सर्वोच्च न्यायालय के गठन का वर्णन कीजिए | sarvoch nyayalay ke gathan ka varnan kijiye

सर्वोच्च न्यायालय

भारत का सर्वोच्च न्यायालय देश का उच्चतम न्यायालय है। यह भारतीय न्याय व्यवस्था की शीर्षस्थ संस्था है। संघीय विधायिका, जिसे संसद कहते हैं, संघ सूची तथा समवर्ती सूची के विषयों पर देश के लिए कानून बनाती है। राष्ट्रपति, मंत्रिपरिषद तथा अधिकारी वर्ग से बनी हमारी कार्यपालिका इन कानूनों को लागू करती है। सरकार के तीसरे अंग अर्थात न्यायपालिका की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। वह झगड़ों को निपटाती है एवं कानूनों की व्याख्या करती है। यह मूल अधिकारों की रक्षा करती है तथा संविधान के संरक्षक के रूप में कार्य करती है। भारत में एक एकल एवं एकीकृत न्याय व्यवस्था है और सर्वोच्च न्यायालय भारत का उच्चतम न्यायलय है।

सर्वोच्च न्यायालय
सर्वोच्च न्यायालय भारत का उच्चतम न्यायिक प्राधिकरण है। इसमें मुख्य न्यायाधीश के अतिरिक्त 30 न्यायाधीश होते हैं। यदि संसद आवश्यक समझे तो न्यायाधीशों की संख्या बढ़ा सकती है। समय-समय पर संसद ने न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाई है। प्रारम्भ में उच्चतम न्यायालय में एक मुख्य न्यायाधीश तथा सात अन्य न्यायाधीश थे।
मुख्य न्यायाधीश को भारत का मुख्य न्यायाधीश भी कहा जाता है। जब कभी भी सर्वोच्च न्यायालय में कोई स्थान खाली होता है अथवा उसके खाली होने की संभावना होती है तो मुख्य न्यायाधीश सहित चार अन्य वरिष्ठ न्यायाधीश, कई नामों पर चर्चा करने के पश्चात उन नामों की सिफारिश करते हैं जिन्हें सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्ति किया जा सकता है। यह व्यवस्था सर्वोच्च न्यायालय की पहले 1993 और फिर 1999 की संविधान पीठ द्वारा किए गए निर्णय पर आधारित है। संविधान के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति का अधिकार अभी भी राष्ट्रपति के पास है, परंतु सर्वोच्च न्यायालय के 1999 के निर्णय ने राष्ट्रपति को मुख्य न्यायाधीश की सलाह मानने को बाध्य कर दिया है। अब यह शक्ति न्यायाधीशों के समूह के पास चली गई है जिसे कालीजियम कहा जाता है। राष्ट्रपति की भूमिका औपचारिक रह गई है कि वह विधि मंत्रालय द्वारा भेजे गए एवं सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नामित व्यक्ति की नियुक्ति करे।

सर्वोच्च न्यायालय के गठन का वर्णन

सर्वोच्च न्यायालय का गठन सर्वोच्च न्यायालय के गठन के बारे में प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 124 (1) में दिया गया है। अनुच्छेद 124 (1) के तहत मूल संविधान में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या एक मुख्य न्यायाधीश तथा सात अन्य न्यायाधीशों को मिलाकर कुल 8 रखी गयी थी। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या, क्षेत्राधिकार, न्यायाधीशों के वेतन एवं शर्ते निश्चित करने का अधिकार संसद को दिया गया है।
sarvoch nyayalay ke gathan ka varnan kijiye
इस शक्ति का प्रयोग कर संसद ने समय-समय पर न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि कर सकता है। वर्तमान में सर्वोच्च न्यायालय में कल न्यायाधीशों की संख्या 31 है।

सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति

1950 से 1973 तक व्यवहार में यह था कि उच्चतम न्यायालय में वरिष्ठतम न्यायाधीश को बतौर मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया जाता था। इस व्यवस्था का 1973 में तब हनन हुआ जब ए०एन०रे को तीन वरिष्ठतम न्यायाधीशों से ऊपर भारत का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त कर दिया गया। पुनः 1975 में न्यायमूर्ति एच0आर0 खन्ना को पीछे छोड़ते हुए न्यायमूर्ति एम0एच0 बेग की नियुक्ति की गई।
सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति तथा अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है। इसके साथ ही साथ उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एवं अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीशों एवं सम्बन्धित राज्य के राज्यपाल की सलाह पर करता है। संविधान में मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति के लिए कोई पृथक प्रावधान नहीं है लेकिन मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति में केवल दो मामलों को छोड़कर सदैव वरिष्ठता के सिद्धान्त को अपनाया गया। 1993 में उच्चतम न्यायालय ने बहुमत से यह निर्णय दिया कि भारत के मुख्य न्यायाधीश के पद पर उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठतम न्यायाधीश की ही नियुक्ति की जाएगी। उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति के मामले में सर्वोच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश, उच्चतम न्यायालयों के दो वरिष्ठतम न्यायाधीशों से विचार विमर्श करने के पश्चात् ही राष्ट्रपति को अपना परामर्श देगा।

एकल एकीकृत न्याय प्रणाली

भारतीय संविधान की विशेषताओं वाले पाठ में आप यह तो पहले ही पढ़ चुके हैं कि हमारी न्यायपालिका की यह विशिष्टता है कि पूरे देश के लिए एक ही एकीकृत न्याय प्रणाली है। एकल न्यायपालिका श्रेणीबद्ध न्यायालयों का प्रतिनिधित्व करती है। इसमें एकल एकीकृत न्याय प्रणाली के शीर्ष पर सर्वोच्च न्यायालय है तथा राज्यों के स्तर पर उच्च न्यायालय हैं। उच्च न्यायालयों के नीचे अनेक अधीनस्थ न्यायालय हैं जैसे जिला न्यायालय तथा सैशन जज का न्यायालय जो क्रमशः दीवानी तथा फौजदारी मुकदमें सुनते हैं।

भारतीय न्याय प्रणाली
  1. भारत का सर्वोच्च न्यायालय
  2. उच्च न्यायालय
  3. अधीनस्थ न्यायालय

योग्यताएं, कार्यकाल तथा पदच्युति

कोई भी व्यक्ति सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश बनने के योग्य है यदि वह भारत का नागरिक है तथा निम्नलिखित शर्तो को पूरा करता है:-

वह कम से कम पांच वर्ष के लिए किसी एक या एक से अधिक उच्च न्यायालयों का न्यायाधीश रह चुका हो
अथवा
वह कम से कम दस वर्ष तक किसी एक या एक से अधिक उच्च न्यायालय का उच्चतम न्यायालय में वकालत कर चुका हो।
अथवा
राष्ट्रपति की दृष्टि में कोई प्रख्यात न्यायाविद् हो।

सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश तथा अन्य न्यायाधीश 65 वर्ष की आयु तक अपने पद पर बने रहते हैं। कोई न्यायाधीश कार्यकाल पूरा होने से पहले भी त्यागपत्र दे सकता है। असाधारण स्थिति में, किसी न्यायाधीश को सेवानिवृति की आयु पूरी होने से पहले भी अपदस्थ किया जा सकता है परन्तु इसके लिए निर्धारित प्रक्रिया को अपनाना होगा। अतः सर्वोच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश को उसकी असक्षमता व कदाचार के आधार पर राष्ट्रपति द्वारा हटाया जा सकता है यदि संसद के दोनों सदन अलग-अलग प्रस्ताव पारित कर दें जिसके लिए एक ही सत्र में उपस्थित तथा मतदान करने वाले सदस्यों की कुल संख्या का 2/3 बहुमत होना आवश्यक है। अभी तक सर्वोच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश को हटाने के लिए ऐसी प्रक्रिया का प्रयोग केवल एक बार किया गया है। परंतु फिर भी उसे हटाया नहीं जा सका क्योंकि संसद उस प्रस्ताव को पारित नहीं कर सकी। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों का कार्यकाल सुरक्षित है और कार्यपालिका उन्हें अपनी इच्छा अनुसार नहीं हटा सकती। कोई व्यक्ति जो सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीश के रूप में कार्यरत रहा है देश भर में कहीं भी वकालत नहीं कर सकता। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को संसद द्वारा समय-समय पर निर्धारित वेतन भत्ते दिए जाते हैं।

