ा होने के कारण प्रधिनिधियात्मक लोकतंत्र को ही राज्यों ने अपनाया है। अतः प्रतिनिधि जिन वायदों के साथ संसद में प्रवेश करते हैं उनके प्रति प्रतिबद्ध रहें। इसके लिए केवल एकमात्र तरीका यही बचता है कि निश्चित समयावधि के बाद चुनाव हो। चुनाव नागरिकों के हाथ में वह हथियार है जिससे भय खाकर प्रत्येक सरकार नागरिकों के प्रति अपने उत्तरदायित्व को समझते हुए उनकी इच्छाओं और आवश्यकताओं के प्रति सजग और सचेत बनी रहती है। इस हथियार को प्रभावी तभी रखा जा सकता है जबकि चुनाव नियमित रुप से निश्चित अन्तराल के बाद होते रहें।

राजनीतिक दलों की उपस्थिति
संविधानवाद की पाश्चात्य अवधारणा का विश्वास लोकतांत्रिक शासन पद्यति में है और लोकतंत्र के लिए राजनीतिक दल शरीर में रक्त के समान कार्य करते हैं। दो या दो से अधिक दल होना स्वयं में लोकतंत्र की परिपक्वता का परिचायक होते है यदि अन्य परिस्थितियाँ सामान्य हों। एकदलीय व्यवस्था में लोकतंत्र का औचित्य नहीं रह जाता है। वहाँ लोकतंत्र की आड़ में अधिनायकतंत्र का फैलता है। कई साम्यवादी देशों में ऐसा देखने में मिलता है। राजनीतिक दल सरकार को दिन-प्रतिदिन नियंत्रित रखकर सरकार की अहितकारी नीतिओं का विरोध करते है। प्रतिपक्ष सदैव सत्तापक्ष पर नियत्रंण बनाये रखता है, जो कि संविधानवाद की अनिवार्य मॉग है।

प्रेस की स्वतंत्रता
लोकतंत्र में प्रेस को शासन का चौथा स्तम्भ माना जाता है। प्रेस जनता को अपने विचार अभिव्यक्त करने का शक्तिशाली माध्यम प्रदान करती है। इसलिए पाश्चात्य संविधानवाद, प्रेस को अधिकाधिक स्वतंत्रता प्रदान करने का पक्षधर है। प्रेस की स्वतंत्रता से मात्र इतना तात्पर्य नहीं है कि किसी विषय पर हम अपने विचार सार्वजनिक कर पायें बल्कि प्रेस की वास्तविक स्वतंत्रता से तात्पर्य है कि ‘सूचना प्राप्त करने की स्वतंत्रता व सूचना तक पहुँचने की स्वतंत्रता। इसे आज कई देशों ने ‘सूचना का अधिकार के रुप में स्वीकार कर लिया है। सूचना के अधिकार से व्यक्ति सरकार की नीतियों पर प्रत्यक्ष नजर रख सकता है और सरकार को उत्तरदायी बनने पर मजबूर कर सकता है।

सत्ता परिवर्तन हेतु संवैधानिक उपायों को स्वीकृति
संविधानवाद सत्ता परिवर्तन हेतु संवैधानिक उपायों को स्वीकृति प्रदान करता है। जनता के समक्ष विविध राजनीतिक दल होते हैं, उसे यह स्वतंत्रता है कि वह उस दल के पक्ष में मतदान करे जो उसके आदर्श कल्याण में सहायक हो, जिसकी नीतियों व कार्यविधियों से वह सहमत हो। संविधानवाद ने चुनावों को सत्ता परिवर्तन का संवैधानिक माध्यम घोषित किया है अतः सैनिक विद्रोह या अधिनायकी तांडव से सत्ता पर कब्जा करने के लिए यहाँ कोई स्थान नहीं है। कार्ल जे0 फ्रेडरिक लिखते है “व्यवस्थित परिवर्तन की जटिल प्रक्रियात्मक व्यवस्था ही संविधानवाद है।" सत्ता में शांतिपूर्वक परिवर्तन तभी सम्भव है जबकि नियतकालिक निर्वाचन होगा, एक से अधिक राजनीतिक दलों की उपस्थिति होगी और लोकमत निर्माण व प्रेस की स्वंतत्रता होगी। बदलते परिदृश्य में मूल्यों में भी परिवर्तन होता है अतः ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि राजनीतिक व्यवस्था स्वतः इन मूल्य परिवर्तनों को आत्मसात कर अनुकूल करने में सक्षम हो।