अभिलेख न्यायालय
सर्वोच्च न्यायालय एक प्रकार का अभिलेख न्यायालय है। यह दो प्रकार से है। इसके सभी निर्णय और फैसले यहां पर संजोकर रखे जाते हैं जिन्हें देश के सभी न्यायालयों द्वारा संदर्भ के रूप में प्रयोग किया जाता है एवं इन्हें कानून के समान मान्यता प्राप्त है। अभिलेख न्यायालय के रूप में इसे किसी भी व्यक्ति को न्यायालय का निरादर या मानहानि करने पर दंड देने का अधिकार है।

सर्वोच्च न्यायालय का अधिकार क्षेत्र

सर्वोच्च न्यायलय द्वारा मुकदमों को सुनने और फैसला करने के अधिकार या शक्ति को न्यायिक अधिकार क्षेत्र कहते हैं। सर्वोच्च न्यायालय के तीन प्रकार के अधिकार क्षेत्र हैं जैसे प्रारम्भिक अथवा मूल, अपील संबंधी तथा मंत्रणा संबंधी अधिकार क्षेत्र।

प्रारम्भिक अथवा मूल क्षेत्राधिकार
कुछ मुकदमें ऐसे हैं जो केवल सर्वोच्च न्यायालय के न्यायक्षेत्र में ही आते हैं। इससे यह अभिप्राय है कि ऐसे मुकदमें केवल सर्वोच्च न्यायालय में ही प्रारम्भ होते हैं अर्थात जिन्हें पहली बार केवल सर्वोच्च न्यायालय में ही दायर किया जाता है, तथा वे किसी अन्य न्यायालय में दायर नहीं किए जा सकते। मूल न्यायाधिकार में आने वाले मुदकमें इस प्रकार हैं:
(i) (क) ऐसे मुकदमें जिनमें एक ओर केन्द्रीय सरकार तथा दूसरी ओर एक या एक से अधिक राज्य सरकारें हों।
(ख) ऐसे मुकदमें जिनमें एक ओर केन्द्रीय सरकार के अतिरिक्त एक या एक से अधिक राज्य सरकारें हों और दूसरी ओर एक या एक से अधिक राज्य सरकारें हों।
(ग) ऐसे मुकदमें जिनमें दो या दो से अधिक राज्यों के बीच विवाद हो।
(ii) मौलिक अधिकारों के संरक्षण तथा लागू करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय को विशेष अधिकार दिए गए हैं जिसके लिए उसे निर्देश अथवा आदेश देने का अधिकार है।
(iii) जनहित याचिकाएं (पी.आई.एल.) भी सीधे सर्वोच्च न्यायालय में सुनी जा सकती हैं। (यह एक ऐसा अधिकार है जो संविधान में वर्णित नहीं है)।

अपील संबंधी क्षेत्राधिकार
किसी भी निचली अदालत द्वारा दिए गए निर्णय के विरुद्ध की गई अपील को किसी उच्च अदालत द्वारा सुनने की शक्ति को अपील संबंधी न्यायाधिकार कहा जाता है। सर्वोच्च न्यायालय का अपील संबंधी अधिकार क्षेत्र बहुत विशाल है। यह उच्च न्यायालयों के निर्णयों के विरुद्ध अपील सुन सकता है। अतः सर्वोच्च न्यायालय में की गई अपील अंतिम अपील होती है। यदि किसी मुकदमे में उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय से कोई एक पक्ष संतुष्ट नहीं है, तो वह सर्वोच्च न्यायालय में उस निर्णय के विरुद्ध अपील कर सकता है। यह अपीलें दीवानी, फौजदारी तथा संवैधानिक मामलों से संबंधित हो सकती हैं।

(i) दीवानी मामले
सम्पत्ति, विवाह, धन, समझौते या किसी सेवा संबंधी झगड़ों के मामले दीवानी मुकदमें कहलाते हैं। यदि किसी दीवानी मामलों में लोक महत्व का कोई ऐसा प्रमुख कानूनी बिन्दु है जिसकी व्याख्या सर्वोच्च न्यायालय द्वारा वांछित है, तो उच्च न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में अपील की जा सकती है। पहले ऐसे दीवानी मामलों की वित्तीय सीमा केवल 20,0000 रु. तक थी परंतु 1972 में किए गए संविधान के तीसवें संशोधन के अनुसार अब सर्वोच्च न्यायलाय में की जाने वाली दीवानी अपील के लिए कोई निम्नतम राशि निर्धारित नहीं है।

(ii) फौजदारी मामले
कई परिस्थितियों में फौजदारी मामलों में उच्च न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में अपील की जा सकती है।
यदि कोई उच्च न्यायालय निचली अदालत द्वारा दोषमुक्त घोषित किए गए व्यक्ति को मृत्यु दंड सुना दे, तो ऐसे व्यक्ति को इस निर्णय के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने का अधिकार है। यदि उच्च न्यायालय किसी निचली अदालत से किसी मुकदमे को अपने यहां मंगा ले और उस व्यक्ति को दोषी करार देते हुए मृत्यु दंड सुना दे, तो ऐसे मामले में भी सर्वोच्च न्यायालय में अपील की जा सकती है। ऐसी स्थिति में भी अधिकार स्वरूप और उच्च न्यायालय से बिना किसी प्रमाणपत्र के अपील दायर की जा सकती है।
उपरोक्त दो स्थितियों के अतिरिक्त भी सर्वोच्च न्यायालय में अपील की जा सकती है यदि कोई उच्च न्यायालय यह प्रमाणपत्र दे कि मुकदमा सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने योग्य है। यदि कोई उच्च न्यायालय किसी मामले में यह प्रमाणित करने से इंकार कर दे कि मामला सर्वोच्च न्यायालय में अपील के योग्य है, तो संबंधित व्यक्ति सर्वोच्च न्यायालय में अपील दायर करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय से ही विशेष अनुमति प्राप्त कर सकता है। परंतु सर्वोच्च न्यायालय इस प्रकार की विशेष अनुमति बहुत ही कम मामलों में देता है।

(iii) संवैधानिक मामले
संवैधानिक मामले न तो दीवानी झगड़े होते हैं और न ही फौजदारी अपराध। यह ऐसा मुकदमा है जिसके कारण संविधान की भिन्न-भिन्न प्रकार से व्याख्या करना होता है, विशेषतौर पर मौलिक अधिकारों से संबंधित व्याख्या अथवा अर्थ निकालना। ऐसे मामलों की सुनवाई सर्वोच्च न्यायलाय में केवल तभी हो सकती है यदि उच्च न्यायालय यह प्रमाणित करे कि मामला संवैधानिक सवालों से संबंधित है। यदि उच्च न्यायलय यह प्रमाणित करने से मना कर दे कि मामला सर्वोच्च न्यायालय में जाने योग्य है, तो सर्वोच्च न्यायालय अपनी स्वैच्छिक शक्ति का प्रयोग करते हुए ऐसे किसी मामले में जिसे वह उचित समझता है, अपील के लिए विशेष अनुमति दे सकता है।