आर्थिक समानता व सामाजिक न्याय पर बल
पाश्चात्य संविधानवाद आर्थिक व सामाजिक व राजनीतिक क्षेत्र में अवसर की समानता पर बल देता है। यद्यपि स्वतंत्रता प्रथम लक्ष्य है तथापि संविधानवाद ऐसी स्वंतत्रता को स्वीकार नहीं करता जो केवल एक व्यक्ति को प्राप्त हो। यहाँ लक्ष्य प्रत्येक व्यक्ति है और जब प्रत्येक व्यक्ति की बात होती है तो वहाँ समानता व न्याय का स्वतः समावेश हो जाता है।

संविधानवाद की साम्यवादी अवधारणा
संविधानवाद की साम्यवादी अवधारणा को मार्क्सवादी अवधारणा भी कहा जाता है। मार्क्सवाद जिस पर पूरा साम्यवादी भवन खड़ा है उसकी कुछ आधारभूत मान्यताएं है। मार्क्सवाद इस बात को लेकर चलता है कि सम्पूर्ण व्यवस्था के मूल में आर्थिक घटक कार्य करता है। आर्थिक घटक से तात्पर्य उत्पादन प्रणाली से है जिसमें दो बातें हैं एक उत्पादन के साधन, दसरे, उत्पादन सम्बन्ध। जिस वर्ग के हाथ में उत्पादन के साधन होते हैं वही शासन करता है। सामाजिक, राजनीतिक सभी व्यवस्थाएँ उसी के अनुरुप चलती हैं। राज्य को शासक वर्ग ने शासित वर्ग के शोषण के यंत्र के रुप में इजाद किया है। अतः राज्य कृत्रिम संगठन है, शोषण का यंत्र है। प्रत्येक समाज दो वर्गो में बँटा होता है सर्वहारा वर्ग व वुर्जआ वर्ग और इन वर्गों के मध्य संघर्ष होता है कभी धीमा तो कभी तेज। तेज संघर्ष क्रांति का प्रतीक होता है। संक्षेप में यह मार्क्सवाद का सार है। यहाँ ध्यान देने योग्य बातें हैंमार्क्सवाद ने राज्य को शोषण का यंत्र बताया है. समाज वर्गों में बँटा है, तथा आर्थिक शक्ति व्यवस्था इसमें जिस वर्ग के पास साधन नहीं हैं उसका शोषण होता है। अब ऐसी समाज व्यवस्था में ‘व्यक्ति की स्वतंत्रता को कैसे बचाया जाये? उसे आर्थिक व सामाजिक न्याय कैसे दिलाया जाये? यह साम्यवादी संविधानवाद इस ध्येय की पूर्ति के लिए निम्नांकित बातों पर बल देता है

वर्ग-विहीन, राज्य विहीन समाज की स्थापना
जब तक वर्गों का अस्तित्व रहेगा तब तक राज्य भी रहेगा क्योंकि राज्य, शासक वर्ग के हाथ में शासितों के शोषण का यंत्र है। समाज चाहे कोई भी रहें जहाँ-जहाँ वर्ग रहे, वहाँ राज्य भी रहा। क्योंकि राज्य की प्रकृति शोषण की है। अत: आम जनता की स्वतंत्रता को यदि बचाना है तो समाज में वर्गों का अस्तित्व समाप्त हो जाना चाहिए, राज्य स्वतः विलुप्त हो जायेगा। वर्ग-विहीन राज्य विहीन समाज में व्यक्ति शोषण से मुक्त स्वंतत्र जीवन जीयेगा।