मंत्रणा संबंधी न्यायाधिकार
इस अधिकार का अर्थ यह है कि सर्वोच्च न्यायालय को परामर्श देने का अधिकार है, यदि उससे परामर्श मांगा जाए। मंत्रणा संबंधी अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत राष्ट्रपति किसी भी कानून संबंधी अथवा लोक महत्व के प्रश्न पर सर्वोच्च न्यायालय से परामर्श मांग सकता है। परंतु सर्वोच्च न्यायालय परामर्श देने के लिए बाध्य नहीं है। दूसरी ओर, यदि परामर्श या मत भेज दिया जाए, तो उसे मानना या न मानना राष्ट्रपति के लिए भी बाध्यकारी नहीं है। आज तक जब भी सर्वोच्च न्यायालय ने कोई परामर्श दिया है, राष्ट्रपति ने उसे सदैव स्वीकार किया है। अयोध्या में जिस स्थान पर बाबरी मस्जिद बनाई गई थी, उस स्थान पर पहले मंदिर था या नहीं, जब इस पर सर्वोच्च न्यायालय की राय मांगी गई तो उसने अपनी राय देने से इंकार कर दिया था।

संविधान का संरक्षक
भारत का संविधान देश का सर्वोच्च कानून है और सर्वोच्च न्यायालय इसका व्याख्याता तथा संरक्षक है। यह कार्यपालिका या विधायिका को इसके किसी भी प्रावधान का उल्लघंन नहीं करने देता। यह सरकार के किसी भी कार्य का, जिससे मौलिक अधिकारों का उल्लघंन होता है, न्यायिक पुनरावलोकन कर सकता है। सर्वोच्च न्यायालय की इस शक्ति को न्यायिक पुनरावलोकन कहते हैं जिसके बारे में हम आगामी पाठों में विस्तार से पढ़ेंगे। यदि सर्वोच्च न्यायालय को लगे कि संविधान के किसी प्रावधान का उल्लघन हो रहा है तो यह संबंधित कानून को असंवैधानिक अथवा अवैध घोषित कर सकता है। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायिक पुनरावलोकन के इसी अधिकार के आधार पर इसे संविधान का संरक्षक कहा जाता है। इसे स्वतंत्रताओं का समर्थक और लोकतंत्र का रखवाला कहा जाता है। इस संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका तथा कार्य विशाल एवं विस्तृत हैं।

मौलिक अधिकारों का संरक्षक
सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों दोनों को निर्देश देने, आदेश देने तथा संवैधानिक उपचारों के अधिकार का प्रयोग करने का अधिकार है। यह बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, अधिकार पृच्छा, उत्प्रेषण लेख के रूप में है। यही आदेश सर्वोच्च न्यायालय को मौलिक अधिकारों का संरक्षक तथा प्रहरी बना देते हैं। यदि किसी कानून का उल्लंघन होता है अथवा अधिकार का हनन होता है, तो न्यायालय संवैधानिक नियमों के पालन का आदेश दे सकता है। इस प्रकार भारत के नागरिकों के मौलिक अधिकार सरक्षित हैं। यदि विधायिका द्वारा पारित कोई भी कानन मौलिक अधिकारों का हनन करता है. तो सर्वोच्च न्यायालय को यह अधिकार है कि वह इसे अवैध घोषित कर दे। इसने ऐसे कई कानून रद्द किए हैं जिनसे मौलिक अधिकारों का हनन होता था। इससे यह स्पष्ट है कि किस प्रकार सर्वोच्च न्यायालय ने सदैव मौलिक अधिकारों के संरक्षक के रूप में कार्य किया है।