उत्पादन के साधनों पर समाज पर नियंत्रण
समाज में वर्गों की उत्पत्ति का कारण उत्पादन के साधनों पर किसी वर्ग विशेष का आधिपत्य होना है और वही अन्ततः शोषण का कारण बनता है। अतः संविधानवाद की साम्यवादी धारणा उत्पादन के साधनों को पूरे समाज के नियत्रंण में कर देना चाहती है। ऐसी स्थिति में प्रत्येक व्यक्ति कार्य भी करेगा और प्रतिफल भी पायेगा। समाज का सारी सम्पत्ति पर आधिपत्य होगा। मार्क्स कहता है वर्ग विहीन, राज्य विहीन समाज का यह नारा होगा कि "प्रत्येक से उसकी क्षमता के अनुसार काम लिया जाये और प्रत्येक को उसकी आवश्यकता के अनुसार पारितोषित दिया जाये।

सम्पत्ति के वितरण में समानता
संविधानवाद की साम्यवादी अवधारणा आर्थिक तत्व पर अधिक बल देती है। अतः उसका मत है कि साम्यवादी नारे के अनुरुप व्यवस्था कायम कर दी जाये तो इसमें सम्पत्ति के वितरण में समानता स्वतः आ जायेगी। सम्पत्ति के वितरण में समानता का अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक व्यक्ति को समान मात्रा में सम्पत्ति दे दी जाये, बल्कि इसका अर्थ है कि योग्यता व आवश्यकता के अनुरुप सम्पत्ति का वितरण होगा। जैसा कि लास्की ने भी स्पष्ट किया कि साम्यवादी व्यवस्था यह नही कहती कि एक मजदूर व एक वैज्ञानिक को समान वेतन दिया जाये।

व्यक्ति को ‘अलगाव से बचाने की व्यवस्था
कार्ल मार्क्स ने ‘इकॉनामिक एंड फिलॉसॉफिकल मैनुस्क्रिप्टस ऑफ 1844 में लिखा कि “साम्यवाद का अर्थ निजी सम्पत्ति और मानवीय परायेपन का नितांत उन्मूलन और मानवीय प्रकृति का मानव के लिए यथार्थ विनियोजन है। यह स्वयं खोए हुए मनुष्य की वापसी है, अतः साम्यवाद पूर्ण विकसित प्रकृतिवाद के रुप में मानववाद और पूर्ण विकसित मानववाद के रुप में प्रकृतिवाद है।“ मनुष्य को यंत्र न मानकर उसे मानव माना जाना चाहिए। इसमें मानवीय पराधीनता के प्रत्येक रुप को समाप्त किया जाना लक्ष्य है। अतः प्रत्येक सभ्य समाज को तभी संविधानवादी माना जायेगा जबकि वहाँ उपरोक्त व्यवस्थाएँ विद्यमान हों।

संविधानवाद की विकासशील लोकतांत्रिक अवधारणा
वस्तुतः संविधानवाद की दो ही मौलिक अवधारणाएँ हैं- एक पाश्चात्य व दूसरी साम्यवादी। जिन विद्वानों ने तीसरी अवधारणा को प्रस्तुत किया है वास्तव में वे संविधानवाद को न समझकर विकासशील राज्यों की समस्याओं पर अपना ध्यान केन्द्रित किए हुए है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ‘एशिया, अफ्रीका व लैटिन अमेरिका के नवोदित राज्यों को इस श्रेणी में रखा गया है, इसे प्रायः तृतीय विश्व के नाम से जाना जाता है। इन राज्यों की अपनी आर्थिक, सामाजिक व राजनीतिक समस्याएँ हैं। इन राज्यों में से कुछ ने पाश्चात्य लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था को अपना लिया और उसी के अनुरुप संविधानवाद के मौलिक तत्वों को अंगीकार करने का प्रयास किया है। दूसरी ओर कुछ राज्यों ने साम्यवाद अपना लिया व साम्यवादी अवधारणा के अनुरुप संविधानवाद को अपना लिया। कुछ ऐसे देश भी है जो मिश्रित प्रकार का ढाँचा तैयार किये हुए हैं। अतः यह कहना उचित प्रतीत होता है कि संविधानवाद की तीसरी अवधारणा नहीं है। तीसरी दुनियाँ के देश अपने मूल्यों के अनुरुप उपरोक्त दो मौलिक अवधारणाओं में से एक के प्रति अथवा दोनांके मिश्रित रुप के प्रति अग्रसर है।

संविधानवाद के प्रमुख तत्व

संविधानवाद व्यक्ति स्वतंत्रता की गांरटी देता है संविधान के अस्तित्व में आने के कारण ही व्यक्ति स्वतंत्रता की रक्षा करना है। यहाँ व्यक्ति की स्वतंत्रता को दोहरे खतरे से बचाया जाता है। व्यक्तियों व समाज की ओर से होने वाले खतरे से तथा राज्य की ओर से होने वाले खतरे से बचाया जाता है। यही कारण है कि संविधानवाद की दोनों अवधारणाओं (पाश्चात्य व मार्क्सवादी) मे यद्यपि कई मूलभूत अन्तर है तथापि दोनों व्यक्ति की स्वंतत्रता को उद्देश्य मानते है। पाश्चात्य अवधारणा व्यक्ति को राज्य की निरंकुशता के साथ ही साथ व्यक्ति व समाज वर्गों द्वारा किये जाने वाले शोषण से भी मुक्ति दिलाना चाहते है। यही कारण है कि मार्क्स के दर्शन को स्वतंत्रता का दर्शन कहा जाता है।

राजनीतिक सत्ता पर अंकुश की स्थापना
संविधानवाद सीमित सरकार की धारणा में विश्वास करता है। उसकी मान्यता है कि राजनीतिक सत्ता का प्रयोग इस प्रकार किया जाना चाहिए कि व्यक्ति स्वतंत्रता को क्षति नहीं पहुंचने पाये। 1215 ई0 का मेग्नाकार्टा व 1688 ई0 की रक्तविहीन क्रांति इसी दिशा में प्रयत्न थे। जॉन लॉक सीमित सरकार को 'ट्रस्टी के रुप में स्वीकार किया जिसके पास केवल तीन अधिकार (व्यवस्थापिका, कार्यपालिका, तथा न्यायपालिका सम्बन्धी अधिकार) थे। व्यक्ति के प्राकृतिक अधिकार सरकार पर अंकुश स्थापित करते थे। संविधानवाद वस्तुतः सीमित सरकार की अवधारणा का ही पर्यायवाची माना जा सकता है लेकिन एक शर्त के साथ जब सीमित सरकार का उद्देश्य जनकल्याण हो।

शक्ति पृथक्करण एवं अवरोध व संतुलन
संविधानवाद का एक महत्वपूर्ण तत्व शक्ति पृथक्करण है। इसके पीछे मूलतः मान्टेस्क्यू का दिमागा काम करता है। जिसकी मान्यता थी कि यदि व्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करनी हो तो सरकार के तीनों अंगों के कार्य अलग-अलग हाथों में होने चाहिए और प्रत्येक को अपनी सीमा में काम करना चाहिए । मान्टेस्क्यू का यह विचार ‘इंग्लैड के शासन का अनुभवात्मक अध्ययन पर आधारित था। इस विचार के समर्थकों का मानना है कि शक्ति विभाजन से सरकार के कार्यों पर प्रभावशाली नियंत्रण स्थापित हो जाता है और इसी स्थिति में संविधानवाद सम्भव है। किन्तु मात्र शक्ति पृथक्करण कर देने से संविधानवाद स्थापित होना सम्भव नही है चूँकि ऐसी स्थिति में शासन में गतिरोध उत्पन्न होने की प्रबल सम्भावना रहती है और इससे जनकल्याण की नीतियाँ प्रभावित होती है। अतः इस कमी को सुधारने के लिए अवरोध व सन्तुलन के सिद्धान्त को शक्ति पृथक्करण के पूरक के रुप में स्वीकार किया गया है। अमेरिकी संविधान में इन व्यवस्थाओं को बड़ी स्पष्टता के साथ अपनाया गया है।