याचिका (रिट) : यह एक आदेश है जो किसी निचली अदालत या राज्य के अधिकारी को दिया जाता है ताकि वह लोगों के अधिकार वापिस दिलाने के लिए उचित कार्यवाही करे। 12.4.2 अपने निर्णय पर पुनर्विचार यदि सर्वोच्च न्यायालय को कुछ नए तथ्य अथवा नए प्रमाण मिलें या यह विश्वास हो जाए कि उसके पूर्व निर्णयों में कोई भूल हुई है तो उसे यह अधिकार प्राप्त है कि वह अपने पूर्व निर्णय पर पुनर्विचार करे और अपने निर्णय को बदल सके। यह प्रायः तब किया जाता है जब कोई पुनर्विचार के लिए याचिका दायर करता है। सामान्यतया पुनर्विचार करने वाली पीठ पूर्व निर्णय देने वाली पीठ से बड़ी होती है।

न्यायिक पुनरावलोकन
यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा न्यायपालिका यह परखती है कि व्यवस्थापिका द्वारा बनाया गया कोई कानून अथवा कार्यपालिका का कोई कार्य संविधान के अनुसार है या नहीं। न्यायिक पुनरावलोकन की यह शक्ति सबसे पहले संयुक्त राज्य अमरीका के सर्वोच्च न्यायालय को प्राप्त हुई थी। अब इसका प्रयोग खुले तौर पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय या कई अन्य देशों में भी होता है। हमारे उच्च न्यायालय भी इसका प्रयोग करते हैं। न्यायिक पुनरावलोकन का यह अर्थ नहीं है कि विधायिका द्वारा बनाया गया प्रत्येक कानून सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जांचा और परखा जाता है। इसका अर्थ केवल यह है कि न्यायालय को जब कभी भी अवसर मिलेगा वह कानून का पुनरावलोकन करेगा। यह दो प्रकार से सम्भव है। प्रथम यह कि जब भी किसी कानून की वैधता को चुनौती दी जाएगी, न्यायालय उसका पुनरावलोकन करेगा। एक दूसरी स्थिति भी है जिसमें सर्वोच्च न्यायालय अथवा उच्च न्यायालय को किसी कानून का पुनरावलोकन करने का अवसर प्राप्त होता है। यदि कोई व्यक्ति अथवा संस्था यह अनुभव करे कि उसके अधिकारों का हनन हो रहा है या किसी कानून के अंतर्गत उसे मिलने वाला लाभ उसे नहीं दिया जा रहा, तो ऐसी याचिका की जांच करते समय न्यायालय इस नतीजे पर पहुंच सकता है कि जिस कानून के अंतर्गत राहत मांगी जा रही है, वह अपने आप में असंवैधानिक है।
भारत जैसे किसी भी लोकतांत्रिक देश में न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति जनता के अधिकारों को सुरक्षा प्रदान करती है। इसके अतिरिक्त सर्वोच्च न्यायालय संविधान के विभिन्न प्रावधानों की व्याख्या करता है। इसका निर्णय देश का कानून समझा जाता है। आइए, अब हम यह जानने का प्रयास करें कि सर्वोच्च न्यायालय किस प्रकार नागरिक स्वतंत्रताओं और विशेषतया मौलिक अधिकारों के संरक्षक की भूमिका निभाता है। समानता का अधिकार एक महत्वपूर्ण अधिकार है जो कानून के सम्मुख समानता सुनिश्चित करता है। समानता के अधिकार का अर्थ विशेषाधिकारों तथा व्यवहार में असमानता की अनुपस्थिति भी है। इसलिए, सर्वोच्च न्यायालय ने संरक्षात्मक भेदभाव के नाम