संवैधानिक साधनों के प्रयोग से परिवर्तन
संविधानवाद परिवर्तन व विकास में विश्वास करता है। लेकिन ये प्रक्रियाए संवैधानिक माध्यमों से होनी चाहिए। यदि सत्ता परिवर्तन हो तो वह प्रजातात्रिक माध्यम अर्थात चुनाव के माध्यम से होना चाहिए। किसी प्रकार के सैनिक अपदस्थ या अधिमानकवादिता या साम्राज्यवादी प्रवृत्ति के लिए संविधानवाद में कोई स्थान नहीं है। कुछ विचारकों ने संविधानवाद को दिवालिया घोषित करते हुए हिंसात्मक साधनों द्वारा परिवर्तन को स्वीकृति दी है। किन्तु ऐसी स्थिति संविधानवाद की सीमा से बाहर है।

संविधान सम्मत शासन में विश्वास
कुछ विचारकों ने संविधान व संविधानवाद में व्याप्त विभेद को अनदेखा करते हुए संविधान के अनुरुप चलने वाली शासन व्यवस्था को ही संविधानवाद मान लिया है। जैसे कोरी और अब्राहम ने लिखा, “स्थापित संविधान के निर्देशों के अनुरुप शासन को संविधानवाद माना जाता है।" ऐसा ही मत के0 सी0 व्हीयर का भी है उनका मानना है कि संवैधानिक शासन का अर्थ किसी शासन के नियम के अनुसार शासन चलाने से अधिक कुछ नहीं है। उसका अर्थ है निरंकुश शासन के विपरीत नियमानुकूल शासन केवल अधिकार उपयोग करने वालों की इच्छा के अनुसार चलने वाला शासन नहीं, बल्कि संविधान के नियमों के अनुसार चलने वाला शासन होता है।

संविधानवाद का उत्तरदायी सरकार में विश्वास
संविधानवाद का विश्वास उत्तरदायी सरकार में होता है। क्योंकि उत्तरदायी सरकार में व्यक्ति को शोषण से मुक्ति मिलती है, उसके अधिकार प्राप्त करवाये जाते हैं, उसकी स्वतंत्रता की रक्षा सम्भव होती है। विधायक व सांसद जनता के प्रति जवाबदेय होते हैं।

संविधानवाद की विशेषताएँ

मूल्य सम्बद्ध अवधारणा
संविधानवाद एक मूल्य सम्बद्ध अवधारणा है। इसका सम्बन्ध राष्ट्र के जीवन दर्शन से होता है। इसमें उन सभी अथवा अधिकांश तत्वों का समावेश होता है जो राष्ट्र के जीवन दर्शन में पहले से ही उपस्थित है। जैसे एक उदारवादी समाज में लोकतंत्र, स्वतंत्रता, समानता, न्याय, भ्रातृत्व, जनकल्याण आदि मूल्य प्रायः समाहित होते हैं। भारतीय समाज विदेश नीति के क्षेत्र में पंचशील व गुटनिरपेक्षता जैसे मूल्यों से संबद्ध है। यह संविधानवाद का व्यापक स्वरुप है चूँकि यहाँ राष्ट्र की स्वतंत्रता व सम्प्रभुता को बचाने का प्रयास किया गया है। इसे संविधानवाद का अन्तर्राष्ट्रीय स्वरुप माना जा सकता है। राष्ट्रीय स्तर पर संविधानवाद उन मल्यों की रक्षा करता है जो व्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करते है।

संस्कृतिबद्ध अवधारणा
संविधानवाद का विकास एवं समाज के मूल्यों का निर्माण देश में स्थापित संस्कृति से सम्बद्ध होता है। प्रायः हर देश में राजनीतिक संस्कृति मूल्यों को जन्म देती है। परन्तु व्यवहारवादी विचारधारा के अनुसार मूल्य एंव विचारधाराएँ संस्कृति में उचित परिवर्तन लाने के लिए साधन के रुप में भी प्रयोग किये जाते हैं।

गतिशील अवधारणा
परिवर्तन प्रकृति का नियम है, संविधानवाद इसे स्वीकार करता है। यही कारण है कि संविधानवाद की अवधारणा जड़ न होकर गतिशील है। इसमें समयानुकूल परिवर्तन व विकास की क्षमता होती है। समाज में मूल्य सदैव एक से रहे यह सम्भव नहीं है। ज्यों-ज्यों समाज का विकास होता है समाज के मूल्यों में विकासात्मक परिवर्तन होता है। यह परिवर्तन संस्कृति के विकास व संवर्द्धन में सहायक होता है। चूँकि संविधानवाद संस्कृतिबद्ध अवधारणा है अतः यह गत्यात्मकता को सहज स्वीकार करती है। संविधानवाद वर्तमान के साथ-साथ भविष्य की आकांक्षाओं का प्रतीक भी होता है।

साध्य मूलक अवधारणा
यद्यपि संविधानवाद में साधनों व साध्यों को प्रायः समान दृष्टि से देखा जाता है, फिर भी साध्य -प्रधानता इसका मूल लक्षण है। चूँकि इस अवधारणा का जन्म ही, एक साध्य की प्राप्ति के लिए हुआ है और वह साध्य है- 'व्यक्ति की स्वतंत्रता को राज्य निरकुशता से बचाना। इसी अभीष्ट की प्राप्ति के लिए संविधानवाद में कई साधनों का प्रयोग किया जाता है। जैसे- विधि का शासन, शक्ति पृथक्करण, स्वतंत्र न्यायपालिका, मौलिक अधिकारों की व्यवस्था, 'समानता, स्वतंत्रता, भ्रातृत्व को साकार करना आदि। ये सभी साधन संविधानवाद की पाश्चात्य् अवधारणा के उपकरण हैं जबकि मार्क्सवादी अवधारणा में व्यक्ति की स्वंतत्रता व समानता तथा शोषण मक्ति के लिए राज्य को अस्वीकार किया गया है तथा पँजीवादी व्यवस्था की समाप्ति व समाजवादी और साम्यवादी व्यवस्था की स्थापना पर बल दिया गया है। इस प्रकार संविधानवाद की दोनों अवधारणाओं- पाश्चात्य व मार्क्सवादी, में साध्य व्यक्ति स्वतंत्रता को माना गया है और उसी साध्य की प्राप्ति के लिए भिन्न-भिन्न साधन इजाद किये गये हैं।

सहभागी अवधारणा
संविधानवाद को सम्भागी अवधारणा करार देने के पीछे मूल कारण कुछ मूल्यों को प्राप्त सार्वभौमिक स्वीकृति है। आज प्रायः सभी लोकतांत्रिक देश स्वतंत्रता ,समानता, न्याय, भ्रातृत्व, विधि के शासन, जन सहभागिता, आदि मूल्यों में अपनी आस्था प्रकट करते हैं, इसी प्रकार साम्यवादी व्यवस्था वाले देशों की लगभग एक जैसी आस्थाएँ जैसे- समानता, शोषण का अंत आदि है। अतः वर्तमान में एक श्रेणी पाश्चात्य संविधानवादी अवधारणा के रुप में जानी जाती है। दूसरी साम्यवादी धारणा के रुप में । सम्भागी कहने का तात्पर्य है संविधानवाद के मूल्यों के प्रति दो या अधिक राज्यों के विचारों में समानता पाया जाना। वस्तुतः संविधानवाद के उपरोक्त दो मॉडलों को अपनाने वाले राज्यों में अपने -अपने मॉडलों के प्रति कई समानताएँ पायी जाती हैं। अतः पाश्चात्य मॉडल अपनाने वालों में मूल्यों के सम्बन्ध में प्रकार का भेद न होकर मात्रा का भेद है। यही स्थिति मार्क्सवादी या साम्यवादी राज्यों के सम्बन्ध में भी लागू होती है। 6.संविधान-सम्मत अवधारणा- चूँकि प्रत्येक देश के संविधान में जहाँ एक ओर शासन व्यवस्था के स्वरुप, कार्यप्रणाली, शासन-अंगों के मध्य अन्तः सम्बन्धों, अन्तः क्रियाओं, जनता शासन के रिश्तों आदि का वर्णन होता हैं उस देश की संस्कृति के अनुरुप मूल्यों, आस्थाओं, विश्वासों का भी प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष वर्णन होता है। अतः संविधानवाद का संविधान में स्वतः समावेश होता है। यह स्थिति तो सैद्धान्तिक है। अब यदि संविधान में वर्णित आदर्शों के अनुरुप व्यवहार में उसका पालन भी हो रहा है तो कहा जा सकता है संविधान सम्मत कार्य ही वही संविधानवाद है और यदि ऐसा नही हो रहा है तो दोनों भिन्न-भिन्न चीजें हैं। दूसरी बात जो अधिक महत्वपूर्ण है वह यह कि क्या संविधान मानव स्वतंत्रता का पोषक है या केवल राज्य का अस्तित्व कायम रखने के लिए बनाया गया है? यदि यह मानव स्वतंत्रता व कल्याण की गांरटी देता है तब तो संविधानवाद संविधान सम्मतता को स्वीकार करेगा अन्यथा नहीं। अतः संविधानवाद केवल वहीं संविधान सम्मत अवधारणा कहलायेगी जहाँ संविधान का उद्देश्य व्यक्ति स्वतंत्रता व कल्याण की सिद्धि करना हो।