पर दिया जाने वाले आरक्षण तथा योग्यताओं को उचित ठहराया है। स्वतंत्रता के अधिकार ने हम सब को कई प्रकार की स्वतंत्रता दी है। परंतु प्रेस की स्वतंत्रता का उल्लेख संविधान में नहीं किया गया। इसलिए सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्णय लिया कि प्रेस की स्वतंत्रता के अधिकार को विचार एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के अंतर्गत समझा जाए। इस प्रकार न्यायालय ने स्वतंत्रता के अधिकार का विस्तार कर दिया। सर्वोच्च न्यायालय ने जानकारी या सूचना प्राप्त करने के अधिकार को बहुत महत्वपूर्ण माना क्योंकि इससे हम लोकतंत्र तथा विकास की सहभागिता की प्रक्रिया में भाग ले सकते हैं। न्यायालय ने यह भी कहा है कि अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन के अधिकार के अंतर्गत शिक्षा का अधिकार तथा स्वच्छ पर्यावरण भी सम्मिलित हैं। मुकदमों का निर्णय देने में होने वाली देरी के बारे में सर्वोच्च न्यायालय का मत है कि निर्णय देने में देरी करने का अर्थ है न्याय देने में देरी करना। न्यायालय का मत यह भी है कि तीव्रता से मुकदमे का फैसला करना, अभियुक्तों को जमानत पर छोड़ना, निर्धन व्यक्तियों को निःशुल्क कानूनी सहायता देना भी मौलिक अधिकार में शामिल हैं। लोगों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति का प्रयोग करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने कई ऐतिहासिक निर्णय दिए हैं। इसने अल्पसंख्यकों के भाषायी अधिकार, लोगों के धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार तथा कर्मचारियों और दिहाड़ी मजदूरों के भले के लिए सुरक्षा प्रदान की है। इसने बंधुआ मजदूरों की रक्षा के लिए तथा महिलाओं,बच्चों एवं समाज के अभावग्रस्त वर्गों को शोषण से बचाने के लिए भी कार्यवाही की है। निस्संदेह, सर्वोच्च न्यायालय ने अपने न्यायिक पुनरावलोकन के अधिकार का प्रयोग करते हुए जीवन के विभिन्न क्षेत्र में हमारे अधिकारों की रक्षा की है। इसने कई महत्वपूर्ण निर्णय दिए हैं। न्यायिक सक्रियतावाद के प्रभाव में न्यायालय ने कई निर्देश दिए हैं जैसे पर्यावरण के प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए दिल्ली में सार्वजनिक यातायात वाहनों में सीएनजी गैस का प्रयोग पर्यावरण को दूषित करने के स्थान पर स्वच्छ बनाने के लिए नितांत अनिवार्य है। इसी प्रकार लोगों के जीवन को सुरक्षित बनाने के लिए इसने दुपहिया चालकों तथा पीछे बैठने वाली सवारी दोनों के लिए हैलमेट का प्रयोग अनिवार्य कर दिया है। न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति जनता के अधिकारों को महत्वपूर्ण सुरक्षा प्रदान करती है। यह संविधान का उल्लंघन नहीं होने देती। नई-नई व्याख्याओं द्वारा संविधान के प्रावधानों को नया रूप दिया है। इस प्रकार इसने संविधान की रक्षा के साथ इसका विस्तार भी किया है।