“संविधान ऐसे निश्चित नियमों का एक संग्रह होता है, जिनमें सरकार की कार्य-विधि प्रतिपादित होती है और जिनके द्वारा उसका संचालन होता है।"

सारांश

विश्व के किसी भी देश में चाहे शासन का जो भी स्वरुप उस देश का एक संविधान अवश्य होता है। शासन के लोकतंत्रात्मक स्वरुप शासन संविधान के अनुरुप व उसके नियंत्रण में चलता है। किन्त शासन के अन्य रुपों में चाहे वह सैनिक शासन हो या तानाशाही शासन, इन व्यवस्थाओं में शासन, संविधान को दर किनार करते हुए एक व्यक्ति या कुछ व्यक्तियों के समुह के निर्देशन में चलता है। संविधान लिखित रूप में भी हो सकता है और अलिखित रुप में भी। आवश्यक यह है कि कुछ एसे नियम-कानून हों जिनके अनुरुप राज्य की शासन-प्रणाली चल सके। जिस पर विद्वानों ने इसकी अलग-अलग परिभाषा दी है। संविधान के विभिन्न स्वरुपों के आधार पर इसका वर्गीकरण किया गया है। संवैधानिक सरकार से आशय एसी सरकार से है जो संविधान की व्यवस्थाओं के अनुरुप गठित, नियंत्रित व संचालित होती है। परन्तु एसा भी नहीं है कि जिस राज्य में संविधान हो वहां संवैधानिक सरकार भी हो। लोकतंत्रीय शासन व्यवस्था में संवैधानिक सरकार तो हो सकती है। किन्तु शासन के अन्य रुपों में इसकी कोई गारंटी नहीं कि वहां संविधान के साथ-साथ संवैधानिक सरकार हो, क्यों कि संवैधानिक सरकारें विधि के अनुरुप व लोक कल्याण पर आधारित होती हैं।
संविधानवाद एक आधुनिक विचारधारा है, जो नियंत्रित राजनीतिक व्यवस्था की स्थापना पर जोर देती है। कहा जा सकता है कि संविधानवाद सीमित शासन का प्रतीक है। एक आधुनिक विचारधारा होने के कारण संविधानवाद की तीन प्रचलित अवधारणाएं हैं। पहला- पाश्चात्य अवधारणा, दुसरीसाम्यवादी अवधारणा व तीसरी- विकासशील लोकतांत्रिक अवधारणा। संविधानवाद के तत्व व विशेषताएं संविधानवाद की प्रकृति व महत्व को स्पष्ट करती है।

शब्दावली
  • संक्षिप्त- छोटा/आकार में कम
  • अवधारणा- विचार/विचारधारा
  • अंगीकार- ग्रहण करना/ अपनाना
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