जनहित याचिका (PIL)
प्रारम्भिक दौर में सर्वोच्च न्यायालय सहित न्यायपालिका केवल उन्हीं के मुकदमें सुनने के लिए स्वीकार करती थी जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रभावित होते थे। यह केवल मूल तथा अपील संबंधी अधिकार क्षेत्र के ही मुकदमें सुनती थी और उन पर फैसला सुनाती थी। परंतु बाद में न्यायपालिका जनहित याचिकाओं पर आधारित मुकदमें भी सुनने लगी। इसका अभिप्राय यह है कि वे लोग भी जिनका किसी मामले से कोई सीधा संबंध नहीं है, न्यायालय में कोई जनहित का मामला ला सकते हैं। यह न्यायालय का विशेषाधिकार है कि वह उस जनहित याचिका को स्वीकार करे या न करे। जनहित याचिका की अवधारणा को न्यायमूर्ति पीएन भगवती ने शुरू किया था। जनहित याचिका अब इसलिए महत्वपूर्ण बन गई है क्योंकि इससे समाज के निर्धन तथा कमजोर वर्गों को सुगमता से न्याय मिलने लगा है। पत्रकारों, वकीलों तथा समाज सेवकों, यहां तक की समाचार पत्रों की रिपोटों के आधार पर भी, सर्वोच्च न्यायालय ने अनेक जनहित याचिकाएं स्वीकार की हैं। आइए, यह जानने के लिए कि जनहित याचिकाओं ने किस प्रकार लोगों को न्याय दिलवाया है, कुछ उदाहरण देखें। जनहित याचिकाओं के द्वारा अवैध रूप से बंदी बनाए गए लोगों को, जिन पर मुकदमें चल रहे हैं, उन्हें कई अधिकार दिलाए गए हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने कई कैदियों को बिना मुकदमा चलाए ही व्यक्तिगत स्वतंत्रता के आधार पर रिहाई के आदेश दिए हैं क्योंकि व्यक्तिगत स्वतंत्रता किसी न्यायिक व्यवस्था अथवा नौकरशाही की अक्षमता या अयोग्यता से कम नहीं कही जा सकती। सर्वोच्च न्यायालय ने बंधुआ मजदूरों, जनजातियों, गंदी बस्तियों के निवासियों, नारी उद्धार गृहों में रहने वाली महिलाओं, बाल सुधार गृहों के बच्चों तथा बाल मजदूरों को मुक्त कराने के लिए कई कदम उठाए हैं। पर्यावरण के प्रदूषण के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कानपुर, दिल्ली तथा कुछ अन्य स्थानों पर कुछ फैक्टिरियों के बंद करने के आदेश दिए हैं। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अधिकाधिक निर्णय लेने के कारण जनहित याचिकाओं का क्षेत्र काफी बढ़ गया है। अब कोई भी व्यक्ति केवल एक पत्र के माध्यम से न्यायालय तक पहुंच सकता है और यदि सर्वोच्च न्यायालय को यह विश्वास हो जाए कि मामला जनहित का है, तो वह उसी पत्र को याचिका मान सुनवाई के निर्देश दे सकता है ताकि जनहित की रक्षा की जा सके। जनहित याचिकाओं की इस प्रक्रिया ने न्यायिक सक्रियतावाद को बढ़ावा दिया है।
  • भारतीय न्यायपालिका की मुख्य विशेषता यह है कि यह सम्पूर्ण रूप से एकल तथा एकीकृत न्याय व्यवस्था है।
  • सर्वोच्च न्यायालय देश का उच्चतम न्यायालय है। इसमें मुख्य न्यायाधीश सहित 30 अन्य न्यायाधीश हैं। इनके नाम सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के एक समूह द्वारा चयनित कर सुझाए जाते हैं। ये न्यायाधीश 65 वर्ष की आयु तक अपने पद पर बने रहते हैं। इन्हें अपदस्थ करने के लिए एक जटिल प्रक्रिया अपनाई जाती है। सर्वोच्च न्यायालय प्रारम्भिक तथा अपील संबंधी न्यायक्षेत्र के अंतर्गत मुकदमे सुनता है। यह संविधान का संरक्षक तथा मौलिक अधिकारों का रक्षक है। यह अभिलेख न्यायालय के रूप में कार्य करता है तथा न्यायालय का अनादर या मानहानि करने पर किसी व्यक्ति को दंड भी दे सकता है।
  • यदि कोई कानून संविधान के विरुद्ध जा रहा हो तो न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति का प्रयोग करके, सर्वोच्च न्यायालय उसे अवैध या गैर कानूनी घोषित कर सकता है।
  • यह संविधान की उन धाराओं की व्याख्या करता है जो स्पष्ट नहीं होतीं।
  • यह जनहित याचिकाओं द्वारा लोगों को न्याय दिलवाने की दिशा में अत्यधिक सहायक है। इसी के परिणामस्वरूप, न्यायिक सक्रियवाद को बढ़ावा मिला है।
Previous Post Next